Tuesday 30 April 2013

उन्हें ज़ेड प्लस सुरक्षा और आम आदमी बेसहारा



सरकारें चलाने वाले लोग केवल अपनी सुरक्षा की चिन्ता में रहते है, आम आदमी का दर्द कब महसूस करेंगे।

आम आदमी की सुरक्षा की हालत यह है कि जब तक वह अपने घर नहीं पहुंच जाता अपने को सुरक्षित नहीं महसूस करता है। अब तो घर में भी सुरक्षा नहीं बची है। सड़कों पर महिलाओं की चेन लूटी जाती है, घरों में बुजुर्गों की लूट और हत्याएं हो रही हैं, सरे आम बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, आए दिन डकैतियां हो रही हैं और आतंकवाद की घटनाएं आम हो गई हैं। रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी सड़क पर चलने में डर लगता है। ऐसा वातावरण किसने बनाया, क्यों और कैसे बना और क्या कभी फिर से सामाजिक वातावरण सामान्य हो सकेगा, इन प्रश्नों का उत्तर शायद ही किसी के पास हो।  

आम आदमी निहत्था है, बेसहारा है और पुलिस भी संकट की घड़ी में मदद नहीं कर पाती। इसके विपरीत बहुत से राजनेताओं को ज़ेड प्लस सुरक्षा मिली है जिसमें 36 सशस्त्र लोगों का सुरक्षा कवच रहता है। कुछ अन्य को ज़ेड सुरक्षा जिसमें 22 तथा कुछ को वाई अथवा एक्स श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई है जिनमें क्रमश: 11 और 2 का कवच होता है। लाखों सुरक्षाकर्मी जो देश और समाज की रक्षा में लगे होने चाहिए थे वे मु_ी भर राजनेताओं की रक्षा में मुस्तैद रहते हैं। नेताओ की सुरक्षा में लगे हुए लोग कोई लाठीधारी सिपाही नहीं हैं। बल्कि स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी), नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी), इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस (आईटीबीपी) और सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स(सीआरपीएफ) के प्रशिक्षित जवान हैं। इन सभी की सेवाएं विशेष प्रयोजन से सृजित की गई थीं जहां इनकी आज भी आवश्यकता है। 

स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) की स्थापना 1988 में वर्तमान एवं पूर्व प्रधानमंत्रियों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए हुई थी। यह अलग बात है कि आजादी के 21 साल बाद अचानक ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता क्यों पड़ गई। नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी), जिसे ब्लैक कमांडो भी कहते हैं उसका गठन आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए 1985 में हुआ था। इसी प्रकार इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस (आईटीबीपी) और सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) का गठन भी विशेष प्रयोजनों के लिए हुआ है। सरकारें चलाने वाले लोग केवल अपनी सुरक्षा की चिन्ता में रहते हैं। जब तक राष्ट्ररक्षक जवानों को नेताओं की रक्षा से हटाया नहीं जाएगा पूरे समाज की सुरक्षा की चिन्ता उन्हें पैदा नहीं होगी।  

प्रधानमंत्री और सैकड़ों मंत्रियों की कौन कहे, हजारों सांसद और विधायक भी किसी न किसी प्रकार के सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों के साथ चलते हैं। शायद हमारे राजनेताओं को इस बात का एहसास नहीं होगा कि अद्भुत सुरक्षा के कारण वे आम जनता से कितना दूर हो गए हैं। आखिर इन्हें किससे और क्यों खतरा पैदा हो गया है। जब कभी भी आम आदमी आतंकवादियों, डकैतों अथवा पुलिस वालों की गोली से मारा जाता है तो उसे कुछ लाख रुपये का मुआवजा दे दिया जाता है। यदि राजनेताओं के जान की कीमत अधिक है तो उन्हें मुआवजा के रूप में कुछ करोड़ रुपया दिये जा सकते हैं। 

संविधान निर्माताओं ने सोचा भी नहीं होगा कि समाज में घुलमिल कर समाजसेवा करने वाले नेेताओं को एक दिन अपनी सुरक्षा के कारण जनता से ही दूरी बनानी पड़ेगी। पुराने समय में हमारे राजनेताओं को खतरा नहीं होता था। मैने देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को खुली जीप में लखनऊ की सड़कों पर निकलते हुए नजदीक से देखा था। एक बार तो पंडित जी अमीनुद्दौला पार्क में भीड़ के बीच पहुंच गए थे जहां कुछ शोर हो रहा था। पता चला कोई सांप निकल आया था। इसी प्रकार कनाडा के न्यू फिनलैंड प्रान्त के मुख्यमंत्री स्मालवुड को बिना किसी ताम-झाम के साठ के दशक में अपनी कार चलातें हुए देखा था। आज जो लोग स्वयं इतने असुरक्षित और डरे हुए हैं वे आम आदमी को क्या सुरक्षा प्रदान करेंगे। आज देेश में आतंकवादी जहां चाहते हैं हमले कर रहे हैं। मुम्बई में आतंकवादी "गेट वे आफ  इंडिया" के पास से गुजरे थे। उस दर्दनाक घटना में 180 लोग मरे थे जिनमें 22 विदेशी मेहमान और 26 सुरक्षाकर्मी भी थे। कहते हैं मछुआरों ने आतंकवादियो को देखा भी था। यदि सुरक्षाकर्मी "गेट वे आफ इंडिया" के पास मौजूद होते तो शायद दुर्घटना टल सकती थी। आतंकवादी और अराजक तत्व हमारे सिस्टम में घुलमिल गए हैं और शायद ही कोई बड़ा शहर बचा होगा जहां आतंकवादी घटनाएं न हुई हों। ऐसे में राजनेताओं का यह सोचना कि कमांडो उन्हेे बचा लेंगे उनका भ्रम है। आखिर इंदिरा जी और राजीव गांधी के पास भी कमांडो मौजूद थे। आवश्यकता है पूरे समाज की सुरक्षा के विषय में गम्भीरता से सोचने की जिससे नेताओं की भी सुरक्षा स्वत: हो जाएगी। 

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