Monday, 3 June, 2013

घटिया कीटनाशक बेचने पर दो साल की जेल

अमूल्य रस्तोगी

लखनऊ। अगर कोई दुकानदार घटिया कीटनाशक बेचते हुए पकड़ा जाता है तो उसे दो साल की सजा हो सकती है। इसके लिए किसान भाई दुकानदार से रसीद जरूर ले लें, क्योंकि रसीद के आधार पर ही शिकायत कर सकते हैं।

कृषि विभाग में एक वरिष्ठ  अधिकारी बताते हैं, ''किसान दुकान से कीटनाशक लेते समय खरीद की पर्ची जरूर लें क्योंकि अगर कीटनाशक ठीक से काम नहीं करता और किसान इसकी शिकायत करना चाहता है तो उस दशा में रसीद ही वह आधार होती है जिससे वह शिकायत कर सकता है। इसके लिए किसान अपने जनपद या ब्लॉक के पीपीओ अधिकारी से लेकर जिलाधिकारी तक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। कीटनाशक की जांच सरकारी प्रयोगशाला में की जाती है और मानक के अनुरूप न पाए जाने पर दुकानदार पर मुकदमा दर्ज कराया जाता है।" वह आगे बताते हैं, ''नकली कीटनाशक जैसी कोई चीज नहीं होती, कीटनाशक असल में कई तरह के जहरीले रसायनों का मिश्रण होता है जिसमें सबकी मात्रा एक अनुपात में होनी चाहिए और अगर इनमें कोई भी रसायन निर्धारित अनुपात में नहीं है तो उसका इस्तेमाल करने पर जो खेत में असर होना चाहिए वह नहीं होता।"

लखनऊ से करीब 20 किमी उत्तर दिशा में शाहपुर गाँव के रहने वाले मोहनदीन (40) बताते हैं, ''हमने मिर्च बोई थी और उसमें भंगरा कीट लग गया, इसके लिए टिकैतगंज से दवा लाए और छिड़काव कर दिया। दवा बेअसर रही और सारे फूल झड़ गए, पत्तियां ऐंठ गईं।" रसीद लेने के बारे में वह कहते हैं, ''रसीद तो हम कभी लेते ही नहीं, और उसकी कभी जरूरत पड़ी भी नहीं।"

इस बारे में  कृषि विभाग के यह वरिष्ठï अधिकारी कहते हैं, ''एक तो किसान रसीद लेते नहीं और अगर कभी मांगते भी हैं तो उन्हें दुकारदार यह कहकर टालने की कोशिश करते हैं कि अगर रसीद बनवाओगे तो इसमें वैट और अन्य टैक्स बढ़ जाएंगे और किसान कुछ पैसे बचाने के लालच में रसीद ही नहीं लेते। जिससे दुकानदार उन्हें ठगते हैं।" वह आगे कहते हैं, ''अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि अभियुक्त घटिया या वर्जित कीटनाशक बेच रहा था तो उसे 10,000 से 50,000 तक जुर्माना या 2 साल की कैद या दोनों हो सकती है। यह सजा पहली बार के लिए है, पर दूसरी बार में 75,000 का जुर्माना और 3 साल तक की कैद हो सकती है।"

साल 2012-13 में कृषि विभाग ने पूरे प्रदेश से 6,158 कीटनशकों के नमूने लिए जिसमें 291 नमूने तय मानक से नीचे पाए गए। जिसके बाद 30 लोगों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया और 118 पर मुकदमा दायर कराया गया। 

1090 पर गाँव की लड़कियां भी करेंगी मनचलों की शिकायत


गाँवों में 'वूमन पावर हेल्पलाइन' के बारे में किया जाएगा जागरुक

लखनऊ। ''मेरे गाँव की लड़कियां कहती हैं कि जब दीदी पुलिस में हैं तो मुझे डरने की जरूरत नहीं" ये कहते हुए प्रीति वर्मा के चेहरे पर आत्मविश्वास साफ झलकता है। प्रीति वर्मा अपने गाँव से पहली लड़की है जो नौकरी कर रही है वो भी पुलिस में।

ये बात अब बाराबंकी जिले में स्थित प्रीति वर्मा के गाँव लक्षबर की लड़कियां ही नहीं, उत्तर प्रदेश के हर गाँव की लड़कियां कह पाएंगी। क्योंकि प्रदेश की हर गाँव की लड़कियां अब सीधे 'वूमन पावर हेल्पलाइन-1090' से जुड़ पाएंगी। उन्हें सक्षम बनाने और वूमन पॉवर हेल्पलाइन से सीधे जोडऩे के लिए यहां काम कर रही महिला कांस्टेबल को गाँव-गाँव और कस्बों में भेजा जाएगा। जो स्कूलों और कॉलेजों में जाकर लड़कियों को बताएंगी कि कैसे वह 1090 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकती हैं।

गाँव और कस्बों में जाने के लिए 15 महिला कांस्टेबल का चयन करके उनकी ट्रेनिंग भी शुरू हो चुकी है। जिन्हें जुलाई के पहले सप्ताह से गाँवों में लड़कियों को 1090 की सेवा के बारे में बताने के लिए भेजना शुरू कर        दिया जाएगा।

 ''शहर में तो लड़कियां वूमन पावर हेल्पलाइन नंबर 1090 के बारे जानती हैं लेकिन गाँवों में अभी लोग इसे अच्छे से नहीं जान पाए हैं। जिसके लिए कस्बों के स्कूल, कॉलेजों में जाकर, यहां पढऩे आने वाली गाँव की लड़कियों को बताया जाएगा कि अगर कोई फोन से या एसएमएस करके परेशान कर रहा है तो कैसे वह फोन से ही शिकायत दर्ज करा सकती हैं, और पीडि़ता की पहचान भी गुप्त रखी जाएगी।"  लखनऊ स्थित वूमन पावर लाइन के रेडियो मेंटेनेंस ऑफिसर राघवेन्द्र सिंह बताते हैं। वह आगे कहते हैं, ''पहले चरण में इसे लखनऊ परिक्षेत्र में शुरू किया जाएगा, उसके बाद पूरे प्रदेश से इच्छुक महिला कांस्टेबल को बुलाकर उन्हें ये प्रशिक्षित महिला कांस्टेबल टे्रनिंग देंगी ताकि वो अपने-अपने जिलों में जाकर वहां वूमन पावर हेल्पलाइन नंबर 1090 के बारे में लड़कियों को बता सकें।"

15 नवंबर-2012 से शुरू की गई इस हेल्पलाइन नंबर पर पिछले छह माह में कुल मेच्योर्ड कॉल्स (एक मिनट की ऊपर की) 1 लाख, 94 हजार आई हैं। इनमें से 74 हजार 700 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से सबसे ज्यादा शिकायतें करीब 20,000 हजार से ऊपर 20 से 25 आयु वर्ग के लोगों से आईं।  

पिछले छह माह के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि कुल शिकायतों से सबसे ज्यादा शिकायतें करीब 30,000 से ऊपर छात्राओं की ओर से ही आईं। गाँवों में जाकर लड़कियों को 1090 के बारे में बताने के लिए प्रशिक्षित की जा रहीं 15 महिला कांस्टेबल में शामिल प्रीति वर्मा कहती हैं, ''हमें ट्रेनिंग के दौरान यह बताया गया है कि कैसे हम गाँव और कस्बों की लड़कियों के मन से झिझक और डर को खत्म करें। साथ ही यह भी बताएंगे कि उनकी गोपनीयता बरकरार रखी जाएगी और कभी थाने नहीं बुलाया जाएगा।"
  
उन्नाव जिले के सुम्हारी गाँव की रहने वाली महिला कांस्टेबल रचना बाजपेई 'वूमन पावर लाइन' से जुड़कर काफी खुश हैं। वह कहती हैं, ''गाँव में लड़कियां डर और संक ोच में अपने घरवालों से कुछ भी नहीं बताती और सबकुछ सहती रहती हैं। हमें अच्छा लग रहा है कि हम कुछ कर पा रहे हैं।"

अभी हाल ही में 15 लड़कियों के बैच को गाँवों में जाने के लिए दो दिन की स्पेशल ट्रेनिंग भी दी गई है। जिसमें बताया गया कि कैसे अपनी बात को दूसरे के सामने रखते हैं, और अपनी कही हुई बात से लोगों को कैसे प्रभावित करते हैं।

इस बैच की महिला कांस्टेबल को ट्रेनिंग दे रहे 'एलिमेंट' के सीईओ और आईआईएम लखनऊ की गेस्ट फैकल्टी प्रोफेसर निशांत सक्सेना बताते हैं,''ट्रेनिंग सेशन के दौरान इन 15 महिला कांस्टेबल को बताया गया कि बोलने से पहले कैसे आप श्रोताओं के सवाल को समझें और अपनी बात ऐसे रखें कि लोग प्रभावित हों। ट्रेनिंग के दौरान इन लड़कियों से चार प्रेजेंटेशन करवाए और आखिरी पे्रजेंटेशन कुछ गाँववालों के सामने कराया तो उनमें काफी बदलाव दिखा।" वह आगे बताते हैं, ''हर महिला कांस्टेबल की वीडियो रिकर्डिंग भी कराई गई और जिससे बाद में उन्हें बताया गया कि उन्हें कहां-कहां सुधार की जरूरत है। इतना ही नहीं इन्हें अमिताभ बच्चन, शबाना आज़मी और शाहरुख की वीडियो रिकॉर्डिंग भी दिखाई गई और बताया गया कि  कैसे भीड़ के सामने बात की जाती है।"

वूमन पावर लाइन टीम में शामिल रायबरेली जिले के बछरावां कस्बे की रहने वाली अर्चना बताती हैं, ''मुझे तो यहां काम करके काफी अच्छा लग रहा है और मैं हमेशा यहीं रहना चाहती हूं।"  थोड़ा मुस्क राते हुए वह कहती हैं,''अब तो घर से भी फोन आता है तो हमारे मुंह से सबसे पहले यही निकलता है, 'नमस्कार, मैं वूमन पावर लाइन से बात कर रही हूं, मैं आप की क्या मदद कर सकती हूं।"

32% को ही पेयजल उपलब्ध

पंकज कुमार

देश के 206 जिलों में लगातार गिर रहा है भू-जलस्तर 


महोबा/बलिया (उत्तर प्रदेश)। बुंदेलखंड के महोबा जिले के बबेरू गाँव के परशुराम को पीने का पानी लेने जाने के लिए 2-3 किमी तक दूर जाना पड़ता है। 
वह कहते हैं, ''अगर हमारे यहां पानी की समस्या दूर हो जाए तो बाकी की समस्याएं अपने आप ही खत्म हो जाएंगी। हमारे गाँव में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आज भी तालाब और गड्ढो  का पानी पीते हैं।"

यह समस्या केवल बुंदेलखंड के परशुराम की ही नहीं है, बल्कि देश के 68 फीसदी परिवारों की है, जिनके पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। मात्र 32 फीसदी परिवारों को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो पाता है। आजादी के समय प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में 5,236 घन मीटर पानी था। जो कि आज कम होकर सिर्फ 1700-1800 घन मीटर रह गया है। आज देश के कुल 6 लाख 41 हजार गाँवों में से करीब 2 लाख 35 हजार गाँव  पानी की समस्या से त्रस्त हैं। साल 2001 की जनगणना के अनुसार देश में केवल              19.2 करोड़ परिवारों में से केवल 7.4  करोड़ मतलब 38 प्रतिशत परिवारों के              पास ही पेयजल उपलब्ध था, जोकि साल 2011 की जनगणना में यह कम होकर अब केवल 32 प्रतिशत परिवारों के पास ही रह गया है।

बड़े-बड़े शहरों से लेकर छोट-छोटे गाँवों में भी अब पीने के पानी की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है। दिल्ली में जहां लोग खरीद कर पानी पी रहे हैं, वहीं, उत्तर प्रदेश के बलिया, मऊ और आसपास के जिलों में पीने के पानी में आर्सेनिक की अधिकता से लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। बलिया जिले के भीमपुरा ग्राम के पवन शर्मा कहते हैं, ''हैंडपंप से पानी निकालने के करीब एक घंटे बाद ही वो पीला हो जाता है। हमारे गाँव में पानी की वजह से बीमारियां बढ़ती ही जा रही हैं।"

देश में भू-जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। उत्तर प्रदेश भूगर्भ जल विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़े काफी चिंताजनक तस्वीर पेश करते है। इसके  अनुसार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कुल 819 ब्लॉक हैं , जिनमें 85 'डार्क', 214 'ग्रे' जोन में हैं। उत्तर प्रदेश के 9 जिलों (फर्रुखाबाद, फतेहपुर, हरदोई, कानपुर देहात, कानपुर  नगर, लखनऊ, रायबरेली, इलाहाबाद और इटावा) में भू-जलस्तर प्रति वर्ष 20 सेंटीमीटर नीचे गिरता जा रहा है। साल 1996 से 2006 के बीच उत्तर प्रदेश के 461 विकास खंडो में भू-जलस्तर गिरा है। वहीं, के न्द्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार देश के 593 जिलों में से 206 जिलों में भूजलस्तर लगातार गिर  रहा है।

भारत हर वर्ष औसतन 114 सेमी से अधिक वर्षा होती है, फिर भी देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में ही रहता है। 

देश में बढ़ते जलसंकट पर भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ एसबी मिश्र कहते हैं, ''देश में पानी के प्रबंधन में ही खामियां है। बारिश का  अधिकतर पानी पुन: नदियों में ही बह जाता है। जो जल सतह पर बच जाता है वो भी संरक्षित नहीं हो पता है। हम बारिश के पानी का मात्र 4-5 प्रतिशत ही उपयोग कर पाते है।" वह आगे कहते हैं,''सरकार को चाहिए कि वो उचित जल प्रबंधन करे। हालांकि सरकार ने मनरेगा के तहत गाँवों में तालाब खुदवाएं हंै, लेकिन उसमे भी बहुत सी खामियां हैं । सरकार को चाहिए की वो वैज्ञानिकों की सलाह से जल प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाए।"

राजनीति का ग्राम्यीकरण ज़रूरी

डॉ अनिल कुमार वर्मा 

 स्वतन्त्रता के 65 वर्षों के दौरान गाँवों का ज़बर्दस्त राजनीतिकरण हुआ है। खासतौर पर 1992 में 73 वें संविधान संशोधन के बाद जिसमें पंचायतों को संवैधानिक मान्यता और अधिकार दिये गये। इससे एक ओर ग्रामीण स्तर पर लोगों की राजनीतिक सहभागिता तो बढ़ी, लेकिन सदियों से चली आ रही ग्रामीण-भाईचारे की संस्कृति पर बुरा प्रभाव पड़ा। राजनीतिक सहभागिता ने गाँवों में ज़बर्दस्त राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। इस प्रतिस्पर्धा का आधार राजनीतिक विचारधारा न हो सकी। राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर मतदाताओं को आकर्षित करना शुरु किया। जाति पर आधारित राजनीति ने आग में घी का काम किया। परिणामस्वरूप, जिस जातिगत बंटवारे एवं वैमनस्य के बावजूद गाँवों में भाईचारा बना रहता था उसका लोप हो गया और जातिगत बंटवारे राजनीतिक खेमों में बदल गये। जैसे-जैसे देश में राजनीतिक संस्कृति का पतन हुआ वैसे-वैसे ग्रामीण समाज में अन्तर जातिए सम्बन्धों में कटुता आती गई। कुछ लोग इस कटुता को यथा दृस्थितिवाद में परिवर्तन का संकेत मानकर इससे मुंह मोड़ लेते हैं और इसे सदियों से चले आ रहे उत्पीडऩ के अन्त का आरम्भ मानते हैं। शायद डॉ अम्बेडकर ने इसी स्थिति से बचने के लिये गांधी जी के राम राज्य की अवधारणा (जिसमें गाँवों को स्वशासन की इकाई बनाने का विचार था) का संविधान सभा में विरोध किया था। लेकिन आज डॉ अम्बेडकर की चिंता ने वास्तविक एवं विकराल स्वरूप ग्रहण कर लिया है। क्या इसका कोई समाधान है? 

किसी भी समाज में विचारों की भिन्नता एवं सामाजिक वर्गो में संघर्ष तो अपरिहार्य है, लेकिन राजनीति इसी समस्या के समाधान की कुंजी है। दुर्भाग्य से अपने देश में राजनीति समाधान के बजाय समाजिक संघर्षों की जननी बन गई है। इसीलिये ज्यादातर लोग राजनीति को गंदा समझ कर उससे दूर भागते हैं और यह धारणा घर कर गई है कि राजनीति केवल गुंडे-बदमाशों के लिये है। कैसे राजनीति को उसका वास्तविक स्वरूप लौटाया जाये? और कैसे इस गलत धारणा को दूर भगाया जाये? यह चुनौती बहुत बड़ी है पर यह न केवल सामजिक समरसता वरन देश के समग्र विकास के लिये बहुत ज़रूरी है।

ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो। हमने स्वतन्त्रता के बाद लोकतन्त्र और वयस्क मताधिकार का प्रावधान कर राजनीति को गाँवों की ओर ले जाने में तो सफलता प्राप्त की, लेकिन हम अपनी राजनीति को ग्रामोन्मुखी न बना सके। अर्थात एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी हमारी राजनीति शहरोन्मुखी बनी रही। जो राजनीतिज्ञ गाँवों से आते, वे भी शहरों के ही स्वप्न देखते। इससे भारतीय राजनीति में गाँवों की हैसियत शहरों के मुकाबले दोयम दर्जे की हो गई। राजनीति उपर से चलकर नीचे पहुंची, वह दिल्ली से चलकर लखनऊ और वहां से भुआलपुर नगर या प्रदेश के अन्य किसी गाँव में पहुंची और, पहुंचने में राजनीतिक दलों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन न किये जाने के कारण गाँवों में राजनीति का चरित्र उपर से आरोपित सा हो गया, न कि नीचे से पल्लवित एवं पुष्पित। इसी से वहां की राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थों, जातिगत प्रतिस्पर्धा व स्थानिक संकीर्णताओं पर आधारित हो गई। ऐसी राजनीति न गाँवों के विकास की सोच सकी, न ही देशहित की। और जब पंचायतों को संवैधानिक अधिकार दिये गये तब वे स्वराज और सुशाशन के केन्द्र बनने के बजाय लूट-पाट और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये। आज प्रत्येक पंचायत में औसतन तीन करोड़ रुपये प्रतिवर्ष पहुंच रहे हैं जो केन्द्र, राज्य सरकार और विभिन्न संस्थाओं से आते हैं। इतना धन किसी भी पंचायत में आने वाले गाँवों को कुछ वर्षों में खुशहाल बनाने के लिये पर्याप्त हो सकता है,शर्त यह है कि उसका सदुपयोग किया जाये। लेकिन सत्ता की वर्तमान संरचना ऐसा होने नहीं देगी।

क्या किसी वैकल्पिक सत्ता संरचना द्वारा इसे रोका जा सकता है? हां, यह सम्भव तो है पर यह एक पूरी नवीन संवैधानिक व्यवस्था की मांग करती है जिसमें कुछ मूलभूत परिवर्तन अनिवार्य होंगे। एक, भारतीय राजनीति नीचे से उपर जाये अर्थात राजनीतिक दलों की आन्तरिक संरचना में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन हो ओर जो राजनीतिक कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर सक्रिय हों और जिनका अपने मतदाताओं से सीधा संवाद हो केवल उनको ही संगठनात्मक पदों पर निर्वाचित किया जाये और पंचायतों, नगर पालिकाओं, विधान सभाओं तथा संसद में उनको ही जन प्रतिनिधित्व का अवसर दिया जाये। 

द्वितीय, राजनीति ग्रामोन्मुखी हो जिससे दलीय नीतियों और सरकारी निर्णयों में देश की 70 फीसदी ग्रामीण आबादी और गाँवों के हितों का ध्यान सर्वोपरि हो। ऐसा नही कि छोटेए मझोले और बड़े शहरों की उपेक्षा कर के ही यह हो पायेगा। अभी हम विकास की 'औद्योगिक मानसिकता' में फसें हैं इसलिये उद्योगों के केन्द्र बने शहर और उनकी ज़रूरते हमें ज्यादा आकर्षित करती हैं। चूकिं प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी शहरों को ही ज्यादा तरजीह देते हैं इसलिये भी सरकारें और राजनीतिक दल शहरोन्मुखी होने को विवश हैं, लेकिन ऐसा कर वे अपने वास्तविक दायित्व से विमुख हो रहे होते हैं। अगर लोकतान्त्रिक राजनीति का ककहरा यह कहता है कि सर्वसम्मत नहीं तो बहुमत से निर्णय हों, और यदि सर्वजन हिताय नहीं तो बहुजन हिताय तो अवश्य हो, तब तो यह मानना पड़ेगा कि बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी और बहुसंख्य गाँवों को शहरी आबादी और शहरों के मुकाबले ज्यादा महत्व देना लोकतंत्र की पहली मांग है। क्या हमारी सरकारों और राजनीतिक दलों को लोकतन्त्र की इतनी भी साधारण समझ नही है? 

तीन, गाँवों और शहरों के साधारण नागरिकों को भी राजनीति में प्रवेश करने की परिस्थितियां बनें। यह कितनी विचित्र बात है कि जिस देश में 70 फीसदी जनता गाँवों से आती हो उसके शासन की बागडोर शहरी मानसिकता वाले राजनीतिज्ञों में निहित हो। आज सामान्यजन में यह बात बैठ गई है कि बिना पैसे और बाहुबल के राजनीति सम्भव नहीं, लेकिन हमें समझना होगा कि पैसे और बाहुबल की राजनीति में तभी ज़रूरत पड़ती है जब हमारा अपने क्षेत्र की जनता से जुड़ाव नहीं होता। इसका प्रमाण यह है कि अधिकतर लोगों को यही शिकायत होती है कि उनका विधायक, सांसद या अन्य जन प्रतिनिधि कभी मिलते ही नहीं। मिलें कैसे? वे तो शहरों और महानगरों की आलीशान कोठियों में विराजमान होंगे। हमें अपनी राजनीति और राजनीतिज्ञों को शहरों और महानगरों की आलीशान कोठियों से खींच कर गाँव की पुआल व चौपाल तथा शहरों और नगरों की धूल-धूसरित गलियों व झुग्गियों में लाना होगा।  

(लेखक सीएसडीएस, लोकनीति में उत्तर पद्रेश के समन्वयक और राजनीतिक विशलेषक हैं)

समाज में खैरात की आदत डालना ठीक नहीं


भारत में खैरात बांटने की परम्परा कोई नई नहीं है। कहते हैं महाराजा हर्षवर्धन समय-समय पर अपनी प्रजा में अपना सबकुछ बांट देते थे और अपने लिए कपड़े अपनी बहन राज्यश्री से मांग कर पहनते थे। लेकिन वह जमाना दूसरा था जब राज्य और सम्पत्ति पर राजा का पूर्ण स्वामित्व रहता था। अब राज्य की सम्पत्ति पर प्रजा का अधिकार है और चुने हुए प्रतिनिधियों को भी प्रजा की सम्पत्ति का मनमानी खैरात के रूप में बांटना उचित नहीं प्रतीत होता। यदि सेठ साहूकार अपनी निजी सम्पत्ति को खैरात में बांटें तो बात अलग है।

ओडीशा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने लैपटाप बांटे हैं, ओडीशा में छाते बांटे जा रहे हैं, इसके पहले तमिलनाडु में टीवी और कम्प्यूटर बंट चुके हैं और आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में साइकिलें बांटी जा चुकी हैं। स्कूलों में किताबें, कापियां बांटना, वजीफा देना, फीस माफ  करना तो समझ में आता है परन्तु महिलाओं को साडिय़ां, बच्चों को स्कूल ड्रेस, दोपहर का भोजन बांटने का मतलब है अभी भी समाज नंगा और भूखा है। कई बार बच्चे घर से इसलिए भूखे भेज दिए जाते हैं कि वहां तो खाना मिलेगा ही, अभिभावक बच्चे की ड्रेस इस उम्मीद में नहीं बनवाते कि सरकार तो ड्रेस बांटेगी ही। समाज में ऐसी मानसिकता पैदा करना जो खैरात की उम्मीद में उद्यमशीलता बन्द करा दे, उचित नहीं। 

कई सरकारें किसानों द्वारा बैंक से लिया गया कर्जा माफ  कर देती हैं इससे कर्जा चुकाने का संकल्प कमजोर पड़ता है। चुनावी वादे पूरा करने के लिए मुफ्त में बिजली और पानी की आदत डाल दी जाती है। किसान समझ सकता है कि कटिया लगाकर ले लो, बिजली तो मुफ्त की है। कभी सोचा है कि बैंकों का मूलधन और बिजली पानी की लागत किसके द्वारा चुकाई जा रही है।

सरकारें कई बार एक रुपया प्रति किलो के हिसाब से चावल या गेहूं गरीबों को बेचती हैं जो लागत मूल्य से बहुत कम होता है तो इनका लागत मूल्य कौन देता है। ऐसा नहीं कि मजदूर राशन खरीद नहीं सकता इसलिए सस्ता करना ज़रूरी है। 1972 में जब मजदूरी दो रुपया प्रतिदिन थी तो गेहूं एक रुपए में डेढ़ किलो बिकता था यानि मजदूर शाम को तीन किलो गेहूं घर लाता था। अब मजदूरी 120 रुपया प्रतिदिन है और गेंहू 15 रुपया प्रति किलो है यानि वही मजदूर अब 8 किलो गेहूं घर लाता है। सरकार चलाने वाली पार्टियां खैरात देकर बदले में वोट चाहती हैं लेकिन वोटर को सोचना चाहिए कि वह खैरात के रूप में हलाल की रकम ले रहा है या फिर हराम की। स्वाभिमानी शिक्षित बेरोजगार भी एक हजार रुपए प्रतिमाह का बेरोजगारी भत्ता लेने के लिए खैरात की लाइन में लग जाते हैं, शायद यह लाइन नौकरी दिला दे। 

बेरोजगारी भत्ते का मतलब है कि कोई व्यक्ति काम करने की क्षमता रखता है परन्तु सरकार या समाज के पास काम नहीं है। उदाहरण के लिए आप शिक्षित हैं और आपको टाइपिंग, कम्प्यूटर डाटा इंट्री, सर्वे करना आदि आता है अथवा साइकिल बनाना, मोटर मकैनिक, कारपेन्टरी, लोहारगीरी, राजगीरी, पुताई अथवा, सिलाई आती है परन्तु समाज या सरकार काम नहीं दे पा रही है तो आप बेराजगारी भत्ते के हकदार हैं। परन्तु अगर खैरात की रकम में गुजारा करना सीख लिया तो बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करना भूल जाएंगे।

विदेशों में भी बेरोजगारी भत्ता मिलता है। इसकी पात्रता के लिए इस बात का प्रमाणपत्र देना होता है कि आप रोजगार में थे और बेरोजगार हो गए। उदाहरण के लिए आप किसी बैंक में काम कर रहे थे बैंक दिवालिया हो गया आप की नौकरी चली गई, जिस दुकान पर काम कर रहे थे वह बन्द हो गई, माल न बिकने से कारखाना बन्द हो गया और छटनी में नौकरी चली गई, कोई योजना का समय निर्धारित था और योजना पूरी होने के बाद आप की रोजी चली गई तब बेरोजगारी भत्ता आप का अधिकार बनेगा, खैरात नहीं। ऐसी परिस्थिति में सम्मानजनक मानदेयक मिलना चाहिए जब तक नया रोजगार न मिल जाए।

अच्छी  बात है कि उम्रदराज लोगों और विधवाओं को गुजारा करने के लिए सरकार ने पेंशन की व्यवस्था की है। बेरोजगार मेहनतकश नौजवानों को मनरेगा के अन्तर्गत साल में 100 दिन की मजदूरी मिल रही है। यदि शिक्षित बेरोजगारों को खैरात से बचाना है तो उचित होगा कि ग्राम प्रधान अपनी पंचायत में रोजगार के अवसर पैदा करें। शिक्षित बेरोजगारों का चयन प्रधान करें और वेतन भी वही दें जैसे मनरेगा वालों को देते हैं। ऐसी दशा में दिया गया मानदेयक पारिश्रमिक बन जाएगा खैरात नहीं होगा और भत्ता कम से कम मनरेगा के समान होगा। 

देश की युवाशक्ति में स्वाभिमान को जगाने की ज़रूरत है कि वे खैरात की नहीं काम की मांग करें। अपनी योग्यता और क्षमता के हिसाब से काम और काम का पूरा दाम। शिक्षित बेरोजगारों को मनरेगा से भी कम मानदेय देना उनका अपमान है। आशा है हमारी सरकार व्यावहारिक दृष्टिïकोण अपनाते हुए बैंकों से भ्रष्टाचार और दफ्तरों से बाबूगिरी कम करके ग्रामीण युवाओं को उद्यमशील और स्वाभिमानी बनाने का प्रयास करेगी। वे अपना रोजगार स्वयं खड़ा कर लेंगे।