Tuesday 30 April 2013

खून बहाकर नहीं होते आंदोलन


शिकागो (अमेरिका)। साल में एकाद बार मैं 1982 में रिचर्ड एटनबोरो द्वारा निर्देशित फिल्म 'गाँधी' देख ही लेता हूँ, विशेषकर तब जब राजनीती से जुडी कोई बड़ी हिंसा होती है। जैसा की हाल ही में अमेरिका के दक्षिणी तटस्थित बोस्टन शहर में हुआ जब एक बम हमले में तीन लोगों की जान गयी और करीब देढ़ सौ से अधिक लोगों को गंभीर चोटें आईं। अकसर ऐसे हमलों के पीछे जिनका हाथ होता है वो कहते हैं की फलां नीतियों के खिलाफ  यह उनका प्रतिरोध करने का तरीका है। इस सिलसिले में गाँधी फि ल्म की अहमियत और बढ़ जाती है।

विश्व के इतिहास में शायद सबसे समर्थ साम्राज्य के खिलाफ अहिंसा का रास्ता न सिर्फ चुनना बल्कि उस पर चल कर ऐसा परिणाम हांसिल करना कि जिससे अंग्रेजी हुकूमत आखिरकार भारत छोडऩे पर मजबूर हो जाए। आज भी वो इतनी भव्य सिद्ध मालूम होती हैं। हां यह ज़रूर है कि गाँधी के दौर में भी कई जगहों पर हिंसा हुई और बार-बार हुई। लेकिन फिर भी आज़ादी की जंग की नींव तो अहिंसा पर ही ज्यादातर टिकी हुई थी।.

बोस्टन शहर में हुए धमाकों के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले दो भाई, छब्बीस वर्षीय तेमर्लन सरनएव और उन्नीस वर्षीय ज़ोखर सरनएव क्यों खून के प्यासे हो गए यह कहना असंभव सा है। लेकिन इतना तो हम कह ही सकते हैं कि ऐसा कोई अभियान नहीं हो सकता है जिसके लिए समर्थक बीच सड़क बम लगा के लोगों की निर्मम हत्या करें जैसा कि माना जा रहा है कि सरनएव भाइयों ने किया। बड़े की मौत पुलिस मुठभेड़ में हो गयी और छोटा अब पुलिस की हिरासत में है अपनी सज़ा सुनने के इंतज़ार में।

मेरा कहने का मतलब यह है कि हिंसा करने से सुर्खियां तो बन सकती है मगर उस से किसी भी समस्या का टिकाऊ हल नहीं निकलता। गाँधी फिल्म में एक सीन है जब एक अंग्रेज़ अफसर गाँधी को पूछता है, "तो क्या आपको लगता है कि हम बस ऐसे ही भारत छोड़ के चले जायेंगे?" गाँधी जवाब देते हैं, "हाँ" और फिर यह भी कहते हैं की वो इसलिए कि जब भारत के 35 करोड़ निवासी एक लाख अंग्रेजों से असहयोग करेंगे, वो भी अहिंसा से, तो उन को भारत छोडऩा ही पड़ेगा।

दुनियाभर में जब की चारों ओर राजनीतिक हक के लिए लोग हिंसा पर उतर आते हैं, जैसा फिलहाल लग रहा है बोस्टन शहर में भी हुआ, उस का नतीजा हमेशा ग़लत ही निकलता है। ये किस तरह का अभियान है जहां एक आठ साल के बच्चे के पीछे एक बम रख दिया जाए, जैसे की बोस्टन में हुआ? परन्तु यह भी सही है कि जब अमेरिका, पाकिस्तान और अफ गनिस्तान में छुपे आतंकवादियों पर रिमोट कंट्रोल द्वारा चालित ड्रोन जहाज़ से बमबारी होती है तो उस में भी कई बार बच्चे अपनी जान गवाते हैं। आन्दोलन कितना भी क्यों न सही हो पर उसमें निर्दोष बच्चों की जान नहीं जानी चाहिए। ऐसे माहौल में मुझे लगता है कि गाँधी फिल्म को दुनियाभर में मुफ्त डीवीडी के माध्यम से पाठशालाओं में एक अभ्यास के तौर पर दिखाना चाहिए। जिस सीन का मैंने जि़क्र किया वो एक मिनट में इतनी बड़ी बात कह जाता है जिसका गहरा असर हो सकता है। ना तो हम क्रांति रोक सकते हैं और ना तो क्रांतिकारी को। हाँ, इतना ज़रूर निश्चित कर सकतें हैं कि क्रांति और क्रांतिकारी उस पथ पर चलें जो इंसानों के खून से लथपथ न हो। बोस्टन में जो हुआ वो दक्षिण एशिया में रोजाना होता है। कारण कई हो सकते हैं लेकिन परिणाम एक जैसा ही होता है। हमारे समाज की यह बड़ी भारी नैतिक जि़म्मेदारी है कि हिंसा ख़त्म हो। शायद मेरी तरह औरों को भी गाँधी फिल्म साल में एकाद बार देख ही लेनी चाहिए।

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