Monday 27 May 2013

उजाले के सपने को हकीकत में जीता एक गाँव

आशुतोष भटनागर 

दरेवाड़ी (पुणे)। 20 जुलाई 2012 को  इस गाँव की उम्र में सबसे छोटी लड़की साक्षी बोरहाडे ने अपने हाथों से एक ऐसी पहल का उद्घाटन किया जिसने गॉंव को अंधेरे से निजात दे दी। महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नर तालुका के एक सुदूर जनजाति क ा दरेवाड़ी नाम का वो पूरा गाँव उस दिन इस एहसास से ही भाव-विभोर था कि उनके पास अब बिजली का कनेक्शन ही नहीं बल्कि अपना खुद का बिजलीघर है। आजादी के सातवें दशक में भी सड़क, बिजली और पानी जैसी मौलिक आवश्यकताओं से वंचित इस गाँव में जर्मनी की सौर ऊर्जा पैनल निर्माता कंपनी बॉश की मदद से पुणे स्थित ग्राम ऊर्जा सॉल्यूशन्स ने जब दरेवाड़ी गाँव में एक छोटा ग्रिड लगाकर सौर ऊर्जा से पूरे गाँव में उजियारा कर दिया तो इन शब्दों में ग्राम प्रधान 'लहु बोरहाडे' के भाव बह निकले। 

देश में आज अनेक ऐसे गाँव हैं जो सौर ऊर्जा से प्रकाशित हैं लेकिन दरेवाड़ी देश का एकमात्र गाँव है जहां यह सौर ऊर्जा कार्यक्रम गाँव के सामूहिक प्रयास से संचालित होता है। यही नहीं, गाँव वालों ने इसमें 40 हजार रुपये का निवेश भी किया। यह राशि भले ही छोटी हो, लेकिन उन्हें ग्राहक से मालिक बनाती है। दरेवाड़ी गाँव कुछ समय पहले तक देश के अन्य पिछड़े गाँवों की तरह ही पीड़ा, निराशा और अभाव से घिरा था। सड़क से 3 किलोमीटर दूर पहाड़ की तलहटी में बसे 40 घरों के इस गाँव की जनसंख्या लगभग 250 है। धान की खेती, मजदूरी और अप्रैल-मई के महीनों में हरड़ बेचना गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय है। आर्थिक रूप से पिछड़े इस दुर्गम क्षेत्र में ग्रिड से बिजली आना व्यावहारिक रूप से आज भी असंभव है।

बदलाव की कहानी तब शुरू हुई जब ग्राम ऊर्जा के कार्यकत्र्ता इस गाँव में पहुंचे। गाँव के लोग, जो गाँव तक बिजली का कनेक्शन आने की उम्मीद भी खोते जा रहे थे, उनका अपना बिजलीघर हो सकता है, पहली बार में तो इस पर विश्वास भी नहीं कर सके वो। शुरुआत  में तो बात-चीत ही चलती रही लेकिन गाँव के कुछ लोगों ने आगे बढऩे का उत्साह दिखाया और जल्दी ही पूरा गाँव इसमें जुड़ गया। गाँव वालों ने एकमत होकर लहु बोरहाडे को समिति का अध्यक्ष चुना और इस समिति का नाम 'वन देव ग्रामोद्योग न्यास' रखा। 7 लोगों की इस समिति में चार पुरुष और तीन महिलाएं सम्मिलित हैं। गाँवों की समिति ने सौर ऊर्जा को दीर्घकाल तक प्रयोग में लाने के लिए अगले 25 साल तक की जिम्मेदारी ली। ग्राम ऊर्जा ने इसके संस्थापन के लिये आर्थिक सहायता हेतु अनेक लोगों से संपर्क किया। इसी समय बॉश सोलर भारत में ग्रामीण क्षेत्र में अपना पायलट प्रोजेक्ट लगाने के लिए किसी विश्वसनीय सहयोगी की तलाश में था। इस प्रोजेक्ट के लिए गाँव की समिति, ग्राम ऊर्जा कंपनी और बॉश सोलर कंपनी ने साथ काम करने का निश्चय किया। गाँव के शिवाजी शेलके ने 200 वर्गमीटर जमीन दी और ग्राम पंचायत ने भी तुरंत अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया और दरेवाड़ी में बिजलीघर का काम प्रारंभ हो गया। 

आज गाँव में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल केवल बल्ब जलाने के लिए ही नहीं बल्कि पंप चलाने, चक्की चलाने और व्यावसायिक कार्यों के लिए भी किया जा रहा है। केरोसिन की ढि़बरी आज बीती हुई बात हो गयी है। जगह-जगह खंभों पर लगे एलईडी बल्बों के कारण रात में भी गाँव में उजाला रहता है। इसके कारण काफी हद तक जंगली पशुओं और सांपों से भी सुरक्षा हो गयी है। विद्यार्थी रात में भी पढ़ते हैं। बुजुर्ग टेलीविजन पर आने वाले कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। समिति ने गाँव के बच्चों के प्रशिक्षण के लिये हाल ही में दो कम्प्यूटर भी खरीदे हैं। 

दरेवाड़ी का जीवन आज बदल चुका है। गाँव के लोगों ने अपने लिए शाश्वत ऊर्जा का विकल्प चुना है, जो दूसरे गाँवों के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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