Wednesday 6 March 2013

मोटापे से ग्रस्त देश में भी भूख से मरते हैं लोग



शिकागो (अमेरिका) जो देश इतना मोटा है वो इतना भूखा भी क्यूँ है? मैं अमेरिका ही की बात कर रहा हूँ।
अमेरिका के लोगों से जुडे आंकड़े एक विस्मयकारी बात सामने लाते हैं। एक ओर जहाँ मोटेपन की इतनी बड़ी समस्या है वहां दूसरी तरफ  भूख का भी उतना ही बड़ा मसला। यह विरोधाभास समझना थोड़ा मुश्किल है।
लगभग छह करोड़ लोग, यानि की कुल आबादी का बीस प्रतिशत, लाज़मी तौर पर मोटेपन के बीमारी के शिकार करार दिए गए हैं। यह छह करोड़ लोग बीस साल या उससे अधिक उम्र के हैं करीब नब्बे लाख बच्चे जितना होना चाहिए उस से ज्यादा वजऩ वाले पाये गये।

जहां तक भूख का प्रश्न है, पांच करोड़ अमेरिकी लोग इस की गिरफ्त में माने जाते हैं। आंकड़े यह भी कहते हैं कि हर चार में से एक बच्चा भूखा है इस देश में।

दुसरे मुल्कों में, विशेषकर भारत में, अमेरिका की यह छवि स्वीकार करना एक कठिन बात होगी क्योंकि वैसे इस देश को बड़ा ही समृद्ध और दूध और खुराक से लदबद मन जाता है। वो काफ हद तक सही भी है मगर पिछले कुछ सालों में यहाँ की आर्थिक व्यवस्था ने ऐसा मोड़ लिया है कि गऱीबी बढ़ी है और लोगों की खरीदने की शक्ति कम हुई है।

रोज़मर्रा के जीवन में शायद बड़ी-बड़ी दुकानों में घूमने से पता चलना मुश्किल है कि जहा एक और सैकडों तरह के खाने के पदार्थ उपलब्ध हों वहां खेत खलिहानों में ज़बरदस्त सल हो, जहां एक खरीदने से दूसरा मुफ्त मिलता हो और जहां लोग अक्सर खाते नजऱ आते हो भला वहां पांच करोड़ लोग भूखे हो ये कैसे?
इसका मूल कारण खाने की कमी नहीं है बल्कि इन पांच करोड़ लोगों के पास उसको खरीदने की शक्ति नहीं रही। और मैं सिर्फ  नानाप्रकार के स्वादिष्ट भोजन की बात नहीं कर रहा। यहाँ तक की साधारण खाना जिससे स्वास्थ्य बना रहे वो भी बहुत सारे लोगों के नसीब में नहीं। इसका परिणाम यह होता है कि लोग घटिया किस्म की जल्दी बनने वाली, जिसको की इंस्टेंट फ़ू कहते हैं, खाते हैं, जिससे पोषण तो दूर कभी-कभी पूरी तरह भूख भी नहीं मिटती। इस के लस्वरूप यह भी होता है कि कैलोरी मिलती हैं जो सीधा चर्बी का स्वरुप धारण कर लेती हैं जिससे मोटापन होता है।

ऐसे लाखों परिवार हैं अमेरिका में जो हर रोज़, सुबह और शाम, एक ही तरह का खाना खाते हैं जिस में पोषण की मात्रा के बराबर होती है। भूख और मोटेपन का मामला इतना संगीन हो चला है कि अब यहां की आनेवाली पीढ़ी क्या अपने मानसिक विकास पर खतरा मोल लेगी, ऐसे सवाल उठ सकतें हैं। जब चार में से एक बच्चा इस कदर भूखा हो कि उसको मानो एक बीमारी ही कहा जाए तब तो इस तरह की चर्चा होना कोई हैरानी की बात नहीं है।

हां यह ज़रूर है कि अमेरिका और भारत के बीच भूख की परिभाषा में बड़ा अंतर हो सकता है। लेकिन वो इतना भी नहीं कि जिसको यहां बीमार के तौर पर भूखा माना जाता हो वो भारत में हट्टा- कट्टा समझा जाए। चौंका देने वाली बात यह है कि यहां सरकार की ओर से फ़ ूड स्टैम्प्स यानि की खाना खरीदने के लिए पैसा, दिया जाता है उन तबकों के लोगों को जो खुद नहीं खरीद पाते। उस के बावजूद भी इस कदर भूख का होना एक गहरी राष्टï्रीय समस्या बन गयी है।

भूख और मोटेपन के बीच और कोई मेल हो हो इतना ज़रूर है कि क्योंकि बहुत सारे भूख के शिकार लोग सस्ता, चर्बी से भरा खाने पर मजबूर हो जाते हैं। इसका एक और परिणाम यह भी है कि स्वास्थ्य बहुत बिगड़ता है जिससे देश को दवाइयों और अस्पतालों पर भी बड़ी धनराशी लगानी पड़ती है। बिमारियों का एक दूसरा असर लोगों के कम करने की क्षमता पर ही सीधा होता है। इस की वजह से देश को भरी मात्रा में आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।

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