Monday 18 February 2013

बस याद में ही न रह जाए बैलगाड़ी


गाँवों में अब बैलगाड़ी की जगह गाडिय़ों ने ले ली है, पेश है सौम्या टंडन की विशेष रिपोर्ट

देवरा (बाराबंकी) शाम के छह बजे सड़क पर करीब पंद्रह बैलगाडिय़ों की रेस चल रही थी। बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं की अवाज दूर-दूर तक लोगों का ध्यान खींच रही थी। हर बैलगाड़ी दूसरे को पछाड़ कर आगे निक लने की जद्दोजहद कर रही थी। यह कोई खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सूरजलाल बाजपेयी(80) यादों के झरोखे से अपनी बारात की तस्वीर खींच रहे थे।    

लखनऊ से 30 किमी दक्षिण बाराबंकी जिले के देवरा गांव निवासी सूरजलाल बाजपेयी पुराने समय में शादी-बारात में होने वाली बैलगाडिय़ों की रेस की बात करते नहीं थकते। अपनी बारात की बात करते हुए कहते हैं, 'अब ऐसे नज़ारे नहीं दिखते। आज के समय में बारातों में कार और ट्रैक्टर का काफिला दिखे तो तौहीन समझी जाती है। बैलगाड़ी बारात से गायब ही नहीं, बल्कि उसका गाँव में दिखना भी कम हो गया है।

बैलगाड़ी पुराने समय में खेतीबाड़ी और कहीं आने-जाने के लिए खूब प्रयोग की जाती थी। लेकिन खेती के काम के लिए ट्रैक्टर का उपयोग होने के बाद से जैसे बैलगाड़ी का पतन ही शुरू हो गया। गाँव में धीरे-धीरे लोगों ने जानवर पालने कम कर दिए, जिसके साथ-साथ बैलगाडिय़ों को खींचने वाले बैल भी कम हो गए। लोगों ने धीरे-धीरे इन्हें बनवाना बंद कर दिया। जो पुरानी उनके पास थीं उन्हीं को ठोक पीट कर काम चलाते रहे।

देवरा गाँव के ही उपकार नारायण पांडेय (62) बैलगाड़ी के खत्म होने की वजह मानते हैं गाँवों में जानवरों का पाला जाना। वह कहते हैं, "जब गाँवों से बैल ही खत्म हो जाएंगे तो बैलगाडिय़ों को खींचेगा कौन? गाँवों में लोग खेती का सारा काम ट्रैक्टर से कराने लगे हैं।"

लखनऊ से 40 किमी उत्तर कामीपुर गाँव के बसंत लाल(60) ने 20 साल पहले बैलगाड़ी बनाने का काम बंद कर दिया। वह कहते हैं, "पहले बैलगाड़ी बनाने से  काफ  अच्छी कमाई हो जाती थी, ट्रैक्टर के आने से लोगों ने बैलगाड़ी बनवाना कम कर दिया। इससे काम मिलना बिल्कुल बंद हो गया था। तब मैंने मजदूरी करके और अन्य काम करके अपने घर का खर्चा चलाना शुरू किया। अच्छी कमाई तो नहीं हो पाती पर जीने के लिए कुछ तो करना ही है।"

सामान ढोने के लिए बैलगाडिय़ों का खूब इस्तेमाल होता रहा है। गाँव से बाजारों तक अनाज लाना हो या फिर मंडी तक भूसा, एक गाँव से 10 से 15 बैलगाडिय़ां एक साथ एक कतार में निकलती हैं। यह सफर चार से पांच दिन तक चलता है। रास्ते में रुक कर खाना-पीना खाने के बाद सफर फिर शुरू हो जाता है। लेकिन  माल ढोने के लिए छोटे वाहन (पिकप, मेटाडोर आदि)  जाने से भी बैलगाडिय़ों को भी धक्का  लगा है।  

सिधौली(सीतापुर) से भूसा लेकर मंडी रही बैगाडिय़ों की लाइन में बख्सी का तालाब कस्बे के पास अपनी गाड़ी के पास बैठ कर सुस्ता रहे महेश(40) गंभीरता की सांस लेते हुए कहते हैं, "50 किमी का सफर तय करने में दो दिन लगे हैं। इतनी दूर आने में पांच जगह रुके, पर सफ अभी खत्म नहीं हुआ है"।कहते हैं, "पहले और आज में बहुत र्क  गया है। आज के दौर में पिकप और अन्य छोटे माल ढोने वाले वाहनों के ज्यादा चलने से बैलगाडिय़ों का चलना कम हो गया है। जितना दूर हम दो दिन में आए हैं, उतना तो ये फर्राटा भरती गाडिय़ां एक घंटे में पहुंच जाएंगी। जिस वजह से हम लोगों को काम नहीं मिलता। धीरे-धीरे बैलगाडिय़ां खत्म होती जा रही हैं।"

एक सर्वे के अनुसार देशभर में कुल 1 करोड़ चालीस लाख बैलगाडिय़ां हैं। जिनमें से 1 करोड़ 30 लाख पुरानी तरह की हैं, जिनके पहिए आज भी लकड़ी के हैं। मात्र 10 लाख बैलगाडिय़ों को ही थोड़ा आधुनिक बनाते हुए टायर के पहिए और बियरिंग लग पाए हैं।

एक बैलगाड़ी बनाने में एक माह का समय लगता है और 20-25 हजार रुपये खर्च होते हैं। बैलगाड़ी बनाने में सिर्फ  शीशम, बबूल, साखू की लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाता है। इसे बनाने में 18 से 20 कुंतल लकड़ी का उपयोग होता है। एक पहिया बनाने में लकड़ी की 6 पुट्िटयां बनाई जाती हैं। बैलगाड़ी तीन तरह की होती है सबसे बड़ी गाड़ी 5 फीट की, अध्धा बैलगाड़ी का लगभग आधा और डनलप जिसकी लंबाई 4 फीट होती है।  

करीब दो दशक से बैलगाडिय़ां बनाते रहे देवरा से दो किमी पूरब सुलेमाबाद गाँव  निवासी कैलास यादव (55) के पास भी पहले की अपेक्षा कम काम आता है। यादों के पहिए को घुमाकर कैलास बताते हैं, ''पहले तो इतना काम होता था कि कभी-कभी बैलगाड़ी बनवाने के लिए लोगों को महीनों इंतजार करना पड़ता था। पर अब वो बात नहीं।"

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