Wednesday 6 March 2013

राष्ट्रनीति पर आधारित हों बजट



 बजट को कुछ लोग दिशाहीन, कुछ सन्तुलित तो कुछ उसे लोक लुभावन या चुनावी बजट बताते हैं। यदि बजट को राजनीति के नजरिए से बनाया और देखा जायगा तो ऐसा ही दिखेगा। आजाद भारत में पहली बार 26 नवम्बर 1947 को आर के शन्मुखम शेट्टी द्वारा पेश किए जाने के बाद से देश और प्रदेशों में हर साल बजट पेश होते रहे हैं। अन्तर यह है कि पुराने समय में बजट प्रस्तावों से आर्थिक राष्ट्रनीति का खुलासा होता था जिसकी साल भर प्रतीक्षा रहती थी पर अब वह नीति आधारित दस्तावेज नहीं रहा। साल भर आर्थिक अध्यादेश आते रहते हैं और इस साल भी 28 रवरी के पहले चुके हैं। सरकारें बदलने के साथ ही बजट की राजनीति तो बदलती रहती है परन्तु कोई राष्ट्रनीति नहीं बन पाई है। हमने गांधी का ग्रामस्वराज्य लाने की चेष्टा नहीं की और नेहरू का वैज्ञानिक सोच वाला नजरिया विकसित नहीं कर पाए।

कुछ समय के लिए जवान, किसान और स्वावलम्बन की चिन्ता दिखी थी परन्तु रक्षा उपकरण विदेशों से ही खरीदे जाते हैं और विवादों के घेरे में रहते हैं। किसान का अपमान भी होता है जब उसके द्वारा पसीना बहाकर उपजाया गया अन्न रेलवे स्टेशनों पर सड़ता रहता है। यदि हम अनाज का ट्रान्स्पोर्टेशन और उसका भंडारण नहीं कर सकते तो अनाज खरीदने में धन और मेहनत क्यों लगाते हैं। स्वावलम्बन की राष्ट्रनीति और उसके लिए धन व्यवस्था की तर्कसंगत कर प्रणाली भी दिखाई नहीं देती।

मौजूदा कर प्रणाली में वेतन भोगी कर्मचारियों की आयकर गणना आसान है। उन्हें 2 लाख तक की कर में छूट है परन्तु एक वकील, इंजीनियर, डॉक्टर, सोने चांदी का व्यापारी, पुलिस अधिकारी अथवा एमपी, एमएलए या मंत्री जब ार्म हाउस बनाकर खेती से करोड़ों रुपया कमाता है तो भी उसे खेती की आय पर कोई टैक्स नहीं देना होता। एक प्रगतिशील किसान भी चाहे जितना लाभ कमाए उसे कोई टैक्स नहीं देना होगा। खेती से होने वाली बड़ी आय पर कर निर्धारण तर्कसंगत नहीं है।

आजकल शहर के कितने ही धनी लोग किसान बनकर जमीन खरीदकर फार्म हाउस बना रहे हैं। खेती मे कैश क्रॉप के माध्यम से प्रति एकड़ लाखों रुपया कमाया जा रहा है। अब धनी किसानों के लिए खेती एक उद्योग है। ग्रीनहाउस जैसी अनेक विधाएं गई हैं जिससे खेती में घाटे की सम्भावनाएं बहुत कम हो गई हैं। सल के बीमा का प्रावधान भी है। जब खेती की आय को कर मुक्त किया गया था तब ख्ेाती अलाभकर थी। इसलिए अब खेती की आय पर पुनर्विचार होना ही चाहिए।

खेती जैसी ही व्यवस्था टैक्स के मामले में डेरी, पोल्ट्री, हॉर्टीकल्चर और मछली पालन में है। इन व्यवसायों में भी धनी लोगों का प्रवेश हुआ है और इनसे होने वाली आय भी टैक्स दायरे से बाहर है। बिहार के एक नेता ने अपनी करोड़ों रुपए की आय को 40 गायों से हुई आमदनी बताई थी। बागों से लों का निर्यात विदेशों को होता है और बहुत पहले हरियाणा के और विगत वर्षों में हिमाचल के नेताओं ने अपनी अथाह सम्पदा को बगीचों की आमदनी बताकर टैक्स बचाया है। पैसा तो पैसा होता है चाहे नौकरी से आए अथवा व्यापार से या फि खेती से। ना जाने किन कारणों से हमारे राजनेता कर-निर्धारण में भी सेकुलर यानी एक समान कानून नहीं लाना चाहते।

यह ठीक है कि खेती और अन्य व्यवसायों की आमदनी पर टैक्स लगाने में कुछ प्रशासनिक कठिनाइयां हो सकती हैं जैसे आय-व्यय का आंकलन और अनिश्चित मौसम के प्रभाव। यह कठिनाई तो दुकानदारों और अन्य व्यापारियों पर भी लागू हो सकती है परन्तु उनके मामले में टैक्स गणना के तरीके निकाले गए हैं। यह काम सरल हो सकता है यदि खेती आदि पर टैक्स वसूली की व्यवस्था प्रान्तों में आयकर विभाग बनाकर उनके हाथ में दे दी जाय जिससे प्रान्तों को उनके विकास के लिए धन उपलब्ध होता रहेगा। आज वोट बैंक के जमाने में बजट की राजनीति तो हो रही है परन्तु बजट की राष्ट्रनीति नहीं है।

जाति और धर्म को ध्यान में रखकर धन का आवंटन होता है इसके बजाय यदि व्यवसाय अथवा क्षेत्र के हिसाब से आवंटन हो तो विकास को सेकुलर और वैज्ञानिक आधार मिल सकता है। विविध कामों के लिए धन का आवंटन करते समय यदि इस बात पर विचार हो कि किसानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, किसानों को समय पर खाद, पानी और बिजली उचित दामों पर मिलती रहे, रोजगार के अवसर मिलें और उनके घर पर से सही दाम देकर पैदावार उठा ली जाय तो किसानों के बैक कर्जे माफ  करने, उन्हें मुफ्त में बिजली देने, उनको खैरात बांटने की आवश्यकता नहीं होगी।

इसी प्रकार रेल बजट में रेलगाड़ी में बैठने के लिए देश की 72 प्रतिशत आबादी के लिए जगह की चिन्ता नहीं रहती है। 1977 में देश के रेलमंत्री मधुदंडवते हुए थे उन्होंने अपने समय में राष्ट्रनीति के अन्तर्गत जितनी नई गाडिय़ां चलवाईं सब जनता गाडिय़ां थीं। उनके बाद के रेल मंत्रियों ने यह नीति छोड़ दी।

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