Wednesday 8 May 2013

आसपास की चीजों से ही आयेगी क्षेत्रीय फिल्मों में सच्चाई



सवाल : कुछ अपने बारे में बताइए?
जवाब: मैं पौढ़ी गढ़वाल के कबरा गाँव में पैदा हुआ। बचपन में चार-पांच साल वहीं गुजरे। दिल्ली में पापा की नौकरी थी। तो उनके साथ वहीं शिफ्ट हो गये। उसके बाद मैं हर साल दो महीने के लिए गढ़वाल जाता था और जब वहां से लौटता था तो मैं पूरा गढ़वाली हो जाता था। हिन्दी भी भूल जाता था। गर्मियों की छुटिटयों का मतलब था गढ़वाल और गाँव। गढ़वाल को मैंने कभी एक टूरिस्ट के नज़रिये से नहीं देखा। मेरे गाँव की जो यादें हैं मुझे लगता है कि दुनिया की एक वही जगह है जो सबसे सच्ची है। वो दृश्य आज भी वैसे के वैसे हैं। 

सवाल: आप फिल्म लाइन में कैसे आये?
जवाब: सच बताऊं तो मैं भागादौड़ी और दिखावे के चक्कर में फि ल्म लाईन में आया हूं। फि ल्म लाइन में आना मेरे ज़ेहन में कभी नहीं था। मुझे मेरे हिसाब से जॉब नहीं मिली इसीलिए मैं इस लाइन में आ गया। कई बार जब कुछ भी आपके हिसाब से नहीं हो रहा होता तो भी आपको एक खास किस्म की ऊर्जा मिलती है, और ऐसे में आपको कुछ मिले तो आप विस्फोटक तरीके से तरक्की करने लगते हैं। शायद मेरे साथ यही हुआ।



सवाल: आप थियेटर से भी काफी समय तक जुड़े रहे हैं?
जवाब: हां शुरुआत थियेटर से ही की। मैंने जब थियेटर जॉइन किया तो लगा कि यहां अपने अन्दर की बेचैनियों को व्यक्त करने की सम्भावनाएं बहुत हैं। अरविन्द गौड़ के साथ 6 साल थियेटर करने के बाद मैंने एक साल पंडित एनके शर्मा के साथ एक्ट वन में थियेटर किया।

सवाल: गाँव से दिल्ली, फिर दिल्ली से मुम्बई, कैसा रहा ये सफर? 
जवाब: शुरुआत में तीन चार साल मुंबई में केवल किराया देने के लिये काम किया। जो काम पसंद नहीं थे वो काम भी किए। प्रतिदिन के हिसाब से एक सीन के लिए भी फि ल्में की ताकि महीने का किराया निकल सके। थियेटर की एक्टिंग यहां मेरे काम नहीं आई। सिनेमा की एक्टिंग में समझ का बहुत फ र्क होता है। मैंने सिनेमा की एक्टिंग को अलग तरीके से समझने की कोशिश की। धीरे-धीरे मकबूल में मौका मिला। विशाल भारद्वाज जी के साथ ब्लू अम्ब्रेला की। मकबूल के बाद पंकज जी ने मुझे नोटिस किया और विशाल जी को कहा कि अगली बार मुझे कोई अच्छा रोल दें। तो ऐसे मुझे ओमकारा में रोल मिला। 1971, गुलाल, शौर्या इन सब फिल्मों में मुझे रोल मिलने शुरु  हो गये। 


सवाल: कहते हैं कि ये इन्डस्ट्री नये लोगों को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करती। अपने कुछ अनुभव बताएं?
जवाब: शुरुआत में लोग बोलते थे बहुत पतला है, बहुत स्किनी है, ये कहां फि ट होगा, ऐसे रिजेक्ट  कर देते थे। आज मेरा वही वेट है पर आज लोग तरसते हैं कि कैसे वो मुझे अपनी फि ल्मों में              लें। शुरुआत में बहुत रिजेक्शन मिला। जैसे ही आपका काम अच्छा लगने लगता है फि र चिन्ता नहीं होती। 
सवाल: आपके ज्यादातर रोल्स में गाँव है?  क्या आप जानबूझकर चुनते हैं
जवाब: आपको पहले हिन्दुस्तान को समझना होगा। अकेले यूपी के किरदार देखेंगे तो दस अलग किरदार आपको मिल जाएंगे। पंजाब, दिल्ली, हर जगह के किरदार अलग तरह के होंगे। पहले किरदारों की इस विविधता को समझना ज़रुरी है। हमारे देहाती रोल में भी वैसी ही गम्भीरता है जैसी अन्तर्राष्ट्रीय फि ल्मों में होती है। मुझे पहले अपना जोन  समझना है, जहां मैं रहता हूं उस क्षेत्र को समझना है, इसलिये मैं इसी तरह के रोल ज्यादा करता हूं। 

सवाल: क्या भारतीय सिनेमा ने गाँवों को गहराई से समझने की कोशिश नहीं की? 
जवाब: नहीं मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा कोई भी किरदार चाहे वो 'दांये या बांये' का रमेश माझिला हो, चाहे 'तनु वेड्स मनु' का पप्पी हो, या कोई भी रोल हो वो उसी गाँव का है, उसी जगह का है। 

सवाल: क्या भारत में गाँव का सिनेमा बन रहा है?
जवाब: हां सिनेमा बन रहा है। कर्नाटका, महाराष्ट्रा, वगैरह कि छोटी फिल्में बनाई जा रही हैं। मराठी सिनेमा में तिज्ञा, वुडु जैसी छोटी बजट की ग्रामीण फिल्में खूब बन रही हैं। मराठी सिनेमा की मुझे सबसे अच्छी बात यह लगती है कि वो दुनिया का बेस्ट लिटरेचर सबसे जल्दी ट्रांसलेट करते हैं। ऐसा ही और प्रदेशों में भी होना चाहिए। 

सवाल: क्षेत्रीय सिनेमा है उसमें बॉलीवुड को फिट करने की कोशिश की जाती है। आप इसे कैसे देखते हैं? 
जवाब: मैने एक चाइनीज़ फिल्म देखी 'पोस्टमैन इन द माउंटेन' वो फि ल्म उत्तराखंड के भूगोल पर बिल्कुल फि ट बैठती है। पर कई बार आप इतने प्रभावित हो जाते हो कि वही उठाकर फिट कर देना चाहते हैं। उनके लिए भी मैं कहना चाहूंगा कि रुको, उसमें अपनी रचनात्मकता लेकर आओ, अपने आसपास की चीजों को प्रेरणा बनाओ, तभी यथार्थ फि ल्मों में आ पायेगा। 

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