Monday 18 February 2013

अमरीका डायरी:ग्रहों की जानकारी बचपन से ही खींचती थी


नासा के मंगल अभियान के अहम सदस्य हैं भारतीय मूल के अश्विन

शिकागो। मंगल की हर दशा वैज्ञानिक अश्विन वसावडा के लिए हमेशा सही ही होती है। बचपन से ही ग्रहों में दिलचस्पी रखने वाले अश्विन आजकल नेशनल एरोनोटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के सबसे अहम मंगल अभियान के एक बड़े काबिल सदस्य हैं। अमेरिका में जन्मे लेकिन मूल भारतीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले अश्विन यहां पृथ्वी पर बैठे लगभग 22 से 40 करोड़ किलोमीटर दूर मंगल की आबोहवा और भूगोल की खबर रखते हैं। नासा का क्यूरिओसिटी (उत्सुकता) नामक एक यान मंगल पर पिछले अगस्त से संशोधन में लगा है कि क्या उस ग्रह पर कभी ऐसी परिस्थितियां थीं, जिससे जीवन उत्पन्न होने की संभावनाएं भूतकाल में थीं या फि भविष्य में हो सकती हैं? चूंकि अश्विन की शिक्षा अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रहों से जुड़े विषयों में हुई उनकी जिम्मेदारियां का अहमियत रखती हैं। दुनियाभर के 400 वैज्ञानिक अश्विन की देखरेख में काम करते हैं। पेश हैं अश्विन वसावडा के 'गाँव कनेक्शन' से हुए साक्षात्कार के कुछ अंश:

सवाल: क्या मंगल आपको बचपन से ही अपनी ओर खींचता रहा है?
जवाब: ग्रहों से, और खासकर मंगल और गुरु से, मेरा बचपन से ही बड़ा लगाव रहा है। अमेरिका के अंतरिक्ष यानों से भेजी हुई इन ग्रहों की तस्वीरों को मैं अक्सर देखता और सोचता कि यह भी क्या हैरत है कि जहां मनुष्य नहीं पहुंच पाया, वहां से यह नज़ारा देखने को मिलता था। मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच जाता था।

सवाल: क्या आप बचपन से ही खगोल विज्ञान में अपना करियर बनाना चाहते थे?
जवाब: मेरे सामने दो मंजिलें थीं, एक अंतरिक्ष और दूसरा संगीत। दोनों के बीच में तय नहीं कर पा रहा था। दोनों ही को मैंने कॉलेज में पढ़ा। आखिरकार मेरे माता-पिता की विजय हुई, क्योंकिवह चाहते थे कि मैं विज्ञान की और ही जाऊं।

सवाल: आपने कुछ ऐसे विषय ही चुने कि जो ज़्यादातर भारतीय मूल के बच्चे यहां नहीं चुनते? ऐसा कैसे हुआ?
जवाब: 1980 के दसक में जब यहां बड़ा हो रहा था तब अमेरिका का अंतरिक्ष अभियान बड़ा प्रेरणादायक था। एक पूरी पीढ़ी उभरी उन दिनों वैज्ञानिकों और इंजिनियर की जो यहां के स्पेस शटल अभियान से प्रभावित हो कर चन्द्र और अन्य ग्रहों के बारे में सोचने लगी। क्योंकि मैं अमेरिका के एक छोटे से शहर में बड़ा हुआ, जहां इतने भारतीय मूल के लोग नहीं थे, सिर्फ  डॉक्टर ही बनने का विचार मेरे मन नहीं आया। मेरे पिताजी ने मेरे दादा के क़दमों पर चल कर डॉक्टर बनने से अपने आप को रोका था।

सवाल: भारतीय मूल के होने का आप के करियर पर क्या असर पड़ा?
जवाब: शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की हमारी प्रथा बड़ी काम आई। निरंतर और अच्छा काम करने के संस्कारों के वजह से यह सब हुआ।

सवाल: आप पिछले आठ सालों से क्यूरिओसिटी अभियान से जुड़े हैं, क्या आप के लिए इतने लंबे समय तक अपना उत्साह कायम रखना मुश्किल था?
जवाब : मैंने मार्च, 2004 में इस अभियान पर काम करना शुरू किया, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ की कभी बोरियत हुई हो। हां, यह ज़रूर है कि धीरज रखना पड़ता है लेकिन   अक्सर मीठा ही होता है। ऐसे मिशन पर इतनी सारी चीज़ों का मेल होना ज़रूरी होता है, जैसे यान की डिजाइन, उसकी टेस्टिंग, उस पर लगे साधन, फि यान की पृथ्वी से रवानगी, मंगल तक ठीक पहुंचना, फि वहां ठीक उतरना और उस के बाद साधनों का ठीक चलना और खोज करना यह सब बड़ी लंबी प्रक्रिया है, लेकिन बड़ा मज़ा है इस में।

सवाल: इतनी चीज़ों का जहां मिलन हो ऐसे अभियान के सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब: सबसे बड़ी चुनौती अभियान में अपना विश्वास बनाए रखने की होती है, खासकर इसलिए की मंगल पर पहुंचने में अब तक हमारी सफ लता  पचास प्रतिशत ही रही है। ऐसे मिशन  पर इतनी सारी चीज़ें ग़लत हो सकती  है की कहना मुश्किल है। खासकर क्यूरिओसिटी में चुनौती ज्यादा ही थी, क्यूोंकि वह एक ज्यादा वजनदार यान है।

सवाल : आप जब मंगल की धूल और पत्थरों के नमूनों की जांच करते हैं क्यूरियोसिटी के साधनों द्वारा, तब आप को किस तरह की भावना होती है?
जवाब: इस तरह की अंतरिक्ष की खोज में ऐसा अक्सर कहा जाता है कि चाहे हम कितने ही तैयार हों, कुछ तो आश्चर्य में डाल देने वाली बात होगी ही। हम मंगल को पिछले पचास सालों से समझने की कोशिश में लगे हैं फि भी कुछ नया ज़रूर मिलता है। पिछले अभियानों के मुकाबले इस बार हमारे पास जानकारी बहुत ज़्यादा है। क्या पता क्या नया मिलेगा बस वही भावना है।

सवाल: क्या ऐसा नहीं हो सकता की क्यूरियोसिटी खुद पृथ्वी से कुछ सूक्ष्म कीटाणु अपने साथ ले गया हो जो मंगल पर बस जाएं?
जवाब: हमे यह पता है कि यह असंभव है, कुछ कीटाणु साथ में चले जाएं। हमारे साधन और प्रयोग कुछ                       इस तरह से बनाए गए हैं कि पृथ्वी से   कीटाणु प्रदूषण को अलग कर सकते हैं। लेकिन ऐसा ज़रूर होता है कि हमें कुछ दुविधा में दाल देने वाली बातों का सामना करना पड़े। उदहारण के तौर पर क्यूरियोसिटी पर लगी ड्रिल में फ्लोरिडा राज्य की हवा भी मिश्रित हो गयी थी, लेकिन हमारे वैज्ञानिक यह चीज़ें अलग कर देते हैं।

सवाल: मंगल पर जीवन हो सकता है या कभी पहले था उस बात को लेकर आपके अभियान में काफ उत्सुकता होगी।
जवाब: हम सब भलीभांति जानते हैं कि हमारी खोज का एक परिणाम  यह भी हो सकता है कि मानव जाति की हर धारणा बदल सकती है। लेकिन मंगल से जुड़े वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों पर जीवन के विषय में काफ समझदारी से चलते हैं। मंगल पर जीवन था या है उससे ज्यादा हमे इसमें भी दिलचस्पी है कि क्या यह ग्रह जीवन को भविष्य में पाल  सकता है। ब्रम्हांड में जीवन की व्याख्या को समझने लिए मंगल पर खोज यह बड़ा कदम है।

सवाल: मंगल अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों को क्या इस बात का इल्म है कि हम मनुष्य कितने छोटे पड़ जाते हैं जब ब्रम्हांड के बारे में सोचते हैं?
जवाब : हम लोगों को काम से ही फु र्सत नहीं मिलती कि ऐसे  मूलभूत प्रश्नों के बारे में ज्यादा  सोचें। हां ऐसे मौके ज़रूर आते हैं जब इस बात का एहसास होता है। जैसे जब क्यूरियोसिटी राकेट यहां से उड़ा और जैसे-जैसे आसमान में छोटा दिखने लगा मुझे भी लगा मैं कितना छोटा हूं।

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