Monday 18 February 2013

उफ! ये पढ़ाई लिखाई, हाय रब्बा




मंजीत ठाकुर 
मधुपुर(झारखंड) मेरे सुपुत्र का एडमिशन स्कूल में हो गया। यह एडमिशन का मिशन मेरे लिए कितना कष्टकारी रहा, वह सिर्फ  मैं जानता हूं। इसलिए नहीं कि बेटे का दाखिला नहीं हो रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि एडमिशन से पहले इंटरव्यू की कवायद में मुझे फि से उन अंग्रेजी कविताओं-राइम्स-की किताबें पढऩी पड़ीं, जो हमारे टाइम्स; ताल से ताल मिलाने के गर्ज से, पढऩे के वक्त हमने कभी सुनी भी थीं।

अंग्रेजी स्कूलों से निकले हमारे साथी जरूर 'बाबा ब्लैक शीप', 'हम्प्टी-डम्प्टी' और 'चब्बी चिक्स' जानते होंगे, लेकिन बिहार और बाकी के राज्य सरकारों के स्टेट बोर्ड से निकले मित्र ज़रूर इस बात से सहमत होंगे कि घरेलूस्तर पर छोड़कर औपचारिक रूप से अंग्रेजी से मुठभेड़ छठी कक्षा में हुआ करती थी।

बहरहाल, शिक्षा के उस वक्त की कमियों की ओर इशारा करना मेरा उद्देश्य नहीं। केजी के मेरे सुपुत्र की किताबों की कीमत ढाई से तीन हजार के आसपास रहने वाली है। मुझे कुछ-कुछ अंदाजा तो था लेकिन सिर्फ  किताबों की कीमत इतनी रहने वाली है इस पर मैं पक्का नहीं था।

मुझे अपना वक्त याद आय़ा। जब मैं अपने ज़माने की, हालांकि हमारा ज़माना इतना पीछे नहीं है, सिर्फ  अस्सी के दशक के मध्य के बरसों की बात है, कि बात करता हूं तो मुझे लगता है कि हम जाने कितनी दूर चले आए हैं। बहुत सी बातें एकदम से बदल गईं हैं। हालांकि, प्राय: सारे बदलाव सकारात्मक से लगते हैं। लेकिन पढ़ाई के बारे में ऐसा ही कहना, कम से कम पढ़ाई की लागत के बारे में हम स्वागतयोग्य तो नहीं ही मान सकते।

मेरा पहला स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर था। कस्बे के कई स्कूलों को आजमाने के बाद तब के दूसरे सबसे अच्छे स्कूल, संसाधनों के लिहाज से, शिशु मंदिर ही था। हमारे कस्बे का सबसे बेहतर स्कूल कॉर्मेल कॉन्वेंट माना जाता था, अंग्रेजी माध्यम का। पूरे कस्बे में इसमें बच्चे का दाखिला गौरव की बात मानी जाती थी। हालांकि जिनके बच्चों का दाखिला इस स्कूल में नहीं हो पाता, वो यह कह कर खुद को दिलासा देते कि स्कूल नहीं पढ़ता, बच्चे पढ़ते हैं। और इसकी तैयारी हम घर पर ही करवाएंगे अच्छे से।

तैयारी तो खैर क्या होती होगी। हमारा दाखिला सरस्वती शिशु मंदिर में हुआ, दाखिले की ीस थी 40 रुपये और मासिक शुल्क 15 रुपये। यह सन 84 की बात होगी। इसमें यूनिफ ॉर्म था। नीली पैंट, सफेद शर्ट और लाल स्वेटर। बस्ता ज़रूरी था और टिफि भी ले जाना होता, जो प्रधान जी के मूड के लिहाज से लंबे या छोटे वाले भोजन मंत्र के बाद खाया जाता। भोजन के पहले मंत्रों की इस अनिवार्यता ने ही नास्तिकता के बीज बो दिए थे। चार साल उसमें पढऩे के बाद जब ीस बढ़कर 25 रुपये हो गई और तब घरवालों को लगा कि यह शुल्क ज्यादा है।

भैय्या की नौकरी लग चुकी थी लेकिन उनका वेतन उतना नहीं थी कि हमारे इस महंगे पढ़ाई का खर्च उठा पाते। सरस्वती शिशु मंदिर से इस नास्तिक को निकाल कर तिलक विद्यालय में भर्ती कराया गया, जिसे राज्य सरकार चलाती थी और यह मशहूर था कि गांधी जी उस स्कूल में आए थे। गांधी जी की वजह से पूरे  कस्बे में यह स्कूल गांधी स्कूल भी कहा जाता। एडमिशन ीस 5 रुपये, और सालाना शुल्क 12 रुपये।
गांधी स्कूल की खासियत थी कि हम 10 बजे स्कूल में प्रार्थना करने के बाद, जो कि हमारे लिए बदमाशियों का सबसे टीआरपी वक्त होता था। सफ ाई के लिए मैदान में इक_ होते थे। मैदान में पत्ते और कागज चुनने के बाद, क्लास के र्श की सफ ाई का काम होता। लाल रंग के उस ब्रिटिश जमाने के र्श पर ही बैठना होता था इसलिए सफ ाई ज़रूरी थी। यह काम रोल नंबर के लिहाज से बंधा होता। उस वक्त भी, जो शायद 1987 का साल था, किताबों की कीमत हमारी ज़द में हुआ करती थी। पांचवी क्लास में 6 रुपये 80 पैसे की विज्ञान की किताब सबसे मंहगी किताब की कीमत थी। बिहार टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन किताबें छापा करती थी, सबसे सस्ती थी संस्कृत की किताब और सबसे मंहगी विज्ञान की।

उसमें भी घरवालों की कोशिश रहती कि किसी पुराने छात्र से किताबें सेंकेंड हैंड दिलवा दी जाएं। आधी कीमत पर। किताब कॉपियां हाथों में ले जाते। सस्ते पेन बॉल पॉइंट में भी कई स्तर के, 35 पैसे वाले मोटी लिखाई के बॉल पॉइंट रिफि से लेकर 75 पैसे में पतले लिखे जाने वाले बॉल पॉइंट पेन तक।

स्याही का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम तो हो रहा था, लेकिन फैशन से बाहर नहीं हुआ था। उस वक्त बिहार सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त सब्सिडी वाले कागज़ों से वैशाली नाम की कॉपियां आतीं थीं जिन पर जिल्द चढ़ा होता। अब हमारी गुरबत पर हंसिएगा, वैशाली की कॉपी में नोट्स बनाना मेरे और मेरे दोस्तों का बड़ा ख्वाब हुआ करता। मध्यम मोटाई की कॉपी दो रुपये की आती थी। हमारी सारी बचत वही खरीदने में खर्च होती।
आज वैशाली(गाजियाबाद) में ही रहता हूं, बेटे के स्कूल में कंप्यूटरों की भरमार देखकर आया हूं, ीस की रकम देखी। पढ़ाई मंहगी हो गई है या वक्त का तकाजा है, या लोग संपन्न हो गए है या पढ़ाई सुधर गई है। कस्बे और शहर का अंतर वही सोच रहा हूं। सरकारी स्कूलों में पढ़कर और जिंदगी के ढेर सारे साल गरीबी में बिताकर हमने खोया है या पाया है।

 (लेखक दूरदर्शन में वरिष्ठï पत्रकार हैं। इन्होंने वीएस नॉयपॉल और रामचंद्र गुहा की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी किया है।)

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