Tuesday 16 April 2013

गाँव जिन्होंने ली है दहेज़ न लेने की कसम

पंकज कुमार

उसियां (गाजीपुर,उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के उसियां गाँव के लोगों ने दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए एक अभूतपूर्व कदम उठाया है जो पूरे देश के लिए एक मिसाल है। 10 मार्च 2013 को उसियां गाँव के लोगों ने आस पास के गाँव वालों को बुला कर दहेज़ प्रथा को रोकने के लिए एक कमेटी का गठन किया और इस कमेटी को नाम दिया 'इस्लाही कमेटी' । इस्लाही कमेटी का एक ही मकसद है समाज से दहेज़ प्रथा को ख़त्म करना।

भारत में लाखों ऐसे परिवार  है जो दहेज़ ना दे पाने के कारण अपनी बेटियों का विवाह अच्छे घर में नहीं कर पाते हैं। दहेज़ के  नाम पर लाखों बहू-बेटियों को ससुराल में प्रताडि़त किया जाता है। भारत के थानों में कुल 50  प्रतिशत मामले दहेज़ के ही होते हैं। दहेज़ के खिलाफ तमाम कानून होने के बावजूद भी दहेज़ प्रथा को आज तक नहीं रोका जा सका, शायद यही एक वजह है कि दहेज़ प्रथा के खिलाफ एक सामाजिक आन्दोलन की ज़रुरत हमेशा महसूस की गयी है ।

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है इससे पहले भी इस गाँव में ऐसे कदम उठाये जा चुके हैं, अगर इतिहास के पन्नों पर गौर करें तो साल 1910 में भी यहां राजपूत मुसलमानों ने समाज से कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए एक समिति बनायी । जिसे साल 1935  में 'अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार -ओ -बार' नाम से  रजिस्टर्ड कराया गया। इस समिति का मुख्य काम समाज से कुरूतियों को मिटाना था जिसमें से दहेज़ एक प्रमुख कुरीति थी ।

 हालांकि समय के साथ-साथ इस कमेटी में बहुत से बदलाव हुए और यह कमज़ोर भी पड़  गयी, साल 1999 में यह पूरी तरह से ख़त्म हो गयी लेकिन 10 मार्च 2013 को डॉक्टर सलाहुद्दीन खान के नेतृत्व में इस्लाही कमेटी का गठन  फिर से  किया गया, जिसमे आस-पास गाँवो  के करीब 10 हज़ार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे जिसमे पूर्व सांसद अफजाल अंसारी, भदौरा ब्लाक प्रमुख कलाम खान, छत्तीसगढ़ के  एड़ीजी वजीर अंसारी, अशफाक खान और आस पास के गाँवो के  सभी ग्राम प्रधान भी  शामिल थे। क्षेत्र के सभी लोगों ने मिल कर दहेज़ प्रथा को समाज से ख़त्म करने का संकल्प लिया ।

इस्लाही कमेटी के अन्दर आने वाले गाँवो की कुल संख्या आज 125 से ज्यादा है  जिनमे  गाजीपुर, बलिया और पड़ोसी राज्य बिहार के भी कुछ गाँव शामिल हैं । इस्लाही कमेटी ने दहेज़ को ख़त्म करने के लिए कुछ नियम-कानून भी बनाये हंै जो इसके अन्दर आने वाले सभी गाँवो पर लागू होता है । अगर कोई परिवार इसके कानूनों को नहीं मानता है तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।

 इस्लाही कमेटी के ही एक सदस्य अशफाक खान कहते है कि  "अगर कोई इस्लाह कमेटी के खिलाफ जा कर दहेज़ लेता या देता है तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता  है और उसके घर में होने वाली किसी भी शादी - विवाह समारोह में गाँव का कोई भी सदस्य शामिल नहीं होता है।"

इस्लाही कमेटी द्वारा बनाये गये कानून की वजह से यहाँ के कमज़ोर परिवारों ने राहत की साँस ली है। उसियां गाँव के ही एक 21 वर्षीय युवक मोदास्सिर कहते हैं, "यह समाज के लिए यह एक बहुत ही ज़रुरी चीज़ है। अक्सर दहेज़ के कारण गरीब बेटियों की शादी नहीं हो पाती है या वो ख़ुदकुशी कर लेती है या उनके माँ - बाप ख़ुदकुशी कर लेते है इन सब चीजों को देखते हुए इस्लाह की ना सिर्फ उसियां में बल्कि पूरे देश में जरुरत है।"

इस्लाही कमेटी द्वारा बनाये गये कुछ प्रमुख कानून निम्नलिखित है जिसमे बारात से लेकर विदाई तक की हर रस्म  के लिए नियम और कानून है । 


  • इस्लाही कमेटी के अनुसार 'छेंका(इंगेजमेंट)' की रस्म को ख़त्म किया जाय, क्योकि इसमें रूपये और रिंग देने का चलन है जो दहेज़ का प्रतीक है ।
  • भारी-भरकम बारात ले जाने पर भी पाबन्दी लगायी गयी है क्योंकि आमतौर पर बारात में बहुत ज्यादा लोग जाते है, जिससे लड़की वालों पर नाजायज खर्च का बोझ पड़ता है । इस्लाही कमेटी के अनुसार बरात में सिर्फ 7 लोग ही जा सकते हैं जिसमे काजी, नाऊ और ड्राईवर भी शामिल है। लड़के के लिए बारात में जाना ज़रुरी नहीं है, अगर वो चाहे तो जा सकता है  लेकिन सभी लोग एक ही गाड़ी में आयें। एक से ज्यादा गाड़ी ले जाने पर भी पाबन्दी है । 
  • खाने में भी सिर्फ एक तरह का ही व्यंजन होगा । 
  • इस्लाही कमेटी के अनुसार शादी -समारोह में टेंट, गाजे -बाजे की नुमाइश पर भी रोक की बात की गयी है । 
  • लड़के की तरफ से लड़की के लिए सिर्फ एक जोड़ा कपड़ा और दो तोले सोने की रकम के बराबर जेवरात ले जाने की इजाजत है । लेकिन लड़की की तरफ से लड़के को इस मौके पर सोने की चेन, अंगूठी या नगद रकम ना दी जाये । 
  • यदि लड़की वाले चाहें तो दहेज़ में सिर्फ 21 जोड़े कपड़े लड़की को दे सकते हैं इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा 2 तोले सोने की रकम के बराबर जेवरात, एक सिलाई मशीन, एक पलंग, एक तोशक, चादर और तकिया, जानेमाज़ और कुराने पाक दे सकते है । 


इस्लाही कमेटी की कार्यप्रणाली


  • हर खानदान का एक सदस्य होगा जो अपने  पूरे परिवार की निगरानी करेगा। 
  • खानदान के बाद प्रत्येक गाँव से एक सदस्य होगा जिसे सदर कहते है हर गाँव के सदर के ऊपर यह जि़म्मेदारी  होगी कि अपने-अपने गाँव में इस्लाही कमेटी के नियम लागू करे और निगरानी करे। 
  • सभी गाँवो के सदर को मिला कर एक सेंट्रल कमेटी होगी जो इस्लाह में आने वाले सभी गाँवो की निगरानी करेगी।



कमेटी के सबसे बड़े गाँव उसियां के सदर अशफाक खान से बात-चीत: 


सवाल: इस्लाही कमेटी को गठित करने का उदेश्य क्या है ?

जवाब: साल 1910 में जब राजपूत से कन्वर्ट होकर लोग मुसलमान बने तो यहाँ शादी विवाह से सम्बंधित बहुत ज्यादा कुरीतियां थी लोगों को लग रहा था की कुछ बदलाव की बहुत ज़रुरत है इसी को देखते हुए इस कमेटी का गठन किया गया जिसे 1935 में 'अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार -ओ-बार, दिलदार नगर, गाजीपुर' के नाम से पंजीकृत कराया गया लेकिन समय के साथ साथ इसके स्वरूप में भी बदलाव होते गये और सदी के अंत तक आते-आते यह कमज़ोर पड़  गया और 1999  में फिर से वही बदगुमानी शुरू हो गयी और यह पूरी तरह से ख़त्म हो गया। अब फिर यहां पर लोगों को उसकी ज़रुरत महसूस हुई और इसे पुन: गठित किया गया। अब यह इस्लाही कमेटी ना केवल दहेज़ को रोकने का काम कर रही है बल्कि शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य भी कर रही है ।

सवाल: इसमें कुल कितने गाँव शामिल हैं ? 

जवाब: जब इसका गठन हुआ तो इसमें सिर्फ 46 गाँव ही शामिल थे लेकिन समय के साथ इसमें और भी गाँव जुड़ते चले गये । आज इसमें 125  से ज्यादा गाँव शामिल है जिसमें गाजीपुर, बलिया और पड़ोसी राज्य बिहार के भी कुछ गाँव शामिल हैं ।

सवाल: इस्लाही कमेटी कैसे काम कर रही है ? 

जवाब: ऐसा  है की हर गाँव में हम एक कमेटी बनाते है और गाँव की कमेटियां मिल कर एक सेंट्रल कमेटी बनाती है और सभी काम सेंट्रल कमेटी ही डील करती है । वहां जो फैसला लिया जाता है वो गाँव की कमेटियों को दिया जाता है और गाँव के सदर इसको गाँव में लागू करते हैं और फिर मौके-मौके से हम पूरे इलाके की आम सभा बुलाते हैं।

सवाल: आप लोग अच्छा  कार्य कर रहे हैं तो क्या इसमें क्षेत्रीय प्रशासन, विधायक या सांसद का सहयोग मिल रहा है ? 

जवाब: नहीं ऐसी कोई मदद नही मिलती है। यदि विधायक या सांसद  को हम बुलाएं तो आने के लिए तो बहुत सारे लोग आएंगे पर हम लोग किसी को नहीं बुलाते हंै क्योंकि राजनीति इतनी  ज्यादा प्रदूषित हो चुकी है कि वो अगर आयेंगे तो सिर्फ राजनीति की बात करेंगे, समाज की बात तो करेंगे नही,  इसलिए हम लोग इनसे बचते हैं ताकि पोलिटिकल डिवीजऩ ना आ जाये ।

सवाल: आज-कल समाज में दहेज़ स्टेटस सिम्बल भी बन गया है, जिनके लड़के अच्छी नौकरी कर रहे हैं वो अच्छे पैसे की डिमांड करते है ऐसे बहुत से परिवार है जो दहेज़ लेना चाहते हैं तो क्या ऐसे परिवारों से इस्लाही कमेटी को  विरोध या आलोचना झेलनी पड़ी ?

जवाब: थोडा-बहुत ! जहां-तहां से तो होता ही रहता है, लेकिन इसने प्रभावित नहीं किया। पर हां ऐसे लोगों की तादात यहां बहुत कम थी ।

सवाल: अगर आपके गाँव के ही लोग या आपके समुदाय के लोग नहीं मानते हैं और दहेज़ लेते हंै तो इस्लाही कमेटी का अगला कदम क्या  होगा ?

जवाब: देखिये ऐसा है कि हम उसका पूरी तरह से बायकॉट कर देते हैं ना ही हम लड़ाई करेंगे और ना ही झगड़ा ! अगर कोई लड़का वाला ज़बरदस्ती करता है कि नहीं हमें पैसे चाहिए तभी हम तुम्हारी लड़की से शादी करेंगे तो उस इलाके का कोई भी सदस्य उसके लड़के से शादी नहीं करेगा और ना ही उसके किसी प्रोग्राम में कोई जायेगा और ना ही अपने किसी प्रोग्राम में बुलाएगा ।

सवाल: मान लीजिये कि यदि दो परिवार एक दूसरे की रज़ामंदी से दहेज़ लेते देते हैं और पूरी शान-ओ-शौकत से होटल में शादी करते हैं जिसमें इस्लाही कमेटी के नियमों को ताक पर रख दिया गया हो तो इस्लाही कमेटी क्या करेगी ? 

जवाब: देखिये अगर शादी कमेटी के इलाके में हो रही है तो शादी हमारा जो नियम है उसी से होगी, या तो आप उस क्षेत्र से बाहर जाकर शादी करिए जो इस्लाह कमेटी में ना जुड़े हों । यदि आप लखनऊ , कानपूर में जाकर शादी करते है और दहेज़ लेते हैं तो हम आपको टच नहीं करेंगे क्योंकि हिन्दुस्तान बहुत लम्बा-चौड़ा है हम अपने क्षेत्र में ही रहेंगे और यहाँ इस्लाही कमेटी के अनुसार ही शादी होगी ।

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