Tuesday 30 April 2013

अब गाँव वाले खुद बनाएंगे बिजली, होगी ज्यादा कमाई


रोहित जोशी

रस्यूना (उत्तराखंड)। यहां के पहाड़ी भूगोल के इतिहास में रची-बसी दो कहानियां उठाते चलें और फिर एक तीसरी की भी बात करेंगे जो कि अभी लिखी ही जा रही है। पहली मिथकीय है जिसे पूरे देश की एक बड़ी आबादी इतिहास मानती है। दूसरी इतिहास है जिसमें कुछ-कुछ मिथक भी गुथा है और तीसरी कहानी अभी बहुत ताजा है अपने लिखे जाने के ही क्रम में। 

भगीरथ ने युद्ध में परास्त अपने पुरखों के शवों के अंतिम संस्कार के लिए हिमालय में तप कर गंगा को पृथ्वी पर आने को विवश कर दिया। मिथक यही है कि गंगा पृथ्वी पर ऐसे ही आई और इसके लिए भगीरथ ने जो कठोर तप किया वह एक मिसाल बन गया और एक मुहावरा भी, 'भगीरथ जतन' या 'भगीरथ प्रयत्न'। 

दूसरी कहानी माधौ सिंह की है। देवप्रयाग से तकरीबन 30 किमी दूर बसे गाँव मलेठा के माधौसिंह की। सत्रहवीं शताब्दी में गढ़वाल रियासत की सेना का सिपाही और फिर अधिकारी रहा माधौसिंह जब अपने गाँव मलेठा लौटा उसकी पत्नी उदीना के पास उसे खिलाने/पिलाने के लिए न अनाज था और न पानी। कुछ देर पत्नी पर झल्लाया माधौ जब इसकी वजह समझा तो उसे रात भर नींद नहीं आई। पानी/सिंचाई के अभाव में गाँव के बढिय़ा और विस्तृत खेतों में कुछ नहीं उगता था सिवाय सूखी घास के। गाँव और पास बहती चंद्रभागा नदी के बीच में एक बड़ा पहाड़ था। माधौसिंह ने उसे खोद नहर बनाकर चंद्रभागा का पानी गाँव में लाने की ठान ली। गाँव वालों को इसके लिए उत्साहित कर उसने वाकई पहाड़ खोद डाला। और 5 फीट चौड़ी और 5 फीट गहरी सुरंग बना डाली। इस कहानी में एक छोटे मिथक का पुट यह भी है कि सुरंग तैयार हो जाने के बाद भी चंद्रभागा सुरंग में उतरने को तैयार नहीं हुई। रात में माधौसिंह के सपने में चंद्रभागा आई और उसने उसके इकलौते बेटे की बलि दिए जाने की शर्त पर ही सुरंग में उतरना स्वीकारा। कहते हैं कि माधौसिंह ने गाँव के लिए अपने इकलौते बेटे गजै सिंह को कुर्बान कर दिया। संभवत: हुआ यह होगा कि सुरंग बनाने के कठोर जतन के बीच युवा गजैसिंह ने दम तोड़ दिया हो और अत्यंत धार्मिक समाज की किंवदंतियों में यह कहानी चंद्रभागा को दी गई बलि के तौर पर प्रचार पाई हो। बहरहाल माधौसिंह के जीवट फैसले और ग्रामीणों के भगीरथ प्रयत्न से चंद्रभागा सुरंग में उतरी और मलेठा के खेतों और ग्रामीणों को यह सुरंग आज भी सिंचित कर रही है। 
खैर! माधौसिंह की सुरंग वाले मलेठा गाँव के पास से ही श्रीनगर से घनशाली/फ लिंडा की तरफ बढ़ती एक सर्पीली सड़क में दो लाउड-स्पीकर लगी एक गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। यह मिथक और इतिहास की उपरोक्त दो घटनाओं के बाद वर्तमान की कहानी है, जो अभी अपने लिखे जाने के ही क्रम में है। गाड़ी में लाउडस्पीकर से भूपेन हजारिका का गीत ''गंगा बहती हो क्यों', गूंज-गूंज कर इनारे-किनारे सुबकती 'गंगाओं से पूछ रहा है कि-इतिहास की पुकार/करे हुंकार, ओ गंगा की धार/निर्बल जन को सबल संग्रामी/समग्रोग्रामी, बनाती नहीं हो क्यों?

इस गाड़ी के चालक लक्ष्मण सिंह पिछले सात दिनों में इसे अल्मोड़ा के जागेश्वर से हांकते हुए दन्या, पनार, पिथौरागढ़, थल, बागेश्वर, देवाल, कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग, देवप्रयाग, चमोली, गोपेश्वर, श्रीनगर, से होते यहां तक ले आए हैं और आगे घनशाली, फलिंडा, उत्तरकाशी, संगमचट्टी से नई टिहरी होते देहरादून तक ले चलेंगे और आंखिर में फिर से अल्मोड़ा। गाड़ी में जो लोग सवार हैं ये उत्तराखंड को लेकर चिंतित हैं, हिमालय/पहाड़ को लेकर चिंतित हैं और यहां बसे लोगों को लेकर चिंतित हैं।  

उपरोक्त दो कहानियों के बाद अब जो ये तीसरी कहानी है इसका प्रण भगीरथ के गंगा को पृथ्वी उतार लाने और माधौ सिंह के सुरंग खोदकर चंद्रभागा से नहर निकाल लाने की तरह ही जटिल है। या कहें कि ज्यादा जटिल है। दुनिया भर में मुनाफे की होड़ में मानव और प्राकृतिक संसाधनों की लूट का जो विशाल पहाड़ खड़ा है अबके सुरंग इसे ही खोद कर बनानी है और गंगा को वहीं बहाना है।

पहाड़ी समाज में यात्राओं का अपना अलग इतिहास है। मध्य-हिमालय समाज, उच्च हिमालय को जानने के लिए उसकी तरफ कई सांस्कृतिक, व्यापारिक और धार्मिक 'जातÓ निकालता रहा है। इसी क्रम में मध्य-हिमालय को जानने समझने और आंदोलित करने के लिए भी पिछले समय में कई यात्राएं यहां निकली हैं। इस बार की यह जनयात्रा भी उत्तराखंड की समकालीन स्थितियों और उनकी बेहतरी के लिए संघर्ष की कार्य दिशा बनाने के लिए रही। इस दस सीटर गाड़ी में रिले रेस की तरह हरदम सवार दस लोग इसी मुहीम का हिस्सा थे। कोई बीच में कहीं यात्रा में सवार होता तो कोई दूसरे यात्री के लिए जगह खाली कर उसे आगे की यात्रा की मशाल पकड़ा देता। इनमें उत्तराखंड लोक वाहिनी के अध्यक्ष और लंबे समय से जनसंघर्षों में सक्रिय रहे शमशेर सिंह बिष्ट, बांधों के खिलाफ आंदोलित कर जबरदस्त प्रतिरोध दर्ज कराने वाले चेतना आंदोलन के त्रेपन सिंह चौहान और उलोवा के ही पूरन चंद्र तिवारी, बसंत राम, शमशेर जंग, दयाकृष्ण कांडपाल, सरयू में स्थानीय जनता की मिल्कियत में बनने जा रही परियोजना के अध्यक्ष राम सिंह और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में माइक्रो हाइडिल के समाजशास्त्र का अध्ययन कर रहे अंकुर, आजादी बचाओ आंदोलन के स्वपनिल श्रीवास्तव, सुमन शर्मा, मनोज त्यागी, सितांशु और महिला आंदोलन की कमला पंत और पद्मा गुप्ता शामिल थे। इस बीच कुमाऊं-गढ़वाल के शहरों-गाँवों में बसे लोगों के लिए यह पुराने दिन लौटने जैसा था, जब पूरा राज्य आंदोलित था और इस तरह के यात्री गाँव-गाँवों में घूम कर लोगों को आंदोलित किया करते थे। बीच के उम्मींदों से भरे लेकिन एक शिथिल दौर के बाद अब फिर से वह माहौल बन रहा है। 

इधर दुनियाभर में विकास का जो मॉडल हमने चुना है इसकी ऊर्जा की भूख अंतहीन है। पृथ्वी के सारे प्राकृतिक संसाधन मिलकर भी इस भूख को नहीं मिटा सकते। भारत की ऊर्जा की मांग पिछले दो दशक में 350 गुना बढ़ी है और यह लगातार बढ़ती जा रही है। आने वाले समय में पूरे हिमालय को डुबो कर भी इस मांग की भरपाई कर पाना संभव नहीं है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा क्षमताओं में 1 लाख मेगावाट का इज़ाफा करने का लक्ष्य रखा है। अगर इस लक्ष्य को पाना होगा तो उत्तराखंड में प्रस्तावित सभी 558 परियोजनाओं और अन्य हिमालयी राज्यों की प्रस्तावित परियोजनाओं को भारतीय राज्य को बनाना ही होगा। उत्तराखंड समेत पूरे देशभर में गाँवों से लोगों को शहरों की तरफ खदेडने की जो नीतियां सरकार ने अपनाई हुई हैं, इन्हें यूं ही तो नहीं स्वीकारा जा सकता। ऐसे में इस अस्थाई विकास के नाम पर अंतहीन ऊर्जा की हवस के लिए सिर्फ 30-35 साल तक ही चलने वाली एक परियोजना के लिए कितने टिहरी और डुबोए जाएंगे और जनता के हक में यह कितना वाजिब होगा यह सवाल चिंतनीय है।

इसी चिंतन से आंदोलित यह यात्रादल कुछ नए विकल्पों के साथ लोगों के पास पहुंचा था। इन विकल्पों में सबसे बड़ा नारा जो यात्रा के पर्चे में भी प्रमुखता से था कि 'पानी हमारा है, बिजली भी हम बनाएंगेÓ था। राष्ट्र की ऊर्जा जरूरतों की दुहाई देकर जनता/गाँव/शहरों को डुबोने वाली सरकार के बरक्स यह यात्रा एक जनपक्षीय विकल्प सामने रख रही है। जिसमें प्रोड्यूसर्स कंपनी एक्ट 2002 के तहत ग्रामीणों की एक प्रोड्यूसर्स कंपनी बनाकर 1 मेगावॉट की एक परियोजना बनाई जाएगी। इस कंपनी के तकरीबन 100-200 सदस्य होंगे जिनके पास कंपनी का एक-एक शेयर होगा। यह शेयर वे किसी को बेच भी नहीं सकेंगे। वे इस शेयर के स्थाई मालिक रहेंगे। घराट की तकनीक का ही कुछ बड़ा स्वरूप बनाकर इसमें टरबाइन जोड़कर विद्युत प्राप्त की जा सकेगी। ऐसी दो कंपनियां एक कुमाऊं के पनार क्षेत्र की सरयू नदी पर और दूसरी गढ़वाल क्षेत्र के छतियारा में बालगंगा नदी पर परियोजना बनाने के लिए क्रमश: सरयू हाईड्रो  इलैक्ट्रॉनिक्स पावर प्रोड्यूसरर्स लिमिटेड और संगमन हाईड्रो इलैक्ट्रॉनिक्स पावर प्रोड्यूसरर्स लिमिटेड नाम से रजिस्टर कर दी गई हैं। अब ग्रामीण ही कंपनी के मालिक हैं और कंपनी के मुनाफे में उनका ही हक होगा।

इस परियोजना के लिए बनाए गए बजट के अनुसार 1 मेगावाट की विद्युत इकाई से यदि सिर्फ  800 किलोवाट विद्युत का उत्पादन भी होता है तो र्वतमान बिजली के रेट 3.90 रुपया प्रति यूनिट के हिसाब से एक घण्टे में 3120.00 रुपये, 24 घण्टे में 74,880.00 रुपयेे और एक माह में 22,46,400.00 रुपये की इनकम होगी। इसी तरह यह आंकड़ा, सालाना 2,69,56,800.00 रुपयेे हो जाएगा। ढाई करोड़ से ऊपर की इस सालाना कमाई से इन गाँवों की आर्थिकी सुदृढ़ हो सकती है। ये गाँव स्वावलम्बी बन सकते हैं। बजट के अनुसार लोन की 4 लाख प्रतिमाह की किस्तों को भरने के अलावा, परियोजना के 10 से 15 लोगों के स्टाफ की 3.25 लाख प्रति माह तन्ख्वाह, मेंटेनेंस के 2.50 लाख के साथ ही 200 शेयर धारकों को 5000 से 8000 रूपया प्रतिमाह शुद्ध लाभ भी होगा। एक बार हाइड्रो पावर परियोजनाओं का निर्माण कार्य पूरा हो जाय तो उसके बाद इससे ऊर्जा प्राप्त कर लेना बेहद सस्ता होता है। नदियों में बहता पानी इसके लिए सहज प्राप्य कच्चा माल होता है। 

यात्रादल द्वारा रखा गया यह विकल्प असल अर्थों में पहाड़, देश और दुनिया के समूचे विकास मॉडल के लिए चुनौती भरा है। इसके केंद्र में मुनाफे के बजाय असल अर्थों में उस जनता का विकास है जिसके विकास की हर जगह दुहाई दी जा रही है। पर दुनिया भर के विकास के मॉडल को चुनौती देते इस विकल्प के सामने खुद कुछ बड़ी चुनौतियां हैं। जिनसे उबरना अभी बाकी है। इस यात्रा के बाद मैं, टिस में माईक्रो हाईडिल के समाजशास्त्र पर अध्ययन कर रहे मेरे मित्र अंकुर, सरयू हाईड्रो इलैक्ट्रॉनिक्स पावर प्रोड्यूसरर्स लिमिटेड के युवा अध्यक्ष राम सिंह और अन्य सदस्यों के साथ प्रस्तावित परियोजना वाले गाँव रस्यूना भी गया। सिर्फ  महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों वाले इस गाँव में मुश्किल से दो युवकों से मुलाकात हुई। बाकी सारे युवक रूद्रपुर, देहरादून, दिल्ली आदि शहरों में नौकरी करते हैं। वहीं से वे जो कुछ खर्चा भेजते हैं वही इस गाँव को जियाए हुए है। सामने बहती नदी है। बस यूं ही बह कर चली जाती है। खेत हैं जिनमें कुछ अनाज उगता है। जो साल भर के खुद के लिए ही नहीं हो पाता। पेड़ों में आम और अन्य भतेरे फल लगते हैं। कुछ गाँव वाले खाते हैं ज्यादा बरबाद चले जाते हैं। क्योंकि सात किलामीटर पैदल और फिर गाड़ी से शहरों में बेचने जाने का ढुलान ही इतना पड़ता है कि उतना तो फलों को बेचकर मुनाफा भी नहीं हो पाता।  

यहीं मैं एक घर के सामने बैठ इस परियोजना के एक सदस्य ग्रामीण से बात कर रहा था। उसे उम्मींद थी कि ये परियोजना जरूर इस गाँव का नक्शा बदल देगी। लेकिन उसे एक खतरा सता रहा था। उसने मुझे कहा, "इस परियोजना की लागत 4 करोड़ रूपया है। हम गरीब गाँव वाले बैंकों से 10-20 हजार का कर्जा लेने से भी डरते हैं। इस परियोजना के लिए 4 करोड़ का कर्जा हम कैसे जुटाएंगे?" इस परियोजना का यही यक्ष प्रश्न है। इससे गाँव वालों से ज्यादा उन आंदोलनकारियों को निपटना है जो चाहते हैं कि सरयू और बाल गंगा नदी पर ये परियोजनाएं समूचे हिमालय के लिए मिशाल बनें। 

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