Monday 27 May 2013

जीवन शैली बदल ली और भूल गए गर्मियों को


गर्मी आ गई, गर्मी आ गई। न्यूज़ चैनल वालों के लिए गर्मी बिरनी की तरह है जो अपने छत्ते से उड़कर किसी को काटने दौड़ रही हो। तापमान नापा जाने लगा है। तापमान को लेकर शहरों के बीच कंपटीशन हो रहे हैं। आज अमृतसर में अमृतसर का ही दस साल पुराना रिकॉर्ड टूटा तो अलवर ने तापमान के मामले में अमृतसर को हरा दिया। क्रिकेट की तरह रनिंग कमेंट्री चल रही है। इस वक्त दोपहर के तीन बज रहे हैं और धौलपुर ने 47 डिग्री तापमान के साथ दिल्ली से .5 डिग्री की बढ़त बनाये हुए हैं। सुबह से चैनलों के हेडलाइन गर्मी के मारे लगने लगते हैं।

पिछले दो तीन सालों में हम गर्मी को तापमान के हिसाब से जानने लगे हैं। वर्ना पीढिय़ों तक हम जनरल नॉलेज की किताब में यही पढ़ कर संतोष करते रहे कि गया भारत की सबसे गर्म जगह है। न्यूज़ चैनल वाले गया को भूल ही गए हैं। अब तो रोज़ कोई नया सबसे अधिक गर्म स्थान बन जाता है। हम मौसम को जीने की जगह उससे आतंकित होना सीख रहे हैं। चैनलों ने मौसम को ऐसे फिल्माना शुरू किया है जैसे गर्मी पहली बार आई हो।

ज़रूर हम सब इस गर्मी से त्रस्त लोग हैं। सबको परेशानी होती है, मगर इस गर्मी से बचने के लिए हमारे समाज ने सदियां लगाकर कई अद्भुत उपाय भी खोजे हैं। उनकी जानकारी ये चैनल कभी नहीं देते। पानी को बचाने और ठंडा रखने के नाना प्रकार के तरीक़ों को भी नहीं बताते जिससे लगे कि हम गर्मी को जीते भी रहे हैं। तापमान का आतंक बढ़ता है और उसे देखकर कई लोग एयरकंडीशन और कूलर की दुकान की तरफ़  दौडऩे लगते हैं। बाद में पता चलता है कि बिजली तो है नहीं। कमरे में एसी लगाकर पंखा हांक रहे हैं। बिजली पर हमारी निर्भरता की पोल खुल जाती है। अख़बारों को देखिये लोग गर्मी में कैसे अधीर होकर बिजली दफ्तरों को जलाने निकल जाते हैं। सब गुस्से में हैं।

सही है कि बिजली होनी चाहिए पर क्या हमने अपने घरों को मौसम के हिसाब से बनाया है। गाँवों में लोग खपरैल की छत का इस्तमाल करते थे। जब से पक्का घर और पक्की छत का संबंध हैसियत से हुआ है, हमने गर्मी को और आमंत्रित किया है। गाजी़पुर में एक रिश्तेदार के घर देखा था। खपरैल की छत थी मगर थी दो मंजि़ला। जिससे भरी गर्मी में भी आदमी आराम से रह ले। पसीने होता था और पंखा भी लगता था मगर जलता नहीं था। हमने अपनी जीवनशैली बदलते वक्त मौसम का ख्याल ही नहीं किया।

नतीजा यह है कि हम गर्मी से बौखलाने लगे हैं। चैनल उसी बौखलाहट को बढ़ा रहे हैं। उत्तर भारत हर मामले में संपूर्ण भारत बन जाता है। चैनलों को कम से कम पहाड़ों का भी तापमान बताते ताकि पता चलता कि वहां गर्मी कैसे बढ़ रही है। पूर्वोत्तर भारत के तापमान की जानकारी देते जिससे गर्मी को लेकर हमारी राष्ट्रीय समझ बनती। लेकिन चैनल हर शहर में स्कूटी चलाती लड़कियों की तस्वीरें खींच कर गर्मी दिखा देते हैं। अख़बार भी यही करते हैं।

तापमानों की भी अपनी राजनीति है या राजनीति पर इसका असर होता होगा। बिजली की आपूर्ति के बंटवारे में। जिसकी सरकार होती है उसके मंत्रियों के इलाक़े वीआईपी घोषित हो जाते हैं, जहां बिजली ठीकठाक आती है। विरोधी दल के इलाक़े में बिजली की आपूर्ति ग़ैर वीआईपी हो जाती है। इस तरह का भेदभाव जमकर होने लगता है। गर्मी सबके लिए बराबर से नहीं आती है। मौसम को हमने बेईमान बना दिया है। इसकी राजनीति को समझिए और तापमान संवेदी हो जाइए। 47 डिग्री सेल्सियस हो या 50 डिग्री सेल्सियस हम इस सूचना का क्या करें किसी को नहीं मालूम मगर गर्मी से ज़रूर डरने लगे हैं। पीपल और नदी की बात कौन करे, इन्हें ख़त्म करते वक्त हमने कब सोचा कि गर्मी तो हर साल आएगी।

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