Tuesday 30 April 2013

गर्मियों में बेहतर सेहत और राहत दिलाते हैं ये फल


दीपक आचार्य 

गर्मियों में सूरज की लपटें और चिलचिलाती धूप के दुष्प्रभावों के लिए आदिवासी हर्बल नुस्खों के जिक्र के साथ उन फलों की जानकारी भी जरूरी है जो अक्सर इस मौसम में मिलते हैं। आपके इर्द-गिर्द पाए जाने वाले 10 फलों की जानकारी देते इस लेख को हमने दो हिस्सों में बाँटा थाए पिछले अंक में हमने बेलए पपीता, कटहल, जामुन और तेंदू के बारे में जाना। आईये इस अंक में शेष बचे 5 फलों यानि संतरा, शहतूत, फालसा, तरबूज और कमरख के औषधीय गुणों को समझेंगे। चलिए जानते हैं इन हिन्दुस्तानी फलों के बारे में जिनका गर्मियों के मौसम में स्वाद लिया जा सकता है, इनके स्वाद के साथ बेहतर सेहत और शारीरिक विकारों पर भी विजय पायी जा सकती है।

फालसा
फालसा एक मध्यम आकार का पेड़ है जिस पर छोटी बेर के आकार के फल लगते है। फालसा मध्यभारत के वनों में प्रचुरता से पाया जाता है। फालसा का वानस्पतिक नाम ग्रेविया एशियाटिका है। इसके फल स्वाद में खट्टे-मीठे होते है। गर्मीयों में इसके फलों का शर्बत ठंडक प्रदान करता है और लू और गर्मी के थपेड़ों से भी आराम दिलाता है। हृदय की कमजोरी की दशा में लगभग 20 ग्राम फालसा के पके फल, 5 कालीमिर्च, चुटकी भर सेंधा नमक, थोड़ा सा नींबू रस लेकर अच्छी तरह से घोट लिया जाए और इसे एक कप पानी में मिलाकर कुछ दिनों तक नियमित रूप से पिया जाए तो हृदय की दुर्बलता, अत्यधिक धड़कन आदि विकार शान्त हो जाते हैं। डाँग-गुजरात के आदिवासी इसी मिश्रण को शरीर में वीर्य, बल वृद्धि के लिए उपयोग में लाते हैं। इन्ही आदिवासियों के अनुसार खून की कमी होने पर फालसा के पके फल खाना चाहिएए इससे खून बढ़ता है। अगर शरीर में त्वचा में जलन हो तो फालसे के  फल या शर्बत को सुबह-शाम लेने से अतिशीघ्र आराम मिलता है। फालसा के पके फलों के सेवन से शरीर के दूषित मल को बाहर निकाल आता है।   

शहतूत
शहतूत को मलबेरी के नाम से भी जाना जाता है। मध्य भारत में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। वनों, सड़कों के किनारे और बाग-बगीचों में इसे देखा जा सकता है। इसका वानस्पतिक नाम मोरस अल्बा है। शहतूत के फलों का रस पीने से आंखों की रोशनी तेज होती है और इसका शरबत भी बनाया जाता है। पातालकोट के आदिवासी गर्मी के दिनों में शहतूत के फलों के रस में चीनी मिलाकर पीने की सलाह देते हैं, उनके अनुसार शहतूत की तासीर ठंडी होती है जिसके कारण गर्मी में होने वाले सन स्ट्रोक से बचाव होता है। शहतूत का रस हृदय  रोगियों के लिए भी लाभदायक है। गर्मीयों में बार-बार प्यास लगने की शिकायत होने पर इसके फलों को खाने से प्यास शांत होती है। शहतूत में विटामिन-ए, कैल्शियम, फास्फोरस और पोटेशियम अधिक मात्रा में मिलता हैं। इसके सेवन से बच्चों को पर्याप्त पोषण तो मिलता ही है साथ ही यह पेट के कीड़ों को भी समाप्त करता है। शहतूत खाने से खून से संबंधित दोष समाप्त होते हैं। शहतूत, अंतमूल, अंगूर और गुलाब की पंखुडिय़ों से बना रस चीनी मिलाकर पिने से शरीर में खून शुद्ध होता है। डाँग-गुजरात के आदिवासीयों के अनुसार शरीर में किसी भाग में सूजन होने पर उस पर शहतूत के फलों के रस और शहद को मिलाकर लेप लगाने से सूजन में काफी राहत मिलती है। शहतूत का रस पीने से हाथ-पैर के तालुओं में होने वाली जलन से राहत मिलती है। 

संतरा
संतरा भी एक जबरदस्त एनर्जी देने वाला फल है। संतरे का वानस्पतिक नाम सिट्रस रेटीकुलेटा है। संतरे में ग्लूकोज व डेक्सटोल जैसे तत्व भरपूर होते हैं, जो शारीरिक शक्ति के लिए बड़े खास होते हैं। इसके अतिरिक्त संतरे के रस में विटामिन सी, विटामिन बी कॉम्लेक्स, विटामिन ए कई खनिज तत्व और कुछ मात्रा में पौष्टिक पदार्थ एवं अन्य पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। गर्मियों में लू लगने पर दिन में चार बार संतरे का रस देना बहुत अच्छा होता है। घमौरियों के इलाज के लिए डाँग गुजरात के आदिवासी संतरे के छिलकों को छाँव में सुखाकर पाउडर बना लेते हैं और इसमें थोड़ा तुलसी का पानी और गुलाब जल मिलाकर शरीर पर लगाते हैं, ऐसा करने से तुरंत आराम मिलता है। भोजन करने के बाद यदि आधा गिलास संतरे का रस रोज लिया जाए तो पेट के अल्सर ठीक हो जाते हैं। छाँव में सुखाये संतरे के छिलकों को बारीक पीस लें और घी के साथ बराबर मात्रा में मिलायें और इसे 1-1 चम्मच दिन में 3 बार पीने से बवासीर में आराम मिलता है। संतरे के रस को गर्म करके उसमें काला नमक और सोंठ का पाउडर मिला लें, आदिवासियों के अनुसार ये अपचन और आमाशय संबंधित रोग में खूब फायदा देता है। पातालकोट के आदिवासी संतरे के सूखे छिलकों या उसके पाउडर को जलते हुए कोयलों पर डालकर सारे कमरों में धुँआ करते है, ऐसा करने से मक्खी-मच्छर और खटमल भी भाग खड़े होते है।  

 तरबूज
तरबूज गर्मियों के मौसम बड़े चाव से खाया जाता है और माना जाता है कि गर्मियों के मौसम में इसके सेवन करने से प्यास शांत होती है। तरबूज का वानस्पतिक नाम सिट्रलस लेनाटस है। गरमी की वजह से यदि सरदर्द हो रहा हो तो तरबूज के गूदा रस का सेवन किया जाए तो दर्द में बड़े जल्दी आराम मिलता है। यही रस जोड़ों के दर्द में भी लाभकारी होता है। पातालकोट के आदिवासी मानते हैं कि यदि लगभग 100 मिली तरबूज के रस में लगभग 2 ग्राम कालीमिर्च के चूर्ण को मिलाकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से शरीर की सूजन दूर हो जाती है। इसी तरह 1 कप तरबूज के रस में यदि 1 चुटकी सेंधानमक डालकर सेवन किया जाए तो हाई ब्लड प्रेशर में काफी फायदा होता है। डाँग- गुजरात के आदिवासी तरबूज के छिलके जलाकर राख तैयार करते हैं और मुँह के छालों से ग्रस्त रोगियों को मुँह में लगाने की सलाह देते हैं। यहाँ के आदिवासी तरबूत का रस मिट्टी के बर्तन में लेकर उसे रात के समय में खुले आसमान में रख देते हैं ताकि इस पर ओंस पड़े, सुबह इसमें चीनी मिलाकर उस रोगी को देते हैं जिसे लिंग पर घाव हुआ हो और मूत्र दाह में जलन होती हो। पातालकोट के हर्बल जानकारों की मानी जाए तो तरबूज के बीजों की गिरी और मिश्री की समान मात्रा 6 ग्राम एक साथ चबाकर खाने और ऊपर से दूध पीने से शरीर में ताकत की वृद्धि होती है जिसके फलस्वरूप नपुंसकता खत्म होती है। 

कमरख
कमरख का पेड उत्तर और मध्य भारत में अक्सर देखा जा सकता है। अंग्रेजी भाषा में इसे स्टार फ्रूट के नाम से जाना जाता है और इसका वानस्पतिक नाम एवेरोहा करम्बोला है। स्वाद में इसके फल काफी खट्टे होते है हलाँकि ज्यादा पक जाने पर इनमें थोडी मिठास भी आ जाती है। आदिवासियों के अनुसार इसका पका हुआ फल शक्तिवर्धक और ताजगी देने वाला होता है। गर्मियों में इस फल के सेवन से लू की मार नहीं पडती तथा यह ज्यादा गर्मी की वजह से होने वाले बुखार में भी लाभकारी होता है। अक्सर ग्रामीणजन इसके पके फलों का रस (पन्हा) तैयार कर दोपहर में पीते है, माना जाता है कि शरीर की आंतरिक तासीर को यह ठंडा बनाए रखता है और प्यास को बुझाता भी है। भोजन के दौरान कमरख के अधपके फलों की चटनी या अचार को भी खाया जाए तो गर्मियों में काफी फायदा करता है। बवासीर के रोगियों को पके हुए कमरख के फलों का सेवन करना चाहिए। फलों का रस हैंगओवर से निजाद पाने में मदद करता है। जिन माताओं को प्रसूति पश्चात दुध स्रावण की समस्याएं रहती है, उन्हें भी पके फलों का रस देना चाहिए।

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