Monday 18 February 2013

शहरों को मात देती गाँव की लड़कियां


स्मिता मिश्रा
पटना (बिहार) सुबह के साढ़े आठ बजे थे प्रणीता ने अब तक चार मरीजों को देख चुकी है। चार मरीज बहुत ज्य़ादा तो नहीं होते पर प्रणीता के पास खुश होने की एक बड़ी वजह है।

प्रणीता को आज मरीज़ देखते समय एक भी बार अपनी होम्योपैथी की किताबों को नहीं देखना पड़ा। ही आज उसे कोई केस इतना कठिन लगा जिसे सुलझाने के लिए वो अपने सीनियरों की मदद ले। दिन-रात एक करके प्रणीता डॉक्टरी की जो प्रैक्टिस कर रही थी आज उसे कहीं कहीं सफलता मिलती महसूस हो रही है। प्रणीता की इस छोटी सी सफलता ने उसमें एक आत्मविश्वास को भी जन्म दिया  जो आगे चलकर गाँव से आई इस लड़की को हिम्मत देगा कि वो भी प्रतियोगी समाज में जीत की ओर बढ़े। 

खुशी बहुत थी पर उसकी वजह से प्रणीता अपने काम को नहीं भूली। घड़ी की सुईयां बिना रुके अपनी रफ्तार से दौड़े जा रही थीं। प्रणीता रोज़ नौ बजे तक अपने घर के बराम्दे में मरीज़ों का इलाज करने की कोशिश करती है पर आजकल वह थोड़ा जल्दी निकल जाती है ताकि समय से साधन मिल जाए क्योंकि उसे अपने छोटे से गाँव से शहर की कचहरी तक एक लंबा सफर तय करना होता है। जहां वह अस्थाई तौर पर क्लर्क की नौकरी करती है। लेकिन आज उसने अचानक फैसला किया कि वह थोड़ी देर और रुकेगी। हो सकता है आसपास के गाँव में कोई बीमार हो और चला रहा हो दवा लेने।

 पिछले महीने ही प्रणीता ने अपनी उम्र के पच्चीसवें साल में कदम रखा है। वह पूर्वी बिहार के एक छोटे से गाँव में रहती है जहां तक सड़क पहुंचे पांच साल ही हुए हैं और इस रास्ते पर आवाजाही के साधन भी कम ही चलते हैं। वह अपने गाँव की पहली लड़की तो नहीं है जो कि नौकरी करती है पर गाँव में रहकर अपनी पहचान बनाने वाली पहली लड़की ज़रूर है। इस गाँव से बहुत सी लड़कियां निकलीं जो आज महानगरों में अच्छे पदों पर नौकरी कर रही हैं पर प्रणीता को गाँव से दूर नहीं जाना था। ऐसे लोग बहुत मिले जिन्होंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि उसके जैसी होनहार लड़की का भविष्य गाँव से निकले बिना संवरने वाला नहीं। लेकिन प्रणीता ने किसी की एक नहीं सुनी वही किया जो उसके मन ने गवाही दी और अपना गाँव भी नहीं छोड़ा।

प्रणीता की दिनचर्या किसी भी आम इंसान का सिर चकरा दे। वह सुबह : बजे उठकर पहले घर के कामों में माँ का हाथ बटाती है और फिर घर के बाहर के बराम्दे में बैठ जाती है मरीजों का इलाज करने के लिए। घड़ी की सूईयों ने नौ बजाया नहीं कि प्रणीता अपनी बैग संभालकर बस पकडऩे निकल पड़ती है। वह बस जो उसे अपने गाँव की सुरक्षा से लेजाकर शहर की कचहरी के प्रतियोगी माहौल में पटक देती है। कचहरी में भागादौड़ी के अपने काम के बीच समय निकालकर प्रणीता ने कुछ दिन पहले ही कंप्यूटर टाइपिंग की ट्रेनिंग भी पूरी की है।
प्रणीता को गाँव लौटने में कई बार रात हो जाया करती है लेकिन अब तो गाँव में सभी उसकी दिनचर्या की आदत हो चुकी है। घरवालों को भी और पड़ोसियों को भी। लेकिन सेवाभाव ऐसा कि प्रणीता घर पहुंचकर भी आराम नहीं करती। मां का घर के काम में हाथ बटाने के अलावा वह कम से कम एक घंटे समय निकालकर शाम को भी मरीज़ों को देखती है। अक्सर बड़े डॉक्टर की फीस और बस में धक्के खाने के डर से गाँव की महिलाएं शहर ना जाकर इंतज़ार करती हैं कि प्रणीता आये और वो लोग उससे दवा ले पायें।

आजकल स्मिता के सर पर एक नया जुनून भी सवार है। जब से उसे शारीरिक रूप से विशेष स्थिति वाले बच्चों के लिए कराये जाने वाले पैरा ओलंपिक का पता चला है वह अपने इलाके के बच्चों की संयोजक बन गई है। उन्हें खेल के लिए प्रोत्साहित करती है। इस सिलसिले में अब तक दो दफा कोलकाता एक बार हैदराबाद जा चुकी है बच्चों की संयोजक बनकर।

दरअसल, प्रणीता अकेली नहीं है। बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश राजस्थान जैसे राज्यों में गाँव-गाँव में ऐसी लड़कियों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है जो शहर की ओर भागने के बजाय गाँव में रहकर ही एक बेहतर जीवन, बेहतर भविष्य की तस्वीर में रंग भरना चाहती हैं। इनमें से कई ऐसी हैं जिनके पारिवारिक हालात ने उन्हें शहर जाने नहीं दिया। मगर ज्यादातर वो महिलाएं हैं जो गांव की मुश्किलों में रहकर ही रास्ता निकालने का प्रयास कर रही हैं। कुछ तो काफी आगे निकल गई हैं और गाँव की दूसरी लड़कियों के लिए मिसाल भी बन चुकी हैं। प्रणीता भी अपनी छोटी बहन और पड़ोस की लड़कियों के लिए एक आदर्श बन गई।

गाँवों की दुश्वारियों पर गौर करें तो लगता है इनके संकल्प इनकी मेहनत के आगे शहरी लड़कियों की उपलब्धियां कितनी आसान हैं। गाँव से शहर जाने की परेशानी इतनी है कि हम और आप एक ही दिन में हाथ खड़े कर दें।  पर कभी कोचिंग तो, कभी नौकरी और अब तो हर काम में इंटरनेट की ज़रूरत ने बहुत से गाँव वालों को शहर का रुख करने को मजबूर करती है। कोई आसानी से मानने को तैयार ही नहीं होता कि एक लड़की गाँव से आकर काम कर पाएगी।

लेकिन भारत अब बदल रहा  है और इस बदलाव को रोकने की हिम्मत समाज के तानों में नहीं। धीरे-धीरे प्रणीता जैसी लडकियों ने मां-बाप को भी हिम्मत दी है कि वह अपनी लड़कियों को भी शहर के हॉस्टल रिश्तेदारों के पास छोडऩे के बजाय गाँव में रहकर ही अपना कैरियर बनाने का मौका दें।

प्रणीता जैसी ही गाँवों की कामकाजी लड़कियां अब आत्म विश्वास और उम्मीद से भरी हैं। इनकी दिनचर्या, इनकी मेहनत, इनकी लगन को चाहकर भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है। यह किसी पर्सनालिटी डेवलपमेंट सेंटर से प्रशिक्षित नहीं हैं जीवन की कठिनाईयों ने इनके जज़्बे को तराशा है जिसे रोकने का ख्याल भी बेकार है।

1 comment: