Wednesday 8 May 2013

ऐसा बर्ताव तो जानवर भी नहीं करते



चाहे जितना बिगड़ैल भैंसा क्यों न हो, चाहे जितना उत्तेजित सांड़ क्यों न हो वे पडिय़ों और बछियों को नहीं छेड़ते। हमारे देश में आजकल कानून व्यवस्था और महिलाओं से बलात्कार की चर्चा खूब हो रही है। राजनेता परस्पर दोषारोपण करते हैं और आंकड़े पेश करते हैं कि विरोधी पार्टी के राज्य में ज्यादा बलात्कार हुए हैं। देश का गृहमंत्री कहता है कि बलात्कार सभी प्रदेशों में होते हैं और भलेमानुस दिखने वाले कुछ लोग टीवी पर कहते हैं कि बलात्कार अमेरिका और जर्मनी में भी होते हैं। आखिर ये लोग कहना क्या चाहते हैं। यदि मान भी लें कि पश्चिमी देशों में भारत से अधिक बलात्कार होते हैं तो क्या नाबालिग लड़कियों के साथ हो रहे बलात्कार को तरक्की की निशानी अथवा सामान्य सी बात समझते हैं ये लोग। सच तो यह है कि भारत में नाबालिग लड़कियों के साथ जो कुछ हो रहा है उसे जानवर भी वर्जित मानते हैं ।

गाँवों के लोगों ने देखा होगा कि चाहे जितना बिगड़ैल भैंसा क्यों न हो, चाहे जितना उत्तेजित सांड़ क्यों न हो वे पडिय़ा और बछिया को परेशान नहीं करते। इसके विपरीत अपने को इंसान कहने वाले तमाम लोग हमारे समाज में 5 साल तक की बच्चियों से बलात्कार करते हैं और मार डालते हैं। भौतिक विकास के इस युग में शायद ही किसी को पता हो कि इंसान के शरीर में  राक्षस का दिमाग कैसे और कब प्रवेश कर गया। इस्लामिक देशों में ऐसे राक्षसों को पनपने नहीं दिया जाता तो क्या वही एकमात्र तरीका है इस समस्या से निपटने का? 
पिछले 25-30 साल में एक परिवर्तन आया है। सिनेमा, टीवी और इन्टरनेट घर घर पहुंचा है और इसे संयोग कहें कि इसी अवधि में हमारे देश में अपराधों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इन्टरनेट पर अच्छी-बुरी हर प्रकार की जानकारी रहती है जिसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही हो सकते हैं। परन्तु फिल्मकारों का कहना है कि समाज सुधार उनका काम नहीं है, उनका काम है समाज का मनोरंजन करना। अपनी समझ से ठीक हीे कहते होंगे। एक फिल्म निर्माता बड़े गर्व से कह रहे थे कि वह कोशिश करते हैं 'टु अराउज़ सेन्सुअलिटी ऐंड सेक्शुअलिटी' अर्थात वह सिनेमा के माध्यम से आनन्दभाव और कामुकता जगाने की कोशिश करते हैं। अत: सिनेमा और टीवी जो कुछ दिखाते हैं वह हमेशा स्वस्थ्य मनोरंजन की श्रेणी में नहीं आता।

यह सच है कि विदेशों में टीवी पर और सिनेमाघरों में 'आनन्दभाव और कामुकता' जगाने वाले सीन हमारे देश से कहीं अधिक दिखाए जाते है और वहां भी बलात्कार की तमाम घटनाएं होती रहती हैं। परन्तु हमारे यहां सामाजिक मान्यताएं अलग हैं। वहां 13 साल की उम्र की लड़कियां डेटिंग पर जाना आरम्भ कर देती हैं। वे अपना जीवन साथी भी स्वयं चुनती हैं और माता पिता को सूचित भर करती हैं। हमारे यहां कठिनाई इसलिए अधिक हो रही है कि जिस तेजी से टीवी, सिनेमा और इन्टरनेट बढ़ा है उस तेजी से हमारा समाज न बदला है और न बदल पाएगा। विकल्प दो ही है, या तो मनोरंजन के माध्यमों पर अंकुश लगे अथवा हमारा समाज किशोरावस्था को स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के लिए अनुमति दे। हमारी सरकार ने वयस्कता की आयु 18 से घटाकर 15 साल करना चाहा था परन्तु बात बनी नहीं। युरोप के देश भी इस ऊहापोह से गुजरे हैं। 

समाज में हिंसा, उद्दंडता और मनोविकारों का सीधा संबंध संस्कारों से है। हम अपने बच्चों में ऐसे संस्कार नहीं डाल पा रहे हैं कि वे बाहरी दुनिया के थपेड़ों को झेल सकें। यौन उत्पीडऩ के मामले में बहुत बड़ी कठिनाई इसलिए भी है कि यह काम परिवार से संबंधित या घुले मिले लोगों द्वारा किया जाता है जो स्वयं संस्कारित नहीं होते और जिनमें भय नहीं होता। सरकारी आदेशों का पालन करते हुए बच्चों को स्कूल में डांटना नहीं, मारना नहीं, फेल नहीं करना और भयमुक्त रखना है। इस प्रकार ऐसे नागरिक पैदा हो रहे हैं जिन्हे माता-पिता, अध्यापक और यहां तक कि नियम-कानून का भी भय नहीं रहता है। 

पहले हमारे देश में बच्चों की शिक्षा और उनके संस्कार परिवार से आरम्भ होते थे। परिवार बच्चों की पहली पाठशाला हुआ करता था। अब अच्छे और सम्पन्न परिवारों में माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है और किसान मजदूरों के पास इतना ज्ञान नहीं है कि वे अपने बच्चों का मार्गदर्शन कर सकें, जीवन में लक्ष्य की ओर प्रेरित कर सकें। स्कूलों में बच्चा 6 घंटे रहता है इतने कम समय में अध्यापक उनको संस्कारित नहीं कर सकता। 

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