Monday 18 February 2013

अब ग्रामीण भी ले रहे गेस्ट हाउस में फेरे


अर्जुन सक्सेना

नवाबगंज (इलाहाबाद) गाँव में गेस्ट हाउस? सुनने में अजीब लगता है पर बदलावों की बहती बयार में अब गाँव मॉडर्न बन रहे हैं। गाँवों में भी शहरों की तर्ज पर गेस्ट हाउसों का प्रचलन बढ़ रहा है।

अब जऱा आप गाँवों के पुराने दिनों में वापस लौटिए जब पंचलईटों की रोशनी में शादियां हुआ करती थीं। गाँवों के पंच लोग मध्यम सी पीली रोशनी में शादी-ब्याह की रस्मों में दूल्हा-दुल्हन को आशिर्वाद दिया करते थे। धीरे-धीरे ज़माना बदला और पंचलाईटों की जगह बड़े-बड़े जेेनरेटरों ने ले ली और पीली सी मध्यम रोशनी हाईपावर के हैलोजन की चमक में खो गई।

क्या गाँव वालों ने कभी सोचा था कि गाँवों में भी गेस्ट हाउस बनेंगे और ग्रामीण लोग भी शहर की तरह शादियों मे फ्लोर डीजे की धुन पर थिरकेंगे? लेकिन आज ऐसा ही हो रहा है। इलाहाबाद शहर से 35 किलोमीटर दूर लखनऊ जाने वाले मार्ग पर है एक छोटा सा गाँव है नवाबगंज। 'गोपाल कृष्ण गार्डेन' नाम से यहां आलोक जायसवाल नाम के व्यक्ति ने नया गेस्ट हाउस खोला है। आलोक जायसवाल बताते हैं, "गाँव में गेस्ट हाउस खोलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। हम गाँव वालों को शहर की तर्ज पर सारी सुविधाऐं उपलब्ध करवाते हंै वो भी शहर के मुकाबले आधे दामों पर।"

सवाल यह उठता है कि क्या गाँवों में सचमुच गेस्ट हाउसों की ज़रूरत है? 'रानी का पूरा' ब्लॉक के होला गढ़ गाँव में रहने वाले 34 साल के अध्यापक रामफल सरोज बताते हैं,"आधुनिकता के इस दौर में आदमी-आदमी में आपसी वैमनस्यता ज्य़ादा बढऩे लगी है, लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने से नहीं चूकते हैं। पहले गाँव में जब कभी कोई कार्यक्रम किसी के यहां होता था तो लोग बड़े सलीके से एक दूसरे का हाथ बटाते थे। लेकिन आज माहौल बहुत ज्य़ादा बिगड़ गया है। हाथ बटाना तो दूर, लोग गाँव में किसी के यहां जाना तक नहीं पसंद करते। इससे गेस्ट हाउस जैसी चीजों को बढ़ावा तो मिलेगा ही। जहां लोग शादियों में शरीक तो होते हैं, लेकिन उन्हें दूल्हे-दुल्हन या रिश्तेदारों से कोई मतलब नहीं होता है। लोग सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के बाद सीधे अपने घरों को चले जाते हैं।"

गेस्ट हाउस अब गाँवों में शादियां बिना किच-किच के करवाने से एक कदम आगे की बात सोचकर भी बुक करवाते हैं गाँव वाले। वो बात है समाज में उनका रुतबा।  होलागढ़ के ही निवासी डॉक्टर रामराज सरोज कहते हैं, "गाँव में गेस्ट हाउस की उतनी जरूरत नहीं है जितनी की शहर में। शहर में तो जगह की समस्या है लेकिन गाँव में तो चारों तरफ जगह ही जगह है। जगह कारण नहीं है यहां, महत्वपूर्ण कारण है अपने को बड़ा दिखाना। गेस्ट हाउस यहां उन लोगो के लिए है जो इसे केवल स्टेटस सिंम्बल के रूप में दिखाना चाहते हैं।"

गाँव घर में कुछ लोग ऐसे भी मिल जायेंगे जो गेस्टहाउसों को अच्छा इस लिए मानते हैं क्योंकि एक बार पैसा दिया और दौड़-भाग से गंगा नहा लिया। मादूपुर रामनगर के युवा ग्राम प्रधान चौरसिया का कहना है, "गेस्ट हाउस में कार्यक्रम करने से कई फायदे हैं जब आप बाहर कोई कार्यक्रम करते हैं, तो आपको अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग लोगों से मिलना पड़ता है। डीजे वाले से मिलो, लाईट वाले को मनाओ, हलवाई की सुनो पर गेस्ट हाउस में इस सबसे छुट्टï मिल जाती है। बस शुल्क अदा करिए और सारे झंझटों से मुक्ति मिल जायेगी।"

ग्राम प्रधान के कथन से आस-पास खड़े कई युवा उनकी हां में हां मिलाते हैं पर पास ही में बैठे साठ वर्षीए बुजुर्ग राम कृपाल गौतम अचानक बोले "जिस गेस्ट हाउस की बात करते हैं उसमें तो बैठने की जगह होती है और ही साफ सुथरा पत्तल मिलता है। लोग खड़े होकर खाते है भला यह भी कोई तरीका है।" आस-पास खड़े सभी लोग बुजुर्ग की बातों पर हंस पड़े।

वहीं बुजुर्ग तबके की सोच से इतर गाँवों की महिलाओं के लिए तो गेस्ट हाउसों के अपने ही फायदे हैं। सर पर लंबा घूंघट किये मादूपुर रामनगर में ही रहने वाली एक महिला कहती हैं, "गेस्ट हाउस में शादियां होना अच्छी बात है कम से कम भागादौड़ी नहीं होती है। नहीं तो घर में जब भी कोई कार्यक्रम होता है तो कहीं ये सामान लाओ, तो कभी वो सामान भूल गए है और फिर हम लोगों को भी तो तैयार होने का मौका चाहिए।"

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