Monday 13 May 2013

औषधीय गुणों से भरपूर चाय की चुस्कियां


मानव सभ्यता और संस्कृति जैसे-जैसे विकसित और अग्रसर होते गए, साथ-साथ पेड़-पौधों और उनके तमाम अंगों के साथ तरह-तरह के परिक्षण भी करने शुरू कर दिए। चाय भी ऐसी ही एक वनस्पति है जो सभ्यता के दौर के साथ हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बनते गई। हलांकि यह बात कम ही लोग जानते होंगे कि चाय का सर्वप्रथम प्रयोग एक औषधि के तौर पर किया गया था। जड़ी-बूटियों के जानकार समय-समय पर तमाम रोगों के इलाज के लिए चाय की ताजा पत्तियों और इसके बीजों को औषधि के तौर पर इस्तेमाल करते गए। जैसे-जैसे समय बीता, चाय हमारी जिंदगी का हिस्सा और दिन के शुरुआत में पहला पेय के रूप में हमारे परिवारों के बीच प्रचलित हो गई। खाद्य और पेय पदार्थों को औषधीय गुणों के आधार पर अपने दैनिक जीवन संतुलित मात्रा में लेने से कई रोगों से दूर-दूर तक आपका पाला नहीं पड़ता है और इस तरह के औषधीय गुण लिए भोज्य और पेय पदार्थों को आधुनिक विज्ञान क्रियाशील खाद्य पदार्थ और पेय यानि 'फंक्शनल फूड्स एंड बेवरेज मानता है। चाय भी एक फंक्शनल फूड और बेवरेज की श्रेणी में रखी गयी है। संतुलित मात्रा में चाय का सेवन अनेक रोगों को आपके नजदीक भटकने भी नहीं देता। 
समय-समय पर चाय के अनेक प्रकारों और सेवन की विधियों पर शोध होते रहें हैं और हमने अपनी सहुलियतों के अनुसार अलग-अलग तरह की चायों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया है। ग्रीन टी के नाम से प्रचलित गौती चाय 'लेमन ग्रास' की बात हो या संतरे के छिल्कों की सुगंध लिए ओरेंज टी या मुलेठी के स्वाद लिए मीठी चाय। हर एक तरह की चाय का एक खास स्वाद और औषधीय गुण है। भारत के सुदूर जंगलों और देहात क्षेत्रों में घूमते फिरते मुझे कई प्रकार की चायों की चुस्कियां लेने का मौका मिला। मेरे अपने अनुभवों को थोड़ा आप सब के साथ भी बांटता चलूं। चलिए 'गाँव कनेक्शन' के पाठकों के लिए इस अंक की पेशकश है 'औषधीय गुणों से भरपूर चाय की चुस्किया।

काली चाय

पातालकोट अक्सर आना जाना लगा रहता है और यहां आदिवासियों के बीच चाय मेहमान नवाज़ी का एक अहम हिस्सा है। जबरदस्त मिठास लिए ये चाय बगैर दूध की होती है और चाय की चुस्की लेते हुए जब इन आदिवासियों से इस चाय की ज्यादा मिठास की वजह पूछी जाए तो जवाब भी उतना ही मीठा मिलता है, 'आपके और हमारे बीच संबंधों में इस चाय की तरह मिठास बनी रहे'। खैर, इस चाय को तैयार करने के लिए 2 कप पानी में एक चम्मच चाय की पत्ती और 3 चम्मच शक्कर को डालकर उबाला जाता है। जब चाय लगभग एक कप शेष रह जाती है, इसे उतारकर छान लिया जाता है और परोसा जाता है। हर्बल जानकारों के अनुसार मीठी चाय दिमाग को शांत करने में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है यानि यह तनाव कम करने में मदद करती है। आधुनिक शोध भी चाय के इस गुण को प्रमाणित करते हैं। सच ही है, यदि चाय की एक मिठास रिश्तों में इस कदर मजबूती ले आए तो अपने आप हमारे जीवन से तनाव छू मंतर हो जाए। 

गौती चाय

बुंदेलखंड में आपका आदर सत्कार अक्सर गौती चाय या हरी चाय से किया जाता है। लेमन ग्रास के नाम से प्रचलित इस चाय का स्वरूप एक घास की तरह होता है। हल्की सी नींबू की सुंगध लिए इस चाय की चुस्की गजब की ताजगी ले आती है। लेमन ग्रास की तीन पत्तियों को हथेली पर कुचलकर दो कप पानी में डाल दिया जाता है और उबाला जाता है। स्वादानुसार शक्कर डालकर इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक कप बचे। जो लोग अदरख का स्वाद पसंद करते हैं, वे एक चुटकी अदरख कुचलकर इसमें डाल सकते हैं। इस चाय में भी दूध का उपयोग नहीं होता है। गौती चाय में कमाल के एंटी ओक्सीडेंट गुण होते हैं और शरीर के अंदर किसी भी प्रकार के संक्रमण को नियंत्रित करने में गौती चाय काफी असरकारक होती है। यह चाय मोटापा कम करने में काफी सक्षम होती है। आधुनिक शोध भी इस तथ्य को प्रमाणित करते दिखाई देती है। हरी चाय वसा कोशिकाओं यानि एडिपोसाईट्स के निर्माण को रोकती है। इसी वजह से दुनिया के अनेक देश गौती चाय को मोटापा कम करने की औषधि के तौर पर देख रहें हैं और इस पर निरंतर शोध जारी है। नई शोधें बताती है कि वसा और कोलेस्ट्राल को कम करने वाले प्रोटीन काईनेस को क्रियाशील करने में गौती चाय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।


खट्टी गौती चाय

गौती चाय बनाते समय इसी चाय में संतरे या नींबू के छिल्के डाल दिये जाते हैं और कुछ मात्रा नींबू रस की भी डाल दी जाती है और फिर परोसी जाती है खट्टी गौती चाय। इस तरह की मेहमानी आप देख सकते हैं मध्यभारत के गोंडवाना क्षेत्र में। मूल रूप से गोंड, कोरकु और बैगा जनजातियों के बीच प्रचलित इस चाय के भी गजब के औषधीय गुण हैं। गाँव के बुजुर्गों से उनकी लंबी उम्र का राज पूछा जाए तो सीधा जवाब मिलता है, 'खट्टी गौती चाय' और मजे की बात यह भी है कि सदियों पुराने इस एंटी एजिंग फार्मुले को आदिवासी अपनाते रहें हैं और अब आधुनिक विज्ञान इस पर ठप्पा लगाना शुरु कर रहा है। नई शोधें बताती है कि हरी चाय और नींबू का मिश्रण उम्र के पड़ाव की प्रक्रिया को धीमा कर देता है यानि आप इस चाय का प्रतिदिन सेवन करें तो अपने यौवन को लंबा खींच सकते हैं।


मसाला चाय

गुजरात में किसी भी गाँव में जाएंगे तो मेहमानी के तौर पर मसाला चाय आपके स्वागत के लिए हमेशा तत्पर रहेगी। घरों में अक्सर मेहमान नवाज़ी के लिए छाछ या चाय का उपयोग किया जाता है। यदि आप चाय के शौकीन हैं तो आपको मसाला चाय परोसी जाएगी। काली मिर्च, सौंठ, तुलसी, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, लौंग, पीपरामूल, जायफ ल, जायपत्री और लौंग मिलाकर एक मसाला तैयार होता है। चाय पत्ती और दूध के उबलते पानी में चुटकी भर मसाला डाल दिया जाता है। स्वादिष्ठ मसाला चाय जब आपको परोसी जाती है, ना सिर्फ  ये गज़ब का स्वाद लिए होती है बल्कि शरीर ताजगी से भरपूर हो जाता है। मसालों के औषधीय गुणों से हम सभी 'गाँव कनेक्शन' के पिछले अंकों में रूबरू हो चुके है, यानि इन सभी मसालों का संगम जिस चाय में होगा, उसके औषधीय गुण भी कमाल के होंगे ही। 


 बस्तर की सैदी या मीठी चाय

 शहद होने की वजह से इस चाय को शहदी चाय या सैदी चाय कहा जाता है। दंतेवाड़ा के किसी दुरस्थ गाँव में आप जाईये, आपका स्वागत सैदी चाय से होगा। साधारण चाय पत्ती (2 चम्मच) के साथ कुछ मात्रा में शहद (लगभग 2 चम्मच) और दूध (2 चम्मच) डालकार फेंटा जाता है। दूसरी तरफ  एक बर्तन में 2 कप पानी को उबाला जाता है। पानी जब उबलने लगे तो इसमें इस फेंटे हुए मिश्रण को डाल दिया जाता है। यदि आवश्यकता हो तो थोड़ी सी मात्रा अदरख की डाल दी जाती है और तैयार हो जाती है सैदी चाय। माना जाता है कि यह चाय शरीर में गजब की स्फू र्ति लाती है। शहद, अदरक और चाय के अपने-अपने औषधीय गुण है और जब इनका संगम होता है तो ये गजब का टोनिक बन जाते हैं।


धनिया चाय

राजस्थान के काफी  हिस्सों में धनिया की चाय स्वास्थ्य सुधार के हिसाब से दी जाती है। लगभग 2 कप पानी में जीरा, धनिया, चायपत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ  डालकर करीब 2 मिनिट तक खौलाया जाता है, आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरख डाल दिया जाता है। कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ठ बनाया जाता है। गले की समस्याओं, अपचन और गैस से त्रस्त लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है। स्वाद के साथ सेहत भी बेहतर करने वाली इस चाय को धनिया चाय के नाम से जाना जाता है।

 मुलेठी चाय

सौराष्ट्र में जेठीमद चाय के नाम मशहूर इस चाय को मध्यभारत में मुलेठी चाय के नाम से जाना जाता है। साधारण चाय तैयार करते समय चुटकी भर मात्रा मुलेठी की डाल दी जाए तो चाय में एक नयी तरह की खुश्बु का संचार होता है और चाय स्वादिष्ठ भी लगती है। दमा और सर्दी खांसी से परेशान लोगों को इस चाय को प्रतिदिन दिन में दो से तीन बार लेना चाहिए, माना जाता है कि मुलेठी के गुणों की वजह से चाय सेहत के हिसाब से अत्यंत लाभकारी होती है।

बर्फीली चाय

 गर्मियों की तपिश और लू के चपेटों से बचने के लिए पानी में एक नींबू का रस, थोड़ी सी चायपत्ती और लेमनग्रास डालकर उबाला जाए और ठंडा करके रेफ्रिजरेट किया जाए। जब यह चाय बिल्कुल ठंडी हो जाए तो इसमें बर्फ  के कुछ डालकर पिया जाए तो ताजगी के साथ शरीर में ऊर्जा का संचार भी होता है। यह चाय सेहत के लिए भी बेहतर होती है।


अनंतमूली चाय

पातालकोट में सर्द दिनों में अक्सर आदिवासी अनंतमूली चाय पीते हैं। अनंतमूल स्वभाव से गर्म प्रकृति का पौधा होता है, इसकी जड़ें निकालकर लगभग 1 ग्राम साफ  जड़ पानी में खौलायी जाती है। इसी पानी में थोड़ी सी चाय की पत्तियों को भी डाल दिया जाता है। दमा और सांस की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को इसे दिया जाता है। जब ज्यादा ठंड पड़ती है तो इसी चाय का सेवन सभी लोग करते हैं, माना जाता है कि यह चाय शरीर में गर्मी बनाए रखती है। अनंतमूल का उपयोग करने की वजह से इसे अनंतमूली चाय के नाम से जाना जाता है।

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