Monday 13 May 2013

एक रॉकस्टार जो अब गाता है कीर्तन


शिकागो (अमेरिका)। कीर्तन शुरू होता है बड़े गहरे ठहराव के साथ, पहले-पहले पता नहीं चलता कि कीर्तनकार क्या गा रहें हैं। फिर एकदम से नारायण सुनाई पड़ता है, फिर 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय' और साथ-साथ उसके गायक का चेहरा नजऱ आता है। तब राज़ खुलता है कि गाने वाला कोई भारतीय नहीं बल्कि एक अमेरिकन सज्जन हैं जिनका हिन्दुस्तानी नाम कृष्ण दास है।

अमेरिका में आज कल एक ऐसी डाक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई जा रही है जो की जेफ्री केगल, यानि की कृष्ण दास के जीवन की कहानी है। इसकी विशेष बात यह है कि 1970 में केगल अमेरिका में अपनी घर गृहस्थी छोड़कर भारत में हिमालय की ओर निकल पड़े एक संत की तलाश में। नीम करोली बाबा जैसे थोड़े बहुत जाने माने संत को ढूंढते अपने न्यूयॉर्क शहर के पास के लॉन्ग आयलैंड के छोटे संसार को त्याग कर चले थे। बचपन और जवानी में कृष्ण दास ने यही सोचा था कि एक बड़े पश्चिमी संगीत के कलाकार बनेंगे। यहां तक की उन का एक 'ब्लू ओय्स्टर कल्ट' नाम के मशहूर बैंड में शामिल होना लगभग तय हो गया था जब वो भारत के लिए निकल पड़े।

महाराज जी के नाम से मशहूर नीम करोली बाबा से मिलने का बाद केगल के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया कि उन्होंने जीवन जीने का एक नया रास्ता चुन लिया जिस पर वो आज भी चल रहें हैं। भारत में समय बिताने के बाद महाराज जी ने कृष्ण दास से यह कहा कि वो वापस अमेरिका लौटें और भारत की संस्कृति का एक एहम अंग जो कीर्तन है, उसको आगे बढ़ाएं। तब से आजतक करीब 45 साल हो चुके हैं और दास उसी साधना में लगे हैं। हालांकि उनके संस्कृत के शब्दों के उच्चारण में अभी भी एक अमेरिकन के बोलने की झलक है मगर वो    जब गाते हैं तो बिलकुल लीन हो कर गाते हैं। उन की भक्ति बखूबी उभरकर आती है। दास के मित्रों का कहना है कि वो जब गाते हैं तो आज भी महाराज जी, जिन का काफी समय पहले देहांत हो गया था, के लिए ही गाते हैं। ''यह सब कैसे हुआ क्यों हुआ मैं नहीं कह सकता दास बताते हैं।''

उनकी महाराज जी के प्रति आस्था तब सामने आती है जब वो कहते हैं, ''जब उन्होंने अपना शारीर त्यागा मुझे ऐसा लगा कि मेरा जीवन भी $खत्म हो गया।'' काफी समय महाराज जी के जाने के दु:ख में बिताया मानो जैसे किसी बच्चे ने कुछ खो दिया हो। कुछ समय तक मायूस रहे और नशे की लत के भी शिकार हुए। तब उन्हें अमेरिका में कीर्तन गाने का महाराज जी को दिया गया अपना वचन याद आया। अब वो ज़्यादातर समय अमेरिका में जगह-जगह कीर्तन गाकर ही बिताते हैं। अक्सर बड़ी संख्या में अमेरिकन लोग उनको सुनने आते हैं और कुछ तो साथ में भी गाते हैं।

इस डॉक्यूमेंट्री जिस का नाम 'वन ट्रैक हार्ट-स्टोरी ऑफ़  कृष्ण दास' का निर्देशन जेरेमी फ्रिन्डल ने किया है। अमेरिका के कई जाने-माने साधना और योग के महारथी और गायकों के साथ साक्षात्कार भी इस फिल्म में शामिल हैं। इस डॉक्यूमेंट्री की यहां के अख़बारों में काफी सराहना भी हुई है। यह एक संजोग ही है कि हिमालय में बसने वाले किसी महाराज का किसी अमेरिकन गायक के साथ राबता होना और दोनों के बीच गुरु-चेले का बंधन बनना और आखिर चेले का अपने देश लौटना। कहां हिमालय और कहां अमेरिका और दोनों के बीच एक सेतु बने जेफ्री केगल, यानि की कृष्ण दास जो एक बड़े रॉक स्टार बनते-बनते बन गए बड़े कीर्तनकार।

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