Wednesday 8 May 2013

बेमौसम तोरई उगाकर किसान ने सुधारी माली हालत


देवांग राठौर

मिर्जापुर (बरेली, उत्तर प्रदेश)। कहते हैं कि जब कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो और निरन्तर मेहनत और लगन से काम करने की सूझ-बूझ तो बुरा वक्त भी इंसान का कुछ नहीं कर पाता है। ऐसी ही एक कहानी है द्रोण पाल की। 

द्रोणपाल बरेली के क्यारा ब्लॉक के गाँव मिर्जापुर के रहने वाले हैं। इनकी 3 बीघा जमीन पर मुकदमा चल रहा था और ऊपर से परिवार चलाने की जि़म्मेदारी इन्हें आहत किये हुए थी। ऐसे में परिवार चलाना और मुकदमा लडऩे के लिए पैसे जुटाना पारम्परिक खेती करके पूरा करना नामुमकिन था। ऐसे समय में इन्होंने कुछ अलग करने की योजना बनाई और इसके लिए कुछ समझदार लोगों से सुझाव भी लिए, कुछ लोगों ने इन्हें सब्जी की खेती करने का सुझाव दिया। 

तभी इन्हें कहीं से तोरई की खेती के बारे में पता चला। पता करने पर ज्ञात हुआ कि बाजार में आपूर्ति अधिक होने की वजह से अच्छी कीमत नहीं मिल पाएगी तो आखिर में हारकर ये कृषि वैज्ञानिक के पास पहुंचे। कृषि वैज्ञानिकों ने सलाह दी की बेमौसमी तोरई की खेती करो तो बाज़ार में अच्छे दाम मिलेंगे। द्रोणपाल ने वैज्ञानिकों की सलाह मानकर ऐसा ही किया। 

बताए गये तरीके को मानते हुए पहले द्रोणपाल ने पौन बीघे में एक पॉलीहाउस तैयार किया। यह पॉलीहाउस इन्होंने गाँव में ही प्राप्त लकडिय़ों एवं पॉलीथीन की सफेद शीट से तैयार किया। इसके बाद इन्होंने दिसम्बर के शुरू में ही तोरई के बीज पॉलीहाउस में  रोप दिये और पौध तैयार की। 

शुरुआती दिनों में द्रोणपाल के सामने तोरई की खेती में एक समस्या आयी वह यह कि जब वे पॉलीहाउस में पौध तैयार करके खेत में लगाते तो अधिकांश पौधे सूख जाते थे जिससे उन्हें काफी नुकसान होता। ऐसे समय में एक कृषि विशेषज्ञ लवकुश मौर्य ने उनकी मदद की। लवकुश मौर्य के निर्देशन में द्रोणपाल ने खेत में 2 मीटर की दूरी पर 60 सेंटीमीटर गहरी नालियों बनाई। उन्होंने नालियों के किनारे पर 15 सेंटीमीटर से 20 सेंटीमीटर की दूरी पर बीजों को लगाया और बीज लगाने के बाद नालियों को सफेद पॉलीथीन से ढक दिया। पॉलीथीन ज़मीन से लगभग 1.5 फीट की ऊँचाई पर गोलाकार तम्बू बनाकर लगाई गई। इससे पौधे सूखने की समस्या कम हो गयी और फसल 15 दिन पहले ही तैयार हो गयी, क्योंकि ट्रांसप्लान्ट करने के बाद जड़ पकडऩे में समय लगता था वो भी अब कम हो चुका था। इस तरह द्रोणपाल ने अपने नुकसान को जल्दी ही भर लिया।
इस तरीके से द्रोणपाल ने तोरई की फसल सीजन आने से एक से डेढ़ महीने पहले ही तैयार कर ली जिसकी इन्हें बाज़ार में अच्छी कीमत मिली। अच्छी कीमत मिलने का सबसे बड़ा कारण यही था कि उस समय बाज़ार में कोई भी किसान तोरई बेचने नहीं आता। 

तोरई 40 से 80 रूपये प्रति किलो की दर से बिकी। द्रोणपाल को मात्र पौने बीघे की फसल से 50 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ और तभी से इनकी किस्मत बदल गयी। 

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