Tuesday 5 February 2013

मन की बात:हिम्मत जो कभी कमज़ोर नहीं पड़ती



नई दिल्ली। स्वीडन की एक महिला पत्रकार के साथ महाराष्ट्र के वाशिम जि़ले के एक गाँव गई थी। हम विदर्भ में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों पर एक फीचर के लिए महिलाओं से बातचीत करने और उनकी समस्याओं को नज़दीक से समझने के मकसद से वहां गए थे। विदर्भ वो इलाका है जहां के 95  फीसदी किसान कजऱ् के बोझ तले दबे हैं और हर गाँव में कम.से.कम एक परिवार ऐसा है जहां परिवार के मुखिया ने आत्महत्या की है। ई समस्याएं हैं, एक महिला कहती हैए ष्पानी नहीं हैए बिजली नहीं हैए खेती के लिए पैसे नहीं हैए अस्पताल दूर है।ष् ष्लेकिन दीदीए हमें ये बताईए कि हम अपने पैरों पर कैसे खड़े हो सकते हैं।ष् कमरे में पीछे से किसी महिला की धीमी सीए लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज आवाज़ सुनाई देती है। हम पापड़ अचार, अगरबत्ती बनाना सीखना चाहती हैं, कुछ पैसे कमाना चाहती हैं, बातचीत का सिलसिला जारी रहता है। बेशक गाँव की महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वावलंबी होने की इस आकांक्षा को किसी स्वयं सहायता समूह से जुड़ जाने पर और ताकत मिली हैए लेकिन आखिऱ हर महिला में भी अपने हालात बदलने की पुरज़ोर ख़्वाहिश होती होगी जो उन्हें एक समूह से जुड़कर और मज़बूत बनने के लिए प्रेरित करती है।

हमारे सामने महिला शक्ति की ऐसी कई मिसालें हैंए हर उदाहरण अपने आप में एक पदक पाने के काबिल। पुरुष वर्चस्व और  पितृसत्ता पर  लंबी बहस की यहां आवश्यकता नहीं। इस बैठक में मौजूद हर महिला अपनी हैसियत जानती है। बिना किसी चुनौतीपूर्ण वक्तव्य के अपने परिवार और अपने आस.पास के लिए हालात बदलने का इनका जज़्बा महिला दिवस के नाम स्त्री विमर्श और सशक्तीकरण पर हर साल लंबी लंबी बहस छेडऩे वाली हम जैसी पढ़ी.लिखी और बुद्धिजीवी कही जानेवाली महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है।

मेरे घर काम करने वाली सुजाता सुबह से शाम तक जिस चक्की में पिसती हैए उसकी लकीरें बाहर से नजऱ नहीं आती। महिला सशक्तीकरण उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। शारीरिक रूप से श्रम साध्य और मानसिक रूप से निर्भीक होकर उसके लिए अपना काम करते जानाए महीने के आखिर में घर चलाने और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए चंद रुपये कमा लेना ही जि़ंदगी का एकमात्र मकसद है। पड़ोस के एक बाज़ार में एक स्टेशनरी दुकान चलाने वाली महिला ने कभी अपना दुखड़ा किसी के सामने नहीं रोयाए उनकी कहानी हमने टुकड़ों.टुकड़ों में सुनी भर हैए कैसे एक बीमार पति की देखभाल और दो बच्चों की  परवरिश के लिए उसने पहले अपने गहने बेचे और फि र ये दुकान    खड़ी की। ये महिला ख़ामोशी  से अपने हिस्से का काम करती है।एक ही बार नाराज़ देखा था   उनको दिल्ली में हुए गैंगरेप के    खि़लाफ़  मुखर होकर अपने हर ग्राहकए पुरुषए स्त्री और बच्चे से बात करती रही थीं। इसके अलावा पिछले आठ सालों में मैंने उन्हें कभी किसी मुद्दे पर कोई बहस करते या महिला आज़ादी के नाम पर झंडे उठाते नहीं देखा। सिर उठाकर इज़्जत के साथ अपना घर चलाना और अपनी जि़म्मेदारियां पूरी करना ही उनके लिए सशक्त होना है।    

मुझे हर उस महिला की हिम्मत हैरान करती है जो हर रोज़ अपने घर परिवार बच्चों की जि़म्मेदारी संभालते हुए अहले सुबह काम के लिए निकल जाया करती है। हर वो लड़की ब्रेवरी अवॉर्ड की हकदार लगती हैए जो बसों, ट्रेनों, रिक्शों, सड़कों पर चलते हुए छेड़छाड़ और शोषण का शिकार होती हैए लेकिन फिर भी घर से निकलने की हिम्मत रखती है। हर उस महिला के लिए मेरे मन में असीम श्रद्धा है जिसने अपनी महत्वकांक्षाओं और प्रतिभाओं को ताक पर रखकर परिवार के लिए खुद को समर्पित कर दिया। 

बैठक से निकलने के बाद मेरी स्वीडिश महिला पत्रकार सोफी से बातचीत जारी रहती है। सोफी मुझे अंग्रेज़ी की कवियित्री माया  एंजलो की क विता श्फि नोमिनल वूमैन की पंक्तियां सुनाती है। हम हर रोज़ जिन असाधारण महिलाओंए जिन फि नोमिनल वूमैन से मिलते हैंए उनकी तस्वीरें किसी अखबारए किसी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपें ना छपें, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सही तारीख की इन्हें जानकारी हो या ना होए असाधारण तो ये तब भी रहेंगीए चाहे वो विदर्भ में पापड़ बनाकर अपना घर चलाने वाली महिलाएं हों या दिल्ली में घरेलू काम करके परिवार की आय में अपना योगदान देने वाली महिलाएं। तमाम चुनौतियों के बीच इनकी जीवटता हर रोज़ के संघर्ष से ही निखरती है।

1 comment:

  1. hoslon ko udan dene ke lye ye reporting kafi achchi aor gyanpurn he jis ke lye dhanyawad

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