Wednesday 8 May 2013

देश में हर दिन कम हो रहे 2035 किसान


किसान कम हो रहे हैं। जनगणना का नया आंकड़ा बता रहा है कि हमारे देश में हर दिन 2035 किसान कम होते जा रहे हैं। 1991 से तुलना करें तो उस वक्त से लेकर अब तक डेढ़ करोड़ किसानों ने खेती छोड़ दी है। पिछले दस साल में सत्तर लाख से अधिक किसान कम हो गए। गाँवों का भी चरित्र तेज़ी से बदल रहा है। अब इन आंकड़ों को जनगणना के ही एक और आंकड़ों से मिला कर देखिये। 2001 में भारत में पांच हज़ार से कुछ अधिक शहर थे। जिनमें से 1000 शहरों का चरित्र गाँव जैसा था। दस साल बाद 2011 में कुल शहरों की संख्या 8000 हो गई है। इनमें से 4000 ऐसे शहर हैं जो पंचायतों से शासित हो रहे हैं। अभी देखना बाकी है कि ये चार हज़ार शहर कितने हज़ार गाँवों के मिटने से बने हैं। उदाहरण के लिए ग्रेटर नोएडा और नोएडा के ही शहर और महानगर बनने में जाने कितने गाँव मिट गये या कोने में सिमट गए। भारत जैसे विशाल देश के हिसाब से रोज़ बनते नए शहरों का अंदाज़ा कीजिए और फिर रोज़ कम होते किसानों का हिसाब लगाइये। आपको हिन्दुस्तान के शहरीकरण की एक नई तस्वीर मिलेगी।

गाँव कई तरह से बदल रहे हैं। कई गाँव की ज़मीन का अधिग्रहण कर उन्हें शहर में बदला गया है। कई गाँव ऐसे हैं जिनके भीतर शहरीकरण की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो गई है। खेती छोड़ कर हर कोई गाँव से बाहर ही नहीं गया है। कई लोग ऐसे हैं जो गाँव के भीतर दूसरे तरह के रोजग़ार में शामिल हुए हैं। जो परिवार पहले खेती को ही प्रथम पेशा मानता था ऐसे परिवारों की संख्या निश्चित रूप से कम हो रही है। संयुक्त परिवारों के समय तक भाइयों में से एक या दो गाँव में रहते ही थे पीछे खेती संभालने के लिए। अब पूरा परिवार गाँव की ज़मीन बेच कर या फिर गाँव छोड़ कर शहरों में बने अपार्टमेंट में रहने आ गया है। उनकी खेती या तो नहीं हो रही है या कोई बंटाई पर कर रहा है। गाँवों के भीतर मालिकाना संबंधों में ज़बरदस्त बदलाव आया है। उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर बड़ी संख्या में दलितों ने सवर्णों से ज़मीन खरीदी है। जहां नहीं खरीदी है वहां वे ज़मीन बंटाई पर लेकर खेती कर रहे हैं। नए नए जोतदार पैदा हो रहे हैं। जनगणना का आंकड़ा सिर्फ  जोतदारों के कम होने की बात कह रहा है। मगर यह देखना दिलचस्प है कि हम शहरीकरण की रफ्तार में किस कदर शामिल हुए जा रहे हैं। भारत की आत्मा अब गाँवों में नहीं रहती बल्कि शहरों की तरफ पलायन कर रही है।

एक बात और हो रही है। गुणीजन बात कर रहे हैं कि पिछले दशक में विकास तो हुआ मगर रोजग़ार सृजन कम हुआ। फिर खेती से कम होने वाले किसान कहां गए। हो सकता है कि ये किसी औपचारिक सेक्टर में न गए हों मगर तमाम शहरों की बस्तियों को देखिये आपको अपनी आंखों से गाँवों से किसानी छोड़ पहली दफा मज़दूर बनने आये लोगों की भरमार दिख जाएगी। इन लोगों के संबंध अब अपने गाँवों से लगातार कमज़ोर हो रहे हैं। इसीलिए आप छठ पूजा के समय दिल्ली और कोलकाता के घाटों पर लाखों की भीड़ देखेंगे।  यह भीड़ ट्रेनों में लद कर जाने  वाली असंख्य लोगों की तुलना में किसी मायने में कम नहीं है।  झारखंड और बंगाल से बड़ी संख्या में गरीब औरतें जिनका पहला पेशा खेती था अब महानगरों की तरफ  घरेलू नौकर के रूप में काम पा रही हैं। दूसरी तरफ  यह भी सच्चाई है कि गाँवों से मर्दों का पलायन हुआ तो खेती अब औरतों के हाथों में हैं। मर्द अधिक मज़दूरी की तलाश में दिल्ली सूरत और मुंबई गए तो सस्ते श्रम का विकल्प औरतें बन गईं। मनरेगा ने मज़दूरी पर असर ज़रूर डाला मगर आज भी गाँवों में एक ही काम के लिए औरत और मर्द की मज़दूरी में अंतर के कई उदाहरण मिल जायेंगे।

इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि किसान कम हो रहे हैं। यह देखा जाना चाहिए कि उनकी जगह खेती में कौन ले रहा है। आदमी या मशीन। मेरे पास कोई ठोस आंकड़ें नहीं हैं मगर जो देखा सुना है उसी के आधार पर कह रहा हूं कि गाँवों में खेती के मशीनीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई है। ट्रैक्टर का रोल बढ़ा है। गेहूं की कटाई के मौसम में आप उत्तर प्रदेश के शहरों में पंजाब से आई बड़ी बड़ी थ्रेशर मशीनें देखेंगे। जिन पर मोटरसाइकिल लादे सरदार जी कई दिनों के लिए गाँव में आ जाते हैं और गेहूं काट कर चले जाते हैं। पहले ये विशालकाय मशीन सिर्फ  पंजाब तक ही महदूद थी मगर अब ये हर तरफ दिख जाती है। गाँव शहर के जैसे हो रहे हैं। वक्त है गांवों की तरफ लौट कर इन बदलावों को देखने का। मैं नहीं कह रहा कि गाँवों में आर्थिक समृद्धि आ रही है। ऐसा भी नहीं। इसलिए नब्बे करोड़ लोगों के हाथ में मोबाइल पहुंचने को आप आर्थिक समृद्धि के विस्तार के रूप में नहीं देख सकते। गऱीब तबका मोबाइल इसलिए खरीदता है कि उसके लिए मजबूरी है। न कि विलासिता। वो मिस्ड काल करता है और बाकी समय मोबाइल चार्ज कर गाने सुनता है। गाँव बदलाव के दौर से गुजऱ रहे हैं। किसान कम हो रहे हैं इसे कई तरह से देखा जाना चाहिए। क्या किसानों के पलायन से या खेती छोडऩे से खेती के पुराने संबंध टूट रहे हैं या ये खेती छोड़ कर गए किसानों की नई क्रयशक्ति से गाँवों में रोजग़ार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। किसान कहलाना अब गर्व की  बात नहीं रही। इसका मतलब यह भी है कि ज़मीन और गाँव से लोगों  का भावुक रिश्ता लगातार  कमज़ोर होता जा रहा है। वे अब हिम्मत कर पा रहे हैं कि पुरखों की विरासत को छोड़ आने वाली पीढ़ी के लिए नई दुनिया की खोज में निकला जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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