Tuesday 30 April 2013

शब्द ऐसे हों जो सुनने में अच्छे लगें


ओमथानवी 

कोई नया शब्द मिल जाए तो मेरा खून बढ़ जाता है। ऐसा पहले भी कह चुका हूं। आज आशुतोष कुमार ने बताया कि पंजाबी में 'लोकप्रिय' यानी हर किसी को भाने वाले शख्स या सामान के लिए शब्द है 'हरमनप्यारा'। वाह! कितना उम्दा शब्द है। देश की भाषाओं के ऐसे जानदार शब्द हिंदी में लाने चाहिए (विदेश के तो अपने आप आ जाएंगे!), बशर्ते वे हिंदी की ध्वनियों के अनुकूल हों। फिराक साहब के जुमले में कहें तो वे शब्द, जो हमारे कानों के परदों को 'ठेस' न पहुंचाएं।

हिन्दू कॉलेज का हिंदी विभाग बड़ा अच्छा काम करता है। एक हस्तलिखित पत्रिका निकालता है 'हस्ताक्षर'। कविवर केदारनाथ सिंह की बेटी डॉ रचना सिंह उसकी संपादक हैं; पल्लव जैसे अनेक शिक्षकों और विद्यार्थियों का उन्हें सहयोग है। सब लोग मिलकर अंक की सामग्री अपने-अपने हाथ से लिखते हैं। फिर उसकी फोटोप्रतियां वितरित होती हैं। कंप्यूटर युग में यह प्रयोग महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जोखिम है। हाथ से लिखने पर वर्तनी, विराम-चिह्नों आदि की पोल खुल सकती है। तमाम सावधानी के बावजूद। दुर्भाग्य से हिंदी पढ़ाने वालों की हिंदी ही आजकल खराब होती है। कल दिल्ली विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ हिंदी शिक्षक की टिप्पणी में 'गाली-गलौच' पढ़ा तो मैंने कहा कि भाई गलौज सही होता है कि गलौच? बोले सही तो गलौज है (चलिए हिंदी कोश देखा!), लेकिन आगे बोले कि "गाली-गलौच" कहने से "लफ्ज़" की कड़वाहट कम हो जाती है। कड़वाहट की फिक्र करने वाला गाली-गलौज करेगा क्यों? पता नहीं जिद थी या हीनताबोध, आगे वे 'गलौच' के हक में पंजाबी के एक कोशकार का हवाला भी ले आए। निपट हिंदी के जुमले में पंजाबी कोश का क्या काम?  भाषाओं के बीच शब्दों की आवाजाही में रूप बदलते हैं, बदलने चाहिए। मैं शुद्धता का पुजारी नहीं। पर भाषा एक अनुशासन और जिम्मेवारी का बरताव भी हमसे मांगती है। वह उसे मिलना    चाहिए। कम से कम उनसे जिन्होंने हिंदी पढ़ाने-सिखाने की जिम्मेवारी ओढ़ रखी है। इस दिशा में हस्तलिखित पत्रिका का यह प्रयोग निस्संदेह उपयोगी साबित होगा। और हिंदी विभागों को भी ऐसा    करना चाहिए। शिक्षकों की अपनी लिखावट में भरपूर सामग्री प्रसारित हो। बशर्ते विद्यार्थियों के सम्मुख अपनी पोल खुलने का भय उन्हें न सताता हो!

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