Tuesday 30 April 2013

खेत जलाया तो खत्म हो जाएगी उर्वरा शक्ति


भास्कर त्रिपाठी

लखनऊ। क्या आप भी गेंहू की कटाई के बाद खेत में बचे फ सल के अवशेष को जलाने जा रहे हैं? रुकिए, ऐसा मत कीजिए, वरना आपके खेत का उपजाऊपन खत्म हो जाएगा।

लखनऊ के उत्तर में लगभग 35 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले के देवरा गाँव के किसान अरविंद बाजपेई ने भी अपने खेतों में गेंहू बोया था। लगभग 25 बीघा खेत में बोए गेहूं की फसल अरविंद ने कुछ दिन पहले ही कंबाइन मशीन से कटाई करवाई है। कटाई के बाद खेत में बचे गेंहू की फ सल के अवशेषों में से कुछ का तो अरविंद ने जानवरों के लिए भूसा तैयार करवाया और बचे हुए अवशेष को खेत में ही जला दिया। ''एक हमारे साथी किसान ने बताया था कि खेत में जो अवशेष बचे उसे जला दिया करो, इससे बढिय़ा खाद तैयार हो जाती है। जिससे मिट्टी लंबे समय तक अच्छा उत्पादन देती है।'' अरविंद(33) बताते हैं। अरविंद की तरह ही अन्य किसानों में भ्रांति है कि खेत में ही अवशेष जला देना मिट्टी के लिए अच्छा होता है। पर यह तरीका बिल्कुल गलत है।

''खेत में बचे अवशेषों को जला देने से ज़मीन में मौजूद सारे कार्बनिक तत्व जल जाते हैं। जिस वजह से आगे की खेती के लिए जमीन उपजाऊ नहीं बचती। दूसरी बात यह कि आग की वजह से खेत की सतह का तापमान बहुत ज़्यादा हो जाता है जिससे मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। किसानों को चाहिए कि जुताई करके और हो सके तो पानी देकर खेत को छोड़ दें। सिंचाई या वर्षा का पानी पड़ते ही गेंहू के अवशेष खुद ही गल जाएंगे और भूमि की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाने में मदद करेंगे।'' डॉ वीके मिश्रा बताते हैं। डॉ मिश्रा, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के लखनऊ केन्द्र के प्रमुख वैज्ञानिक हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) की फ सल के अवशेषों के प्रबंधन पर जारी रिपोर्ट 'क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट विद कंज़र्वेशन एग्रीकल्चर (2012-13)' में बताया गया है कि भारत में हर साल लगभग 500 मीट्रिक टन फ सल का अवशेष या अपशिष्ट बचता है। जिसका सबसे बड़ा भाग यूपी से आता है लगभग 60 मीट्रिक टन। अपशिष्ट का 80 प्रतिशत हिस्सा अनाजों (मुख्यत: चवाल और गेहूं) से तैयार होता है। अवशेषों का कुछ ही भाग चारा बनाने या अन्य कामों में खपता है और शेष बचा एक बड़ा भाग लगभग 25 मीट्रिक टन, हर साल खेतों में ही जला दिया जाता है।

फ सल के अपशिष्ट में लगातार हो रही वृद्धि के कारणों को भी इस रिपोर्ट में समझाया गया है। जिनमें से मुख्य हैं, 1. देश में मवेशियों की लगातार घटती संख्या जिसकी वजह से फ सल के अपशिष्टों का प्रयोग चारे के रूप में घटा है। 2. फ सलों की कटाई में कंबाइन का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है जिसका सबसे बड़ा कारण है मजदूरों का न मिलना। कंबाइन मशीन गेहूं जैसी फ सल को सतह के काफी  ऊपर से काटती है जिससे अवशेष ज़्यादा मात्रा में बचते हैं।   अनाज उत्पाद में आगे उत्तर भारत के राज्य पंजाब, हरयाणा और उत्तर प्रदेश की तो तकरीबन 75 प्रतिशत फ सल की कटाई कंबाइन से ही होती है। तो इन राज्यों में फ सल के अवशेषों का बड़ी मात्रा में बनना स्वाभाविक है। तमाम रिपोर्टों में बताए गए इन महत्वपूर्ण कारकों के अलावा भी एक वजह है जो किसी दस्तावेज़ में नहीं लिखी जाती। जिसके कारण हजारों किसान अपने खेतों को जलाकर धीरे-धीरे उसका उपजाऊपन खत्म करते जा रहे हैं।

यह वजह है जानकारी का आभाव। जानकारी की कमी की वजह से ही लखनऊ के उत्तर में 30 किलोमीटर दूर बसे शाहपुर गाँव के किसान शैलेश की आवाज़ में अचानक मायूसी कौंध आई। "हमें तो पता ही नहीं था कि ज़मीन खराब हो जाती है। लमसम 15 बीघा खेत में गेंहू टवाया है अभी और जो कुछ बचा था खेत में उसे जला दिया।" 30 साल के शैलेश धीमी आवाज़ में कहते हैं।

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