Monday 18 February 2013

समय के साथ बदलता रहा खलनायकों का चेहरा


मुकुल श्रीवास्तव

लखनऊ। वैसे हम जानते हैं कि बुरे व्यक्ति एक आदर्श सभ्य समाज के निर्माण की प्राप्ति में बड़ी समस्या हैं और उनसे कुछ भी सीखा नहीं जा सकता और यही हाल हमारी फि ल्मों का भी है रियल लाइफ  की तरह रील लाइफ भी ऐसे नकारात्मक चरित्रों से भरी रहती है जिन्हें हम खलनायक के नाम से जानते हैं और जिनके बगैर किसी फि ल्म की कहानी अधूरी ही रहेगी। पत्रकारिक फि ल्म लेखन में ज्यादा जोर नायक और नायिका के अलावा कहानी पर रहता है पर इस बदलती दुनिया में हमारी फि ल्मों के खलनायक कैसे बदल गए इस पर कभी हमने गौर ही नहीं किया। यहाँ से पचास-पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है वाला गब्बर कब गाँव के बीहड़ों से निकलकर कब शहर के उस आम इंसान जैसा हो गया कि उसको पहचानना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया।

काफी  समय तक खलनायक चरित्र, नायकों के बराबर का हुआ करता था जिसमे कन्हैया लाल, के एन सिंह, प्राण, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर, कादर खान, शक्ति कपूर, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर जैसे सितारे शामिल रहे। कभी ये धूर्त महाजन, जमींदार, डाकू तो कभी स्मगलर और आतंकवादी के रूप में आते रहे। व्यवस्था से पीडि़त हो खलनायक बन जाना कुछ ही फि ल्मों का कथ्य रहा है पर एंग्री यंगमैन अमिताभ  के बाद खलनायक बस खलनायक ही हुआ करता था, वह क्यों गलत है इस प्रश्न का उत्तर किसी भी फिल्म में नहीं मिलता। नब्बे के दशक के बाद  मानसिक रूप से बीमार या अपंग खलनायकों का दौर आया। परिंदा में नाना पाटेकर, डर में शाहरुख खान, ओंकारा में सैफ अली खान, दीवानगी के अजय देवगन और कौन की उर्मिला ऐसे ही खलनायकों की श्रेणी में आती हैं।

दुष्ट सासों की भूमिका तो खूब लिखी गयी पर महिला खलनायकों को ध्यान में रखकर हिन्दी फि ल्मों में चरित्र कम गढ़े गए। अपवाद के रूप में खलनायिका गुप्त, राज, और कलयुग जैसी गिनी चुनी फि ल्मों के नाम ही मिलते हैं। समय के साथ इनके काम करने के तरीके और ठिकाने बदल रहे थे। जंगलों, बीहड़ों से निकलकर पांच सितारा संस्कृति का हिस्सा बने खलनायक मानो अपने वक्त की कहानी सुना रहे हैं, कि कैसे हमारे समाज में बदलाव रहे थे ,गाँव, खेत खलिहान, जानवर फि़ल्मी परदे से गायब हो रहे थे और उनकी जगह कंक्रीट के जंगल सिनेमा के मायालोक का हिस्सा हो रहे थे। साम्प्रदायिकता कैसे हमारे जीवन में जहर घोल रही है इसका आंकलन भी हम फि़ ल्में देखकर सहज कर सकते हैं। सिनेमा के खलनायकों के कई ऐसे कालजयी खलनायक चरित्र भी हैं  जिनके बारे में सोचते ही हमें उनका नाम याद जाता है। कुछ नामों पर गौर करते हैं, गब्बर, शाकाल, डोन, मोगेम्बो, जगीरा जैसे कुछ ऐसे चरित्र हैं जो हमारे जेहन में आते हैं पर इन नामों से उनकी सामजिक, जातीय धार्मिक पहचान स्पष्ट नहीं होती। वो बुरे हैं बस इसलिए बुरे हैं। पर आज ऐसा बिलकुल भी नहीं है।

संसाधानों के असमान वितरण से परेशान पहले डाकू खलनायक आते हैं। मुझे जीने दो, मदर इन्डिया, पान सिंह तोमर  जैसी फि़ल्में इसकी बानगी भर हैं फि समाजवादी व्यवस्था ने हर चीज को सरकारी नियंत्रण में कर दिया जिसका नतीजा तस्करी के रूप में सामने आया और विलेन तस्कर हो गया। तस्करों ने पैसा कमाकर राजनीति को एक ढ़ाल बनाना शुरू किया तो इसकी प्रतिध्वनि फिल्मों में भी दिखाई पड़ी।

फि शुरू हुआ उदारीकरण का दौर जिसने नायक और खलनायक के अंतर को पाट दिया। एक इंसान एक वक्त में सही और गलत दोनों होने लगा। नैतिकता पीछे छूटती गयी और सारा जोर मुनाफे पर गया। महत्वपूर्ण ये हो गया कि मुनाफा कितना हुआ जिसने स्याह सफ़े की सीमा को मिटा दिया और फि ल्म चरित्र में एक नया रंग उभरा जिसे ग्रे (स्लेटी) कहा जाने लगा। पर इन सबके बीच में खलनायकों की बोली भी बदल रही थी। भाषा के स्तर पर भी नायक और खलनायक का भेद मिटा है। बैंडिट क्वीन से शुरू हुआ ये गालियों का सफर गैंग्स ऑफ वासेपुर तक जारी है। जाहिर है गाली अब अछूत शब्द नहीं है। वास्तविकता दिखाने के नाम पर इनको स्वीकार्यता मिल रही है और सिनेमा को बीप ध्वनि के रूप में नया शब्द मिला है। रील लाईफ के खलनायकों की ये कहानी समाज की रियलिटी को समझने में कितनी मददगार हो सकती है ये भी एक नयी कहानी है।  लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष हैं।

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