Tuesday 30 April 2013

हम भी बरतें सावधानियां तो रुकेंगे अपराध


किसी भी आम हिंदुस्तानी परिवार की तरह हमारे घर में भी कुछ बातें वर्जित थी। अपने शरीर के बारे में हमें बात करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि क़ुदरती तौर पर शरीर में आनेवाले बदलावों के बारे में भी कभी किसी ने कोई बात नहीं की। एक मां थी जो दबे-सहमे शब्दों में टुकड़े-टुकड़ों में वो बातें बताने की कोशिश करती थी, जिसे आज की तारीख़ में सेक्स एजुकेशन कहा जाता है।

मुझे याद है कि मैं तीसरी या चौथी में थी जब मां ने सिखाया था कि मुंह कब बंद नहीं रखना है। मां ने सिखाया कि सही तरीके से छूना क्या है और ग़लत तरीके से तुम्हारे शरीर को कोई छूने की कोशिश करे तो उसकी प्रतिक्रिया में क्या करना चाहिए। मां ने सिखाया था कि शरीर के कुछ हिस्सों को छूने की इजाज़त किसी को नहीं है, और अगर ऐसा हो तो चिल्लाओ। दूसरों का ध्यान आकर्षित करो। डरो मत। चुप मत रहो।
अब अपने साढ़े छह साल के बच्चों को इन सारी बातों की जानकारी देने का दारोमदार मेरे सिर आ गया है। मैं परेशान इसलिए हूं क्योंकि बच्चों ने पढऩा सिखा नहीं कि उनके आस-पास अख़बारों में दिखाई देने वाले मुख्य शब्द 'बलात्कार', 'यौन हिंसा' और 'हिंसा' हैं। हर मां-बाप की तरह, समाज के एक जि़म्मेदार नागरिक की तरह मुझे भी पतनोन्मुख समाज को देखकर बेहद चिंता होती है। लेकिन इसका हल क्या है? एक जि़म्मेदार नागरिक की तरह हमें भी ये सोचना होगा।


मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों से खुलकर वो सारी बातें करनी चाहिए जो जानना उनका हक़ है। उन्हें हर तरह की परिस्थिति से जूझना सिखाते हुए आवाज़ ऊंची करना और चिल्लाना भी सिखाना चाहिए। उन्हें अनजान लोगों से दूरी बनाए रखना भी सिखाना चाहिए। बाकी, उनकी सुरक्षा हमारी जि़म्मेदारी है ही। मैं इस मामले में कुछ ज़्यादा सनकी हूं, लेकिन अपने बच्चों को किसी अनजान, यहां तक कि दोस्त या रिश्तेदार के पास छोडऩे पर भी मैं यकीन नहीं करती। तब तक तो बिल्कुल नहीं जबतक बच्चा स्वरक्षा करना न सीख जाए।

दूसरा रास्ता अपने आस-पास के अपराधियों की पहचान करना भी है। कई तरह के रिसर्च से साबित हो चुका है कि बच्चों का या किसी भी किस्म का यौन-शोषण करने वाले एक ख़ास किस्म का पैटर्न दर्शाते हैं। यौन-शोषण एक ऐसी आदत है जो किसी की फितरत का हिस्सा होती है। ऐसे अपराधी एक बार का शिकार करके नहीं मानते। उन्हें बार-बार शिकार करने की आदत होती है। हमने और आपने अगर एक बार अपराधी को माफ़  किया है तो यूं समझ लीजिए कि उसे शह दी है हमने। उस अपराध में फिर हम उतने ही भागीदार माने जाएंगे। इसलिए, आवाज़ उठाईए, चुप मत रहिए। एक चुप्पी कई तकलीफों का सबब बनती है।

स्कूल में सेक्स एजुकेशन को सिलेबस में ठीक उसी तरह जगह दी जानी चाहिए जैसे विज्ञान और समाजशास्त्र को दी जाती  है। उन्हें खुलकर बात करने का मौका दिया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए। ये याद रखिए कि हम जितना छुपाएंगे, बच्चे उतने ही तरीके से जानकारियां इक_ी करेंगे और ज़्यादातर मामलों में ये जानकारियां अधकचरी होंगी। इसके अलावा, अपने बच्चों के स्कूल में अपने बच्चों के शिक्षक-शिक्षिकाओं से संवाद बनाए रखिए। उन्हें ये महसूस कराईए कि आपको ठीक-ठीक मालूम है कि आपके बच्चों की जि़न्दगी में क्या चल रहा है। हमारी थोड़ी सी कोशिश और हमारे संवाद बनाए रखने से हम अपने बच्चों को सुरक्षा तो दे ही रहे हैं, उन्हें सही संस्कार भी दे रहे हैं। एक स्वस्थ समाज के निर्माण में हर अभिभावक की कोशिश अपना योगदान देती है।

मसला एक है, बच्चों के यौन शोषण के बढ़ते मामलों का। हो सकता है कि आंकड़ों में इज़ा$फा इसलिए हुआ हो क्योंकि ऐसे मामले प्रकाश में ज़्यादा आने लगे हैं। लोगों में हिम्मत आई है रिपोर्ट करने की। लेकिन मुद्दा ये नहीं। मुद्दा ये है कि एक सभ्य समाज में ऐसी घटनाएं होनी ही नहीं चाहिए। मुद्दा ये है कि इन्हें रोका कैसे जाए? यह भी   सच है कि बाल यौन शोषण को लेकर हमारे देश में कानून भी बहुत  लचर हैं, और कानून यूं भी किसी  आपराधिक मामले में रोकथाम का  काम तो करता नहीं। अगर ऐसा ही  होता तो फांसी की सज़ा के   बावजूद हत्याओं के मामले कम न हो जाते?   मुद्दा यह है कि एक समाज के तौर   पर हम क्या कर सकते हैं? ये भी    याद रखिए कि हमारी तरफ  से उठाया   हुआ हर क़दम, हमारी तरफ़  से बरता गया हर एहतियात एक ना एक अपराध को होने से रोकता है, किसी ना किसी को सुरक्षा देता है।

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