Tuesday 5 February 2013

पहले लोकगीत नहीं बस फूहड़ता


मुंबई। लोक संगीत हमेशा से ही जनजागृति का सशक्त माध्यम रहा है। हिंदी संगीत भले ही देश के एक बड़े भूभाग को मनोरंजन प्रदान करता होए लेकिन किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक विविधता, वहां की समस्याएं,  वहां की सभ्यता आदि लोक संगीत के जरिए स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। लोक संगीत स्थानीय मनोरंजन का साधन होने के साथ-साथ जनजागरण का प्रभावशाली औजार भी रहा है। संगीत की कई ऐसी विधाएं हैं, जो गाँव की मिट्टी में पैदा हुईं और कालांतर में क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर एक बड़े हिस्से में फैल गईं। कहा जाता है कि लोकप्रियता किसी भी चीज को बाजार में ले आती है और बाजार सिर्फ  पैसा कमाना जानता है। एक समय था, जब देश में भोजपुरीए पंजाबीए गढ़वाली, हरियाणवी आदि भाषाओं के लोकगीत घर.देहात से लेकर शहरों में बसे लोगों की जु़बान पर होते थे। अपनी धरती से दूर बसे लोग इन्हीं गीतों को गुनगुना कर अपनी संस्कृति को याद किया करते थे। ये गीत न केवल गाँव.देहात की सरल जिंदगी का आइना थे, बल्कि वहां की सामाजिक आर्थिक चेतना के उत्प्रेरक भी थे।

समय बदला और मनोरंजन का बाजार बड़ा होता गया और ये शहर की सीमाओं को लांघ कर देहात में प्रवेश कर गया। इस क्रांति ने लोक संगीत को फू हड़ता और बाजारूपन की ओर धकेल दिया। किसी समय पूर्वांचल में बालेश्वर के सुरों की धूम हुआ करती थी। रई- रई करके वे सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्ट्राचार पर ऐसी चोट करते कि सुनने वाला खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस करता। पंजाबी लोकगीत संस्कृति में पंजाब की कोयलश् कहलाने वाली सुरेंद्र कौर ने अपने गीतों में इस क्षेत्र का सजीव चित्रण किया है। उनकी मीठी आवाज स्त्री के मन की कोमल भावनाओं को उजागर करती थी। उनके कई गीतों में गाँव का ऐसा विवरण है कि सुनते ही घर के आंगन की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। हरियाणवी रागिनी में न सिर्फ लोकचर्चा है बल्कि भक्ति का पुट भी है। भोले शंकर और पार्वती के संवादों पर बनी प्रसिद्ध रागिनी तू राजा की राजकुमारीए मैं सर पे लंगोटे आड़ा सूंश् को हिंदी फि ल्मों में भी इस्तेमाल किया गया है। गढ़वाली गीतों के गायक नरेंद्र सिंह नेगी एक लंबे अरसे से पहाड़ी जीवन की सच्चाई को अपने गीतों में ढालते आ रहे हैं। बिरहा विधा के माहिर बालेश्वर डंके की चोट पर राजनीतिक व्यंग्य किया करते थे। अपने इस बेबाक अंदाज के कारण वे काफी चर्चा में भी रहे। बोफ़ोर्स घोटाले के समय आया उनका गीत साला झूठ बोलेला में उन्होंने तत्कालीन नेताओं पर कड़ा प्रहार किया।

दिल्ली वाला गोरका झूठ बोलेला
हीरो बंबई वाला लमका झूठ बोलेला

यही नहीं उन्होंने दहेज प्रथाए बेकारी और अन्य सामाजिक सरोकारों पर भी चिंता जाहिर की है।

एमए बीए में न दम रोजगार चाही
खेती.बाड़ी में लागे शरमए रोजगार चाही

मिली.जुली सरकार के खिलाफ अपना सुर प्रखर करते हुए बालेश्वर कहते हैं

मतलबी यार न मिले
हिटलर शाही मिले, मगर मिलीजुली सरकार न मिले

वहीं वर्तमान समय में राजनीतिक और सामाजिक चेतना के लोक कलाकारों में गढ़वाली गायक नरेंद्र सिंह नेगी का नाम उल्लेखनीय है। लंबे समय से गढ़वाली गीत रचते और गाते रहे नेगी जी कभी बाजार से प्रभावित नहीं हुएए अपने गीतों में उन्होंने खुलकर राजनीतिक हस्तियों की पोल खोली है।

गुलेरा की गारी नारेणा गुरेरा की गारी
राजविरोधी रे सदनी पर राज गद्दी प्यारी

नेता जी आप गुलेल पर रखे जाने वाले कंकड़ के जैसे हैंए हमेशा राज्य विरोधी होकर भी आपको राजगद्दी से प्यार रहाद्ध

उनके गीतों पर राजनीतिक पार्टियों ने इतना रोष जताया कि देहरादून की सड़कों में हंगामा हो गया। नेगी जी ने इस विरोध का जवाब भी गीत के रूप में ही दिया।

नेगी दा यन गीत न सुना नौछमी नरेना न गा
की हमकुनी दिक्कत हुंदी न थुकेंड न घुटेंद तातु दूध गिच फु केंद

नेगी दाए ऐसे गीत मत गाओए हमें दिक्कत होती है। न निगला जाता है, न उगला जाता है। गर्म दूध से मुंह जल रहा है।

नेगी जी ने पहाड़ों से बढ़ते पलायन के दर्द को भी अपने सुरों में उकेरा है।

नौना गयां देश मा
छिपड़ा लाग्यां रेस मा

लोग कामकाज के लिए शहर चले गये और गाँव में उनके सूने घर पर छिपकलियां दौड़ रही हैं।

समय की धारा पर अपने उद्गम से निकल कर आगे बढ़ती हुई नदी धीरे.धीरे प्रदूषण की चपेट में आ जाती है। लोकसंगीत भी उसी शीतल नदी का उदहारण हैए जो आज नैतिक प्रदूषण की गिरफ्त में है। लगभग सभी भारतीय बोलियों के लोकसंगीत पर बाजार का गहरा प्रभाव है कि उन्हें फूहड़ और अश्लील कफि यागिरी से ज्यादा कुछ नहीं जा सकता।

लौलिपोप लागेलु, हमका हाउ चाही, तानी ता जींस ढीला करो आदि गानों को सुनकर यकीन ही नहीं होता कि भोजपुरी में कभी बालेश्वर भी गाया करते थे। वहीं हरियाणवी भाषा के लोकगीत श्पानी आड़ी पानी प्या देश् का इतना भद्दा रीमिक्स किया गया है कि शायद दोबारा सुनने का मन भी न करे। गढ़वाली गीतों की भानुमती नये जमाने के चलन में मोबाइल वाली बबली बन गयी। यहां उद्देश्य इन गीतों की फूहड़ता पर शोक जताने या इन्हें नैतिक कसौटी पर परखने तक सीमित नहीं है। सवाल ये है कि क्या गाँव की मिट्टी से जुड़े गीतों की एक्सपाइरी हो गयी है, क्या लोकसंगीत फि र कभी सामाजिक या राजनीतिक सरोकारों से जुड़ पाए.

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