Wednesday 8 May 2013

भेदभाव खत्म कर सकता है 'कम्युनिटी किचन'



कुछ दिन पहले मैं भोपाल गई थी अपनी बुआ की बेटी की शादी में। शादी हो और मेंहदी लगाने वाली न आएं, ये कैसे मुमकिन है भला? तो वहां भी दो महिलाएं आईं जो पूरे दिन बैठ कर हर लड़की-महिला के हाथ में मेंहदी लगाती रहीं। वैसे मुझे ऐसे सारे लोगों से बेहद जलन होती है जो एक ही जगह बैठ कर घंटों एक ही काम बड़े सब्र से कर लेते हैं। मुझसे ये बिलकुल नहीं होता। इसलिए जब कोई ऐसा इंसान मिलता है तो मैं बहुत प्रभावित भी हो जाती हूं। उससे कुछ सीखने का मन करता है। 


बहरहाल, मेंहदी लगवाने वालों की कतार लंबी थी तो मेरी बारी शाम को ही आई। एक और आदत है मुझमें, चुपचाप बैठ कर कोई काम नहीं होता जब तक बातचीत न होती रहे। सुबह से तो फरीदा और रशीदा चुपचाप मेंहदी लगा रही थीं पर मेरी बारी आते ही वो चुप्पी टूट गई। बातों का सिलसिला चल निकला और बातों-बातों में मुझे बड़ी दिलचस्प जानकारी मिलती चली गई। शुरुआत में उनके पहनावे से मुझे ये तो लगा था कि वो मुस्लिम हैं। लेकिन कुछ फर्क भी दिखा था। जो लंबा सा चोगा वो पहने थीं, वो बुर्के जैसा तो था लेकिन रंग बिरंगा, उस पर कढ़ाई थी और सर पर नकाब के बजाय एक स्कार्फ  जैसा था। मेरे अंदर की पत्रकार जाग गई और मैंने उनसे उनके लिबास के बारे में जानना चाहा। बस फिर क्या था, संवाद चल पड़ा। उस लिबास को 'रीदा' कहते हैं और ये दोनों महिलाएं बोहरा मुस्लिम समाज से ताल्लुख रखती हैं। मैंने बोहरा समाज का सिर्फ नाम ही सुना था। इसलिए इनके बारे में और जानने का मन हुआ। ढ़ेर सारी बातें हुईं। इन्होंने इस्लाम से अपने संबंध और फर्क समझाए। 

ये लोग मूलत यमन से सरोकार रखते हैं लेकिन इनकी सबसे ज़्यादा संख्या इस वक्त हिंदुस्तान में ही है। सामान्यत: ये व्यापारी ही होते हैं या अपना खुद का ही कोई काम करने में यकीन रखते हैं। बोहरा समाज में महिलाओं की शिक्षा को भी अहमियत दी जाती है। इन सब बातों के बीच निकल कर आई वो खास बात जिसने मुझे चौंकाया भी और प्रभावित भी किया। मैंने फरीदा और रशीदा से पूछा कि वो इतनी देर शाम तक काम कर रही हैं तो घर कैसे संभालती हैं, खाना कब बनाती हैं। तब उन्होंने मुझे अपने कम्युनिटी किचन के बारे में बताया। सबको बराबर मानने और खाने की बर्बादी रोकने के मकसद से बोहरा समाज ने कम्युनिटी किचन शुरू किया है। एक तय जगह पर सभी बोहरा परिवारों के लिए खाना बनता है और शाम को हर घर में टिफिन पहुंचाया जाता है। खाने की क्वालिटी पर पूरा ध्यान रखा जाता है और सबसे अच्छी बात ये कि चाहे संपन्न परिवार हों, मध्यम वर्ग या गरीब परिवार, हर घर में एक जैसा टिफिन भेजा जाता है। इस खाने के लिए बहुत थोड़ी सी रकम अदा करनी पड़ती है। 

फरीदा और रशीदा ने बताया कि इस व्यवस्था से बोहरा समाज की महिलाओं को खास तौर पर फायदा पहुंचा है। वे अब देर शाम तक बाहर काम कर पाती हैं बिना खाना बनाने की चिंता किए। पूरे दिन की भाग-दौड़ के बाद अगर घर की महिला को पूरे परिवार के लिए बना-बनाया भोजन मिल जाए तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है उनके लिए। इन दोनों ने बताया कि कैसे एक कम्युनिटी किचन की सहूलियत मिलते ही ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं ने घर से बाहर निकल कर अपना काम करना शुरू किया और अपने पैरों पर खड़ी हुईं। साझा चूल्हा, कम्युनिटी किचन, ये ऐसे प्रयोग हैं जो हमारे समाज में फैले भेदभाव को काफी हद तक दूर कर सकते हैं, ऐसा लगता है। 

अगर और लोग, समाज, मोहल्ले ऐसी पहल करें तो कितने फायदे मिल सकते हैं। भेदभाव काफी हद तक कम हो सकता है, महिलाओं को घर के काम से कुछ आज़ादी मिल सकती है और अपने ख्वाबों को जीने का वक्त भी। हां एक और बेहद अहम फायदा, और वो है खाने की बर्बादी कम हो सकती है। एक समाज के तौर पर बोहरा समाज की ये पहल मुझे बहुत अच्छी लगी तो सोचा आपके साथ बांट लूं। क्या पता आप में से कोई इसी पहल को आगे बढ़ा दें।
.
(लेखिका आईबीएन-7 न्यूज चैनल के शो जिंदगी लाइव की होस्ट हैं।)

1 comment:

  1. great story maam.. this idea of community kitchen is superb.
    hatts of to you and bohra muslims.

    ReplyDelete