Wednesday 6 March 2013

चार दीवारों में बंद एक गुनाह


 'मां, चाचा मुझे तंग करते हैं, मुझे वो बिलकुल अच्छे नहीं लगते'

''चुप पगली, कुछ भी बोलती रहती है, चाचा हैं वो तेरे पापा के सगे छोटे भाई। वो क्यों तंग करेंगे तुझे, वो तो कितना प्यार करते हैं तुझसे। ज़रूर तूने ही कुछ किया होगा, उन्हें परेशान करने के लिए''

मां के मुंह से ये शब्द सुन कर 6 साल की बबली सहम कर रह गई। बहुत हिम्मत जुटाई थी उसने मां से चाचा की शिकायत करने के लिए। कई दिन से अकेले में गुमसुम उदास रहने के बाद उसने मां से बात करने का सोचा था। नन्ही सी उम्र में वो ये तो नहीं समझ पाती थी कि मोहन चाचा उसके साथ क्या कर रहे हैं पर उसे ये ज़रूर लगता था कि कुछ तो ग़लत हो रहा था। उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता था जब चाचा उसे इधर-उधर छूते थे। उसका मासूम मन सवाल करता था कि क्यों चाचा  हमेशा अकेले में ही उसे छूने की कोशिश करते हैं। क्यों उसे अंधेरे कोनों में ले जाकर खुद को सहलाने को कहते हैं। ऐसे जाने कितने सवाल उस छोटी सी जान को हर वक्त सताते थे।

लेकिन आज मां ने एक डांट में ही सारे सवालों पर विराम लगा दिया। मां से ही तो सारी उम्मीद बंधी थी, उन्हीं को तो वो सब कुछ बता सकती थी कि कैसे  उसको चाचा का छूना और चाचा को छूना, दोनों ही किस कदर तकलीफ  दे रहे थे। मां से ही तो पूछ सकती थी कि ''चाचा ऐसा क्यों कर रहे हैं मेरे साथ।''

बबली जैसे जाने कितने मासूम हमारे देश में यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं। आंकड़ों की माने तो 50 ीसदी से ज़्यादा बच्चे इस घिनौने अपराध का शिकार हैं। एक ऐसा अपराध जो हमारे समाज के बनाए रिश्तों के तानों बानों के नीचे ढका छुपा रहता है और पनपता रहता है। सबसे ज़्यादा दुख की बात ये है कि बच्चों का शोषण करने वाला कोई बाहरी आदमी नहीं, ज़्यादातर कोई अपना ही होता है, मामा, चाचा, भाई, अंकल, दादा, नाना और कई बार अपना ही पिता भी। यही वजह है कि बच्चे उस 'अपने सगे' की शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जो बच्चे जैसे तैसे हिम्मत जुटाते हैं उनमें से ज़्यादातर बबली की तरह झिड़क दिए जाते हैं। कुछ बच्चे इशारों-इशारों में बताने की कोशिश करते हैं लेकिन ज़्यादातर माता-पिता को इतनी ुर्सत नहीं होती कि वो उन इशारों को पढ़ सकें।

बाल यौन शोषण एक ऐसा गुनाह है जिसके ज़ख्म सारी उम्र साथ नहीं छोड़ते जबकि गुनाहगार को कोई सज़ा नहीं होती। जब इस अपराध के बारे में कोई बात ही नहीं करता, कोई शिकायत ही नहीं होती, किसी मासूस की आवाज़ ही नहीं उठती, उठती भी है तो सुनी नहीं जाती, तो सज़ा का सवाल ही कहां आता है। साल दर साल पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे बच्चे हमारे ही बीच रह रहे कुछ दरिंदों की हैवानियत का शिकार होते जाते हैं और हम समाज के नाम पर, परिवार, रिश्तों के नाम पर, खानदान की इज़्ज़त के नाम पर, तमाशबीन बन कर देखते रहते हैं। नतीजा, सहमे-सहमे डरे हुए बच्चे जो सारी जि़ंदगी अपने साथ हुए गुनाह का बोझ और उसके अपराध बोध के साथ जीते हैं।

जि़ंदगी लाइव में हमने कुछ साल पहले ऐसी ही जि़ंदगियां जी रहे कुछ नौजवानों से बात की। शो पर तीन लड़कियां, सीमा, अदिति और जया (बदले हुए नाम) और एक युवक हरीश अय्यर आए। उनमें से कोई घर के नौकर का, कोई पड़ोस में रह रहे अंकल का, कोई पड़ोस के भैया का तो कोई ट्यूशन टीचर का शिकार हुआ था। रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियां उन सब ने हमारे साथ बांटी। हर कहानी में कुछ बातें एक जैसी थीं, घरवालों की अनदेखी या नासमझी, बच्चों का डर, शोषण के बाद खुद से नफ रत और हीन भावना का अहसास और दूसरों पर से भरोसा उठ जाना।

मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि एक बच्चे की सबसे बड़ी ताकत, सबसे मज़बूत सहारा, सबसे करीबी और पहले दोस्त उसके माता-पिता होते हैं। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि हम अपने बच्चे को सुनने के लिए, उसके इशारों को समझने के लिए और उसके बिना कुछ कहे भी उसके हाव-भाव को पढऩे के लिए वक्त निकालें। सिर्फ  और सिर्फ  आप ही अपने बच्चे को इस घिनौने अपराध से बचा सकते हैं, और इसके लिए आपको एक बात सबसे पहले समझनी होगी कि इस दुनिया में कोई भी रिश्ता आपके अपने बच्चे से बढ़कर नहीं हो सकता। तो चलिए आज से ही शुरुआत करें। अपने बच्चे के पास बैठिए, उससे बातें कीजिए, उसको बताइए कि कोई भी उसको बेवजह छूने का हक नहीं रखता और अगर कोई छुए तो वो आपको कर बताए। विश्वास दिलाइए अपने बच्चे को कि आप उसको हर गुनाह से बचाएंगे चाहे गुनाहगार आपका कितना ही सगा क्यों हो।

(लेखिका आईबीएन-7 चैनल की पत्रकार हैं)

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