Monday 18 February 2013

नक्सली इलाके में क्रिकेट सीख रहीं लड़कियां



झारखंड के चक्रधरपुर की इन लड़कियों का सपना नेशनल टीम में जगह पाना

अनु सिंह

चक्रधरपुर (झारखंड) एक छोटे से मैदान के ठीक बीचो-बीच क्रिकेट की एक पिच है, दोनों तरफ स्टंप्स हैं और जाड़े की एक नर्म गुलाबी सुबह ये पिच उस खेल को खेलने वालों का इंतज़ार कर रही है, जिस खेल को 'जेन्टलमैन्स गेमयानी भद्रपुरुषों का खेल कहा जाता है। गोयलकारो नाम के इस गांव में इस पिच पर खिलाडिय़ों के उतरने के इंतज़ार में बाकी समय पीछे की पहाडिय़ों और यहां के  नैसर्गिक सौंदर्य को देखकर काटा जा सकता है।

वक्त दरअसल काटना नहीं पड़ता क्योंकि सुबह के ठीक नौ बजे क्रिकेट की ट्रेनिंग के लिए खिलाडिय़ों का समूह यहां जुटने लगता है। भद्र पुरुषों के इस खेल को बड़ी लगन से सीखने और समझने के लिए जमा हुई हैं कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय गोयलकेरा की कुल बाईस लड़कियां। ये लड़कियां हर रविवार सुबह नौ बजे क्रिकेट की ट्रेनिंग के लिए अपने स्कूल के ठीक पीछे वाले मैदान में जमा होती हैं और उन्हें ट्रेनिंग देने पास के शहर चक्रधरपुर से कोच ऱहान मासूम साठ किलोमीटर की दूरी तय करके आते हैं। 

झारखंड की राजधानी रांची के 115 किलोमीटर दक्षिण बसे शहर चक्ररपुर पूरी तरह शहर कहना सही नहीं होगा। चक्रधरपुर शहर की शक्ल लेता कस्बा है और पश्चिमी सिंहभूम जि़ले की एक नगरपालिका है। इस कस्बे की रौनक और शान--शौकत यहां के खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों से आती है। इस कस्बे की सभी समस्याओं की जड़ भी जंगलों में बसे इन्हीं खनिज पदार्थों के खनन में बसती है। चक्रधरपुर से करीब बयालीस किलोमीटर दूर गोएलकेरा ब्लॉक है। गोयलकेरा बंगाल-नागपुर रेलवे लाईन पर पड़ता है और हावड़ा को नागपुर से जोडऩे वाली ट्रेनें इसी रुट से होकर जाती हैं। रेलवे के लिहाज़ से ये जगह जितनी ख़ास है, उतनी ही असुरक्षित भी। नक्सल प्रभावित ये इलाका रेड कॉरिडोर का हिस्सा है और दूर गांवों में पसरी शांति में भी एक अजीब किस्म की बेचैनी है।

यहां से छोटा नागपुर के पठार का सबसे मनोहारी रूप दिखता है। दूर-दूर तक पसरी पहाडिय़ों पर बसे जंगल, तालाबों के किनारे सांस लेते गांव और गांवों की जि़न्दगी, छोटे-छोटे टुकड़ों में बसे गाँव और गाँवों के लिपे-पुते, साफ.-सुथरे घरों और घरों के बाहर अनाज सुखाते गाँववालों को देखकर गोयलकेरा की असली नब्ज़ पकडऩा या समझना मुश्किल है। लेकिन बाहर से महसूस होने वाली इस शांति के पीछे संघर्षशील जीवन है, विकास तो दूर, मूलभूत सुविधाओं के इंतज़ार में बैठे लोग हैं। इसी गोयलकारो में एक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का होना बहुत मायने रखता है। चक्रधरपुर की सिर्फ 49 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं। किसी भी संघर्षशील समाज में विकास की मंथर गति का ख़ामियाज़ा वहां की महिलाओं और बच्चों को भुगतना पड़ता है। नक्सल प्रभावित गोयलकेरा और आस-पास के गांवों में भी यही हुआ है। बावजूद इसके शिक्षा की ललक इतनी ज़बर्दस्त है कि बेहतर भविष्य की उम्मीद में अभिभावकों ने अपनी बेटियों को कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के छात्रावासों में रहने के लिए भेजा है।

रूपमती नौवीं में पढ़ती हैं। पिता किसान हैं और पांच भाई-बहनों का परिवार किसी तरह चला पाते हैं। छठीं के बाद रूपमती स्कूल जाती, मुमकिन ही नहीं था। गाँव से हाई स्कूल बारह किलोमीटर दूर था और किसी लड़की को अकेले स्कूल भेजने की हिम्मत उसके घरवालों में नहीं थी। कम उम्र में रूपमती की या तो शादी कर दी जाती या वो भी नक्सली आंदोलन की राह पर चल पड़ती। लेकिन केजीबीवी स्कूल में दाखिला क्या हुआ, रूपमती का भविष्य संवरने की राह पर चल पड़ा। भविष्य के सपनों को हाथ में आए क्रिकेट के बल्ले ने एक और नई राह दी है। पंद्रह साल की जिस बच्ची ने पूरी जि़न्दगी में कभी क्रिकेट का खेल नहीं देखा, ना क्रिकेट के किट से वास्ता पड़ा, उस बच्ची ने ना सिर्फ तीन महीने में खेल के मूल नियम सीख लिए हैं, बल्कि अपने स्कूल क्रिकेट टीम की कप्तान भी बन गई है। कोच को भी रूपमती की प्रतिभा और मेहनत पर इतना भरोसा है कि वे जि़ला स्तर पर होनेवाले क्रिकेट कैंप में उसे ले जाना चाहते हैं।  कोच और रूपमती, दोनों को यकीन है कि वो एक दिन स्टेट लेवल क्रिकेट खेलेगी।

ट्रेनिंग के लिए जमा हुई हर लड़की की कमोबेश यही कहानी है। ये लड़कियां गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते परिवारों की बेटियां हैं। किसी के घर में अख़बार नहीं आता। पढ़ाई और खेल से पहला और गंभीर वास्ता कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में आकर ही  पड़ा। वरना जि़न्दगी छोटे भाई-बहनों की परवरिश, खेतों में मज़दूरी और कम उम्र में ब्याह कर बच्चे पैदा कर देने के हवाले कर दी जाती। रिंकी कुमारी कहती है, "हमसे बड़ी दो दीदी हंै। दोनों मजदूरी करती हैं। लेकिन हमको घर में लड़कर स्कूल में भेजी। उनको लगता है, हम पढ़-लिख जाएंगे तो उनका स्कूल नहीं जा सकने का दुख कम हो जाएगा।" वंदना बताती हैं, "यहां हॉस्टल में नहीं रहते तो पता नहीं क्या करते। हम भी शायद नक्लसी बन जाते। गांव में ठीक माहौल नहीं है।"

इन लड़कियों के भविष्य की जो राह आगे किसी अंधेरे सुरंग की ओर जाती थी, वहां से अचानक शिक्षा ने रौशनी की एक नई किरण दिखा दी है। ये सुखद संयोग ही है कि गोयलकेरा के इस कस्तूरबा स्कूल को एक मल्टीनेशनल कंपनी के शिक्षा प्रोजेक्ट के तहत सहयोग मिलता है और ज़मीनी स्तर पर च्सेव चिल्ड्रेनज् जैसे सामाजिक संस्थान शिक्षा के प्रचार-प्रसार के सपने को अमली जामा पहनाते हैं। देश में अभी 2500 से ज़्यादा कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय हैं, जहां दाखि़ले की पहली शर्त है गरीबी रेखा के नीचे रह रहे परिवारों की बेटी होना,  जिसकी शिक्षा में किसी भी तरह अड़चन आई हो।

क्रिकेट तो एक बहाना है, या फि एक वो मुकम्मल ज़रिया जिसके सहारे रूपमती और रिंकी जैसी लड़कियों को एक बेहतर भविष्य के लिए जमकर मेहनत करने की वजह मिल गई है। कोच फ़ रहान कहते हैं, "इन लड़कियों ने थोड़ी भी मेहनत की तो अगली मिताली राज इन स्कूलों से सकती हैं। इनका शारीरिक गठन, मानसिक क्षमता और मेहनत करने की ताक़त ऐसी है कि इन्हें राज्य स्तर पर खेलने से कोई रोक ही नहीं सकता। बल्कि मुझे तो उम्मीद है कि ये नेशनल लेवल पर भी क्रिकेट खेलेंगी एक दिन। फि स्पोट्र्स कोटा से कई अच्छी नौकरियां भी तो हैं, जिनके बारे में मैं अक्सर बताता हूं।"

नौकरी या नेशनल लेवल पर खेलना हो सकता है दूर की बात हो। लेकिन फि लहाल बैकफु और फ्रं टफु , गुगली और स्पिन और नो बॉल की बारीकियां समझती ये गांव की लड़कियां ज़रूर क्रिकेट खेलने वालों की एक नई जमात तैयार कर रही हैं और ये भी संभव है कि इन्हीं लड़कियों में से कोई एक दिन महिला क्रिकेट वल्र्ड कप जीतकर आने वाली टीम का हिस्सा भी बनें। रिंकी के शब्दों में, "हम थोड़े ना सोचे थे कि किसी दिन घर से निकलकर पढऩे आएंगे। क्रिकेट खेलना सीखेंगे। कोई भी सपना सच हो सकता है दीदी। कोई भी।"  

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