Tuesday 5 March 2013

फिल्मी पर्दे पर झलकते औरत के कई रंग


नेहा घई पंडित
गाजियाबाद। आज से सौ साल पहले जब हिन्दी फि ल्मों का सफ शुरू हुआ तो औरतों का फिल्मों में काम करना तो दूर की बात है उनका फिल्में देखना भी बुरा माना जाता था। शुरू-शुरू की फि ल्मों में औरतों के किरदारों को पुरुष ही अपना रूप बदलकर निभाया करते थे। धीरे-धीरे समाज बदला और औरतों को थोड़ी आजादी मिली, हालांकि फि ल्मों में काम करना अभी भी अच्छा नहीं माना जाता था, मगर कुछ साहसी औरतों ने इस क्षेत्र को चुना और हमारे हिन्दी सिनेमा को अपनी पहली महिला अदाकाराएं मिली। इनमें जुबैदा, नाडिय़ा और दुर्गा खोटे मुख्य अदाकाराएं थीं। शुरू की फि ल्मों में महिलाओं के किरदार बहुत सशक्क्त हुआ करते थे, मगर धीरे-धीरे औरतों का रोल छोटा होता गया और पुरुष प्रधान फि ल्में बनने लगीं।

हीरोइन का काम सिर्फ  कुछ सीन और 2-4 गानों तक सिमट कर रहने लग गया था। ज्यादातर फि ल्मों में हीरो के आसपास ही कहानी घूमती थी। हालांकि बीच-बीच में ऐसा दौर आता जाता रहा, जहां हीरोइनों को नाच-गाने के अलावा कुछ करने का मौका मिला। 1957 में आई मदर इंडिया ने एक औरत के जीवन का संघर्ष बखूबी पेश किया और नर्गिस की अदाकारी ने इस रोल में चार चांद लगा दिए थे। इसके अलावा मुगल--आजम, कागज के फू , गाइड, सीता और गीता, पाकीजा, गाइड जैसी कई फि ल्में आईं, जिसमें नारी का किरदार बहुत मजबूत था। हमारी हिन्दी फि ल्मी हिरोइनों को जब-जब भी मौका मिला है उन्होंने सिर्फ  अपनी खूबसूरती से, बल्कि अपनी अदाकारी से भी सबका दिल जीत लिया है। फि ल्म अभिनेता अनिल कपूर कहते हैं, "बॉलीवुड में अभिनेता ऐसी     फि ल्में करने से कतराते हैं, जहां कहानी औरत के किरदार के आसपास घूमती है। मैंने अपनी अधिकतर फि ल्में ऐसी ही की हैं, जिनमें मेरी हिराइन के किरदार पर ही फि ल्म की कहानी होती है। बेटा, जुदाई, लज्जा, बीवी नं 1 जैसी फि ल्मों में हिरोइन का किरदार मुझसे कहीं ज्यादा मजबूत था, मगर फि भी मैंने फि ल्में की और फि ल्में सफ भी हुईं। बल्कि मुझे लगता है कि महिलाओं पर बनने वाली फि ल्में बहुत अच्छी चलती हैं।"

पिछले 2-3 दशकों में औरत के किरदार में भी बहुत बदलाव आए हैं। जहां पहले वह अबला नारी दिखाई जाती थी, वहीं आज वह एक स्वतंत्र और अपने फैसले खुद लेती, जिंदगी के हर पल को जीती दिखती है। पहले की फि ल्मों में हिरोइन के मां-बाप उसकी शादी कर देते थे और फि वही संसार उसका सब कुछ होता था। उसका पति उसका देवता होता था। आज की हिरोइन यह फैसला खुद लेती है कि उसे किससे शादी करनी है, शादी करनी है या नहीं करनी है। पहले और अब की फि ल्मों की स्क्रिप्ट में भी जमाने के साथ अंतर आया है। जहां पहले औरत मज़बूर और रोकर जि़ंदगी की परेशानियां झेलती थी, वहीं आज की नारी आत्मविश्वास से भरी और परेशानियों का मुकाबला डट कर करती है। फि ल्म में पहले औरतों की मुसीबत उसकी सास या फि किस्मत की मार से आती थी लेकिन आज की औरतों की मुसीबत का टाइप भी बदल गया है। अब वह ऑफि की पॉलिटिक्स से जूझ रही है या फि अपने साथ हुए किसी अन्याय का बदला लेती नजऱ आती है। कभी राजनीति में सत्ता हाथ लेती है तो कभी अदालत में इंसाफ के लिए लड़ती है। फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर जो औरतों के किरदारों पर फि ल्म बनाते हैं, कहते हैं कि आज के दौर में हिरोइनों के लिए बहुत अच्छा समय है, क्योंकि अब कई निर्माता, निर्देशक ऐसी कहानियां बना रहे हैं जो सिर्फ नारी के किरदारों पर आधारित हैं बल्कि दर्शक भी ऐसी फि ल्मों को पसंद कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा निर्देशक ऐसी कहानियों को चुन रहे हैं जिसमें हीरोइन के करने के लिए बहुत कुछ है।

 दर्शक जब पैसे खर्च करके सिनेमा देखने जाते हैं तो वह यह नहीं देखने जाते कि फि ल्म की कहानी हीरो पर आधारित है या हिरोइन पर, बल्कि वह सिर्फ  एक अच्छी कहानी देखने जाता है। अगर कहानी अच्छी है, उसे रचनात्मक तरीके से पेश किया गया है, तो फि वह चाहे नायक के इर्द-गिर्द घूमती हो या फिर नायिका प्रधान हो इस बात से कुछ खास र्क नहीं पड़ता है।  

8 मार्च को महिला दिवस है और हर क्षेत्र की तरह सिनेमा के पर्दे पर भी औरत ने बहुत तरक्की कर ली है। मां, बहन, भाभी और प्रेमिका के किरदार निभाने के बाद अब वह फि ल्म का हीरो बन गई है। पहले वह कहानी की एक पात्र हुआ करती थी, अब फि ल्म की कहानी ही उस पर लिखी जाती है। महिलाओं पर आधारित कई ऐसी फि ल्में जो समाज में नारी की स्थिति को दर्शाती हैं। ऐसी ही कुछ महिला प्रधान विषय पर फि ल्में जिन्होंने सिर्फ  बॉक्स ऑफि पर अच्छी कमाई की है बल्कि कोई कोई सामाजिक संदेश भी दिया है। 

मदर इंडिया 
ऐसा हो ही नहीं सकता कि नारी प्रधान फि ल्मों का जिक्र हो और मदर इंडिया का नाम कोई भूल जाए। महबूब खान की यह फि ल्म बॉलीवुड के इतिहास में अपने आप में एक सुनहरा अध्याय है। एक ऐसी औरत की कहानी जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आत्म सम्मान को बनाए रखा। इस फि ल्म में औरत को त्याग और बलिदान जैसे गुणों को दिखाया गया है।


आंधी
1975 में आई यह फि ल्म एक महिला राजनेता की कहानी थी। कहा जाता है कि इस फि ल्म की कहानी उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जिं़दगी पर आधारित थी इसलिए इस फि ल्म को उस समय बैन कर दिया गया था, हालांकि बाद में इसे रिलीज कर दिया गया था। अभिनेत्री सुचित्रा सेन की पावरफु परफ ार्मेंस ने इस रोल को यादगार बना दिया। यह फिल्म महिला प्रधान फिल्मों में एक बेहतरीन फि ल्म है।



मिर्च मसाला 
1987 की यह फि ल्म एक गाँव की पृष्ठïभूमि पर बनी थी। फि ल्म में गाँव की एक गरीब महिला के अपने आत्म सम्मान और इज्जत के लिए सूबेदारों और गाँव के अन्य पुरुषों से लड़ाई दिखाई गई है। किस तरह साहस करके वह सिर्फ  अपने लिए आवाज उठाती है, बल्कि दूसरी औरतों के लिए भी मिसाल बनती है। इस फि ल्म को बेस्ट ीचर फि ल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। फि ल्म का अंत रोचक और प्रभावशाली है जिसमें गाँव की सारी औरतें मिलकर सूबेदार को अपने बनाए मिर्च मसालों से हमला कर अपनी लड़ाई जीत लेती हैं। फि ल्म में स्मिता पाटिल का किरदार फि ल्म के बाद भी आपके दिलो दिमाग पर छाया रहेगा।  

अर्थ 
नाजायज संबंधों पर बनी इस फि ल्म को अपने समय की दो बेहतरीन आदाकाराओं शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल ने अपने अभिनय से एक अलग ही पहचान दी। शबाना आज़मी एक ऐसी बीवी बनी जिसका पति उसे छोड़कर किसी और के पास चला जाता है। स्मिता पाटिल ने दूसरी औरत का किरदार निभाया है। फि ल्म की कहानी में दोनो के रोल को खूबसूरती से पेश किया गया। 1982 की इस फि ल्म के इतने संवेदनशील विषय को दो नायिकाओं ने दर्शकों तक बखूबी पहुंचाया।

दामिनी 
इस फि ल्म की कहानी रेप जैसे विषय पर आधारित थी। इस फि ल्म की कहानी और डॉयलॉग की छाप लोगों के दिल और दिमाग पर इस कदर हावी है कि पिछले साल दिल्ली में हुए एक लड़की के बलात्कार के बाद उस लड़की को दामिनी नाम दे दिया गया। फि ल्म में दिखाया गया कि एक बार बलात्कार होने पर इंसाफ  के लिए लड़ती एक लड़की को कैसे बार-बार अपने साथ हुए अन्याय को साबित करना पड़ता है। बलात्कार जैसे शब्द को कोई अपने मुंह पर लाना भी नहीं चाहता था, मगर इस फि ल्म ने इस कठोर विषय को दिखाकर लोगों को जगा दिया था। 1993 में इस फि ल्म ने एक सामाजिक संदेश भी दिया और बॉक्स ऑफिस पर भी सफ रही। 
    
बैंडिट क्वीन 
फू लनदेवी के जीवन पर आधारित इस फि ल्म को बहुत लोगों ने नाकारा और आलोचना भी की गई। इस फि ल्म में दिखाया गया कि जब औरत पर जु़ल्म होते हैं और वह सहती है तब तक वह कमजोर होती है, मगर जब वह बदले की भावना से भरी चट्टान के जैसे मज़बूत हो जाती है, तो वह समाज और कानून दोनों की परवाह नहीं करती है। 1994 मे आई यह फि ल्म विवादों में रहने के बावजूद एक ऐसी कहानी है जो बनाई और सुनाई जानी ज़रूरी थी, ताकि समाज में और फू लन देवी ना पैदा हों।
फि ल्म को बेस्ट ीचर फि ल्म और नायिका सीमा बिस्वास को बेस्ट अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 

क्या कहना
साल 2000 में आई यह फि ल्म बिन ब्याही मां की कहानी थी। कॉलेज में पढऩे वाली एक लड़की जब प्रैग्नेनंट हो जाती है और विवाह पूर्व ही मां बनने का फैसला करती है तो कैसे हालातों से लड़कर वह अपने फैसले पर डटी रहती है। इस फि ल्म में दिखाया गया कि हमारे समाज में लड़कों को सारी गलतियां करने पर भी माफ  कर दिया जाता है, मगर लड़कियों की एक गलती उनकी जिं़दगी का रुख ही मोड़ देती है। हमारे समाज की यह प्रवृत्ति है कि असहज मुद्दों को हम आसानी से दबा देते हैं। आजकल जब लड़के-लड़कियां आपस में साथ-साथ पढ़ते और समय बिताते हैं, वहां इस तरह के मुद्दों को उजागर करना बहुत ज़रूरी है।

अस्तित्व
हमारे समाज में औरतों और पुरुषों के लिए अलग अलग नियम हैं। पुरुष कुछ भी करे सब चलता है, मगर औरत ने अगर गलती से भी अपनी मर्यादा पार की तो समाज उस पर अलग कायदे लगा देता है। साल 2000 में बनी इस फि ल्म का नायक भी दोगली मानसिकता का शिकार है। वह खुद कई बार बेवफ ाई करता है मगर अपनी पत्नी से की गई एक गलती जिसके लिए उसकी बीवी शर्मिंदा भी है, उसे वह नहीं समझ पाता। जब उसका बेटा भी अपनी मां को गलत मानता है तो वह माफ मांगने के बदले घर  छोडऩे का फैसला करती है। तब्बू द्वारा दी गई एक जानदार परफ ॉर्मेंस और कुछ शानदार डॉयलॉग ने इस फिल्म से औरतों के प्रति समाज की उदासीन मानसिकता पर प्रकाश डाला।

डर्टी पिक्चर
इस फि ल्म में 3 हीरो थे मगर फि भी फि ल्म की असली हीरो इसकी हिरोइन यानी विद्या बालन थी। फि ल्म दक्षिण भारत की एक अभिनेत्री पर आधारित थी जिसने इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपना मुकाम बनाया।  उसका मानना था कि जो बात एक आदमी कर सकता है वही बात एक  औरत को भी करने का हक है। गलती करने का  हक सिर्फ आदमी को  ही नहीं मिला है। उसके हाथ सही.गलत जो मौका लगा उसे अपने ायदे के लिए इस्माल किया। 2011 में आई यह फि ल्म अपने विषय को लेकर काफ विवादों में थी मगर फि ल्म को हर वर्ग के लोगो ने  पसंद किया। 

ज्यादा से ज्यादा निर्देशक ऐसी कहानियों को चुन रहे हैं   जिसमें हीरोइन के करने के लिए बहुत कुछ है। जहां पहले औरत मज़बूर और रोकर जि़ंदगी की परेशानियां झेलती थी, वहीं आज की नारी आत्मविश्वास से भरी और परेशानियों का मुकाबला डट कर करती है। समय बदल रहा है। महिलाओं का किरदार बदल गया है। वह डरी सहमी नहीं बल्कि अकेले ही लड़ाई लडऩे को आतुर दिखती है।

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