Tuesday 23 April 2013

गाँवों में अब टूट रहे परिवार, छूट रही खेती


उमेश पंत

ग्रामीण अंचलों में संयुक्त परिवार अब कई एकाकी परिवारों में टूटने लगे हैं जिससे खेती में कुछ बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं

"ज़मीन जैसे जैसे कागजों में टूटती चली गई वैसे वैसे असल में खेती छोटी होती चली गई।" बिजनौर के महलपुर गॉंव में अब एक एकांकी परिवार में रहने वाले किसान चौधरी जयपाल सिंह जब ये बात कहते हैं तो परिवार के टूटने का उनका दर्द साफ  झलक आता है। गाँवों में संयुक्त परिवारों की इस टूटन ने खेती के तरीकों के साथ साथ उत्पादन को भी काफी हद तक प्रभावित किया है।   

"हमारा चार भाईयों का परिवार था, कुल 120 बीघे के खेत थे। जबसे परिवार छोटा हुआ तबसे खर्च बढ़ गया पर आमदनी नहीं बढ़ी। पहले हम 80 बीघे की जमीन पर गन्ना बोते थे। एक बीघे से 60 से 65 क्विंटल गन्ना निकल आता था। कुल 4 हज़ार क्विंटल तक गन्ना निकल आता था। अब जबसे बंटवारा हुआ है एक बीघे से 40 से 45 क्विंटल से ऊपर गन्ना नहीं निकलता।" जयपाल सिंह आगे बताते हैं। 

कभी संयुक्त परिवारों की शरणगाह माने वाले गाँवों से साथ-साथ रहने की ये परम्परा अब कम होती जा रही है। 2011 में आई जनगणना की रिपोर्ट के मुताबिक गॉंवों के 45 फीसदी से ज्यादा परिवारों में अब महज 4 या उससे कम लोग रहते हैं। वहीं तकरीबन 70 फीसदी परिवार ऐसे हैं जहां अब केवल एक विवाहित जोड़ा रहता है। केवल 15 फीसदी परिवार ही ऐसे बचे हैं जिनमें अब दो से ज्यादा दम्पति रहते हैं।

 परिवार हुए छोटे तो घटा खेतों का आकार 

परिवारों के छोटे होने का सीधा फर्क खेत की जोत पर पड़ा है। जो किसान एक बड़े परिवार के रुप में बड़ी जमीन पर खेती कर रहे थे एक छोटे परिवार के रुप में उनके हिस्से की ज़मीनों का आकार भी घट गया। 

साल 1995 में प्रति व्यक्ति औसत जमीन की उपलब्धता 0.89 हेक्टेयर थी जो 2001 में 0.32 हेक्टेयर तक घट गई। अनुमान लगाया जा रहा है कि 2035 तक 0.20 हेक्टेयर रह जाएगी। जहां तक खेती के लिये जमीन की उपलब्धता का सवाल है 1951 में ये 0.5 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति थी जो 2001 में घटकर 0.18 हेक्टयेर प्रतिव्यक्ति हो गई है। 

किसान मानते हैं कि खेतों की जोत छोटी होने से उनके उत्पादन में कमी होती चली गई है। बिजनौर के हरियावाल गॉंव में रहने वाले जावेद अख्तर (23) बताते हैं, "1990 तक हम संयुक्त परिवार में रहते थे। कुल 60 बीघा जमीन थी। परिवार टूटा तो पापा और बांकी दोनों भाईयों के हिस्से 20 बीघे की ज़मीन रह गई। ट्रेक्टर से लम्बे खेतों की जुताई में खर्च कम आता है, लेकिन बंटवारे के बाद खेत छोटे हो गये। ऐसे में खेती के वक्त पैसे के साथ साथ ज़मीन का भी नुकसान होता है। बड़े खेत में गेहूं बोने पर उत्पादन ज्यादा होता था। लेकिन टुकड़ों मे खेती करने पर अब कई बार खेत खाली भी रह जाते हैं। जोत कम होने से उत्पादन तो घटा ही है।" 


घट गई खेती में हाथ बंटाने वालों की संख्या 

छोटे परिवारों से किसानी को एक बड़ा नुकसान ये हो रहा है कि खेती में हाथ बटाने वाले लोगों की संख्या घट गई है। ऐसे में खेती के लिये मजदूरों की दरकार अब गाँवों में बढ़ रही है। लेकिन खेती करने वाले मजदूरों के अभाव के चलते एकांकी परिवारों में रहने वाले किसानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। 
कानपुर से 17 किलोमीटर दूर सुनैला गाँव के राना नकुल सिंह (37) बताते हैं, च्च्शहर के करीब का गाँव होने की वजह से हमारे गाँव में मजदूर भी नहीं मिलते। ज्यादातर मजदूर शहर के कारखानों में काम करने चले जाते हैं। परिवारों के टूटने से लोगों को अब अपने साथी किसानों से खेती में मदद मांगनी पड़ रही है। आप उनकी मदद करो, वो आपकी मदद करेंगे।


 छोटे परिवारों ने किया खेती से दूर 

बीते कुछ वक्त में खेती को लेकर आये आंकड़ों से ये संकेत मिले हैं कि किसानी में एक आम भारतीय किसान की रुचि धीरे धीरे कम हो रही है। 1950-51 से 2009-10 के बीच खेती के इतर कामों में प्रयोग होने वाली जमीन का प्रतिशत 3.3 से 8.6 हो गया है। 1099-2000 से  2009-10 के दशक में गैर कृषि कार्यों में प्रयोग होने वाली जमीन की ये तादात 11 फ ीसदी तक बढ़ी है। खेती की परम्परा को एक पेशे तौर पर सदियों से पाल रहे किसानों की अरुचि की कई वजहों में से एक संयुक्त परिवारों का विघटन भी है। ग्रामीण युवा किसान जावेद अख्तर बात कुछ ऐसे कहते हैं, "जब संयुक्त परिवार था तो हम अनाज मंडी में बेचते थे। तब पूरा परिवार खेती पर निर्भर था। लेकिन परिवार टूटने के बाद केवल खेती से गुजारा नहीं चल पाता। अब रोजगार तलाशना ही पड़ेगा।" 


और बदल गया खेती के लिए रुझान 

 परिवारों की इस सिकुडऩ ने खेती के भीतरखानों में गुमसुम तरीके से एक बड़ा बदलाव ये किया है कि इन गॉंवों में अब आमतौर पर पारम्परिक तरीके से बोये जाने वाली फसलें बदल रही हैं। जिन फसलों को बोने में कम मजदूरों की जरुरत होती है लोग अब उन फ सलों को बोने में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं। "परिवार छोटे होने से ये हुआ है कि अब बोई जाने वाली फसलें बदल गई हैं। जिन फसलों में मशीनों के प्रयोग से काम चल जाता है वो फसलें गॉंवों में ज्यादा बोई जा रही हैं। जैसे गेहूं ज्यादा लोगों न बोना शुरु किया है और दाल बोने वालों की संख्या कम हो रही है। धान बोने के लिये और कटाई के लिये बिहार से मजदूर बुलाने पड़ रहे हैं। मजदूरी भी ज्यादा पड़ रही है। ऐसे में नुकसान भी बहुत हो रहा है।" नकुल सिंह आगे बताते हैं। 

हांलाकि कुछ किसान ये भी मानते हैं कि बड़े परिवार से अलग होने में उन्हें फायदा  हुआ है। बिजनौर के निजामपुर पदारथ मे रहने वाले पीतम सिंह (53) बताते हैं कि एक किसान के तौर पर एकांकी परिवार में रहना उन्हें ज्यादा फायदेमंद लगता है।  "हम चार भाई हैं, 2003 में हमारी जमीन का बंटवारा हो गया। तबसे 27 बीघे जमीन हर भाई के हिस्से में आई। लेकिन परिवार के टूटने से हमारी खेती में कोई फर्क नहीं आया। परिवार एक था तो आपस में मतभेद थे। एक भाई ने खेती नहीं की तो देखादेखी दूसरे ने भी नहीं की। परिवार अलग होने से आत्मनिर्भरता आती है। खर्चा चलाना है तो खेती करनी पड़ती है। ऐसे में हमें लगता है कि अलग अलग रहकर खेती करने से ज्यादा फायदा है।" पीतम सिंह बताते हैं। 

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