Wednesday 8 May 2013

मन की भी थोड़ी-सी सुन लूं


हम प्लैटफॉर्म पर बैठकर देर तक बातें करते रहे। ट्रेन दो घंटे लेट थी और हमारे पास बहुत सारा वक्त था। हम अजनबी थे ज़रूर लेकिन औरतें आपस में बहुत आसानी से दोस्ती कर लेती हैं। थोड़ा-सा प्यार किसी ने जताया नहीं कि दिल की गिरहों को खोलने में देर भी नहीं लगती। हम दो अलग-अलग शहरों के मुसाफिऱ थे। दो अलग-अलग परिवेशों से आई हुई औरतें। लेकिन हमारे बीच जो एक कड़ी थी वो सामने वाली महिला के गोद में थी, उनका बच्चा। दो औरतें अगर मां हों, वो भी छोटे बच्चों की मां तो और आसानी से खुलती हैं। 

वो महिला लगातार अपने पति और बच्चे की बात करती रही। अपने पति पर बहुत गुमान था उसे, जो किसी बड़ी कंपनी में किसी बड़े से ओहदे पर था। बीच-बीच में वो महिला अपने फलते-फूलते ससुराल का जि़क्र भी करती रही। मैं थोड़ी देर में असहज होने लगी। पति, परिवार, बच्चों के बीच में वो कहां थी? मां, बीवी, बहू के बीच उसका अपना अस्तित्व, उसकी अपनी शख़सियत कहां है?

मेरी बड़ी ननद अपने इकलौते बेटे के करियर और पढ़ाई को लेकर इस क़दर संजीदा रहती हैं कि उनके पास बात करने के लिए कुछ और नहीं होता। महानगरों में नहीं, न सही लेकिन गाँवों और छोटे शहरों में हमारे आस-पास की तकऱीबन सभी महिलाओं की जि़न्दगी अपने परिवार से शुरू और वहीं जाकर ख़त्म हो जाती है। उनके अपने कोई सपने नहीं होते। जो होते हैं, पति और बच्चों की सेहत, तरक्की, सफलता और समृद्धि से जुड़ा होता है। ये बात नहीं है कि ऐसा होना नहीं चाहिए। औरत जबसे पैदा होती है, उसे समर्पण और बलिदान का पाठ घुट्टी में खोलकर पढ़ाया जाता है। भाई को अंग्रेज़ी स्कूल में जाने दो। हॉस्टल में जाने दो। उसे अपने हिस्से की मिठाई, दूध-दही दे दो। अपने साथ उसके कपड़ों को धोना सीखो। भाई हमारे बुढ़ापे का सहारा होगा। तुम तो ससुराल चली जाओगी। लड़कियां पूरी तरह मायके की हो नहीं पाती, ससुराल उन्हें पूरी तरह अपना नहीं पाता। इन दो पाटों के बीच पिसते हुए अपने अलावा सबको रास्ता देने, प्रोत्साहित करने और अपनी मनमानी चलाने का हक़ दे देती हैं औरतें। सबके प्रति दया भाव दिखाती हैं, खुद को लेकर निर्दयी बन जाती हैं। इसलिए क्योंकि घर-परिवार की खुशी अपनी $ख्वाहिशों से कहीं बड़ी होती है।

अपना संपूर्ण वजूद समर्पित कर दो, ठीक। लेकिन अपने हिस्से का एक आना तो बचाकर रखो। कोई तो ख़्वाहिश रखो। कोई तो सपना देखो। अपने लिए। अपने बाल-बच्चों-भाई-बंधुओं-पति के लिए नहीं। अपने लिए। बराबरी का मुद्दा दरअसल सिफर  स्त्री-विमर्श की गंभीर बहसों का हिस्सा नहीं। बराबरी का मुद्दा एक जैसी इज़्जत और सम्मान की जि़न्दगी जीने से जुड़ा है। इस बात से जुड़ा है कि किसी के हिस्से को कोई और तो नहीं खा जाता। इस बात से जुड़ा है कि अपनी दौड़ में तेज़ी से भागते हुए आप अपनी जीवन-संगिनी को कितनी जगह देते हैं? उसका कितना खयाल रखते हैं? उसके सपनों और चाहतों को कितनी तरजीह दी जाती है?
ये प्रलाप सिफर  अपने पाठकों के लिए ही नहीं है। ये प्रलाप उस महिला के लिए भी नहीं है जो स्टेशन पर दो घंटे के लिए मिली थी मुझे। ये प्रलाप, बल्कि आत्मालाप मेरे अपने लिए भी है। चलो एक ख्वाब  बुनते हैं। अपने लिए। सिफर  अपने लिए। चलो उस ख्वाब  को हर उस तरीके से मुकम्मल शक्ल देते हैं जो हमारे वश में है। क्या आपको कढ़ाई करना आता है? तो अपने लिए, सिर्फ  अपने लिए एक साड़ी काढि़ए। क्या आप बुनाई जानती हैं? अपने लिए स्वेटर बनाया है कभी? पेंटिंग, अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर पेंट करने का ख्य़ाल कैसा रहेगा? लिखना आता है? ख़ुद को  ख़त लिखिए आज। अपने नाम के आगे 'मेरी प्यारी' लगाना मत भूलिएगा। और मैं! मैं भी ख्वाब  बुनूंगी आज। मेरा मन आज सिर्फ  अपनी बात सुनेगा। आप भी अपने मन की बात सुनिए।

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