Monday 13 May 2013

गाँवों में लव मैरिज पर भौहें तनी ही रहती हैं


सौम्या टंडन 

लखनऊ/बिजनौर/गोरखपुर। गाँवों में आज तरह-तरह की सूचना तकनीकें आ जाने से प्यार का इजहार करने और अपनी बात एक-दूसरे तक पहुंचाने में जरूर आसानी आई है, लेकिन अभी भी प्यार के बाद शादी (लव मैरिज) को लोग गलत मानते हैं। 

गोरखपुर जिले के गाँव सहजनवां के निवासी दयाराम साहनी(50) कहते हैं, "मेरे हिसाब से गाँवों में प्यार के बाद शादी सही नहीं है। ये सब गाँवों में आ रही सूचना क्रांति का असर है कि पहले बच्चे माँ-बाप की पसंद से शादी करते थे, अब वो अपनी पसंद से शादी करना चाहते हैं। हमने जितनी भी इस तरह की शादियां देखी हैं उनमें करीब 20 फीसदी ही सफल रही हैं।"
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सितंबर 2012 में एनडीटीवी के द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार भारत में 74 फीसदी लोग अरेंज मैरिज पर विश्वास करते हैं। जिसमें उत्तरी राज्यों में यह आंकड़ा 96 फीसदी  और दक्षिणी राज्यों में यह 77 फीसदी है।  उत्तरी राज्यों में भी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में अरेंज मैरिज को लोग तवज्जो अधिक देते हैं। 

पश्चिमी यूपी के बिजनौर जिले के गाँव गंछौर के मनोज कुमार शर्मा लव मैरिज को पूरी तरह से गलत बताते हैं। वह कहते हैं, "ऐसी शादी सामाजिक प्रथा के खिलाफ है। आजकल मोबाइल के साधन ने दो लोगों का आपस में बात करना आसान कर दिया है। जिससे गाँवों में लव  मैरिजेज का चलन  धीरे धीरे बढऩे लगा है।"

गाँवों में अरेंज मैरिज की ओर चाहे जितना रुझान हो लेकिन समय के बदलाव के साथ ही घरवाले शादी से पहले लड़कियों की राय जरूर लेने लगे हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के द्वारा किए गए इंडियन ह्यïयूमन  डवलपमेंट सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 1956 से 1960 के बीच की जन्मतिथि की करीब 39 फीसदी महिलाओं ने माना कि  उनके माता-पिता ने उनकी शादी बिना  उनकी सलाह के की। लेकिन समय के बदलाव के साथ ही यह आंकड़ा बीस साल बाद 1976-80 के बीच 5 फीसदी कम जरूर कम हुआ। मतलब इस समय में 34 फीसदी ने कहा कि उनकी शादी बिना उनकी सलाह के हुई। जिससे साफ है कि समाज में धीरे-धीरे शादी से पहले बेटियों की राय ली जाने लगी है।

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