Wednesday 6 February 2013

बात काम की हो, जात की नहीं



दिल्ली के सफ़ दरजंग अस्पताल के बाहर एक प्राइवेट शौचालय बना है। काफी साफ .सुथरा और दर्शनीय है। कुछ साल पहले इस शौचालय के दरबान से मुलाक़ात हुई थी। उत्तर प्रदेश के रहने वाले ये जनाब जाति से ठाकुर थे और बीए पास भी। आठ हज़ार रुपये की नौकरी को जाति के लिए कैसे लात मार देते। पूछने पर कहा कि गाँव में किसी को नहीं बताया है और दिल्ली जैसे बड़े शहर में किसी को पता भी नहीं चलता कि मैं क्या काम कर रहा हूं। गाँव में शर्म आती है बताने में और दिल्ली में इससे मेरा घर चल जाता है। उसकी यह बात हमेशा के लिए याद रह गई।

देश के गाँवों से निकले लाखों की संख्या में लोग सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने देश के अलग.अलग शहरों में जा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग एक नया अनुभव हासिल कर रहे हैंए जिनकी तरफ़  अभी ध्यान नहीं दिया गया है। शुरू से ही गार्ड की दुनिया में दिलचस्पी होने के कारण मैं जानकारियां जुटाते रहता हूं। रंग-बिरंगी वर्दियों में तैनात ये लोग लाखों करोड़ों की इमारतोंए बैंकए एटीएम, अस्पताल, शॉपिंग मॉल से लेकर घर और मोहल्ले तक की सुरक्षा कर रहे हैं। आज देश में कई सुरक्षा कंपनियां हैं। जिनमें पचास लाख से ज़्यादा लोग सिक्योरिटी गार्ड बने हुए हैं। इनमें से कई इतने पढ़े.लिखे हैं कि अपनी मेहनत से उसी कंपनी में गार्ड से मैनेजर भी बन जाते हैं।

सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी ने पलायन कर आए लोगों को काफी सहारा दिया है। अपने अनुभव और बातचीत के आधार पर यह धारणा बनती हुई लगती हैं कि इनमें ज़्यादातर ऊंची जाति के लोग हैं। हालांकि कंपनियों के पास जाति के आधार पर कोई जानकारी नहीं हैए मगर अब दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के लड़के-लड़कियां भी इस पेशे को अपना रहे हैं। इस पेशे से जुड़ी एक कंपनी में काम करने वाले मेरे अधिकारी मित्र ने बताया कि ऐसा लगता है कि बिहार से जो लोग गार्ड बने हैं उनमें राजपूत और भूमिहार ज़्यादा हैं। उनकी इस बात पर एक पुराना इंटरव्यू याद आ गया। दिल्ली के हमदर्द विश्वविद्यालय के सामने की बस्ती में सिक्योरिटी गार्ड की वर्दी   बनती हैंए वहां मैं टीवी की    रिपोर्ट की शूटिंग के लिए गया था। तब एक सज्जन से मुलाक़ात हुई थी। उन्होंने बताया कि वे जाति से भूमिहार हैं। लालू यादव के राज में  काम मिलना ख़त्म हो गया तो और गऱीब होते चले गए। गाँव में सब उन्हें बाबू साहब कह कर पुकारते थे और सलामी देते थे। हमसे मिट्टी उठाने या नाली साफ़  करने का काम नहीं हो सकता। होटल में बर्तन साफ़  नहीं कर सकता। कम से कम गार्ड की वर्दी मिलिट्री जैसी लगती है। इज़्ज़त है इसमें। यह एक ऐसा काम है जिसे अब हर जाति के लोग करते हैं।

महानगरों में तरह.तरह के रोजग़ार पनपते रहते हैं। ये नए काम जाति के आधार पर बने बनाए काम से अलग होते हैं, फि र भी इनके भीतर जाति अपना रंग कैसे बदलती है यह जानना कितना दिलचस्प है। एकांत में चुपचाप खड़े रहने वाले ये गार्ड पूरे दिन किस मनोस्थिति में खड़े रहते हैं, हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए। कई जगहों पर तो इन्हें शौचालय की उचित व्यवस्था भी नहीं मिलती है। अपने मोबाइल में ये रामायणए रागिनीए आल्हा.ऊदलए भोजपुरी गाने डाउनलोड कर सुनते मिलते हैं। एक अनजान जगह की चौकीदारी में अपनी भाषा संस्कृति के साथ जीते हैं।

एक बात और है। बिहारए यूपी के लोग दिल्ली आकर ही गार्ड बनना चाहते हैं। दिल्ली में इन दो राज्यों के अलावा हरियाणा और राजस्थान के गाँवों से आये लोग मिल जाते हैं। दिल्ली में न्यूनतम मज़दूरी की दर इसके आसपास के राज्यों से  ज़्यादा है इसलिए लोग यहां  काम करना पसंद करते हैं। दिल्ली में न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से 26 दिन का वेतन 7265 रुपये बन जाता हैं जो यूपी के4700 रुपये से ज़्यादा है। इसलिए यूपी में गार्ड मिलने में आसानी नहीं होती। सब दिल्ली आ जाते हैं। उड़ीसा में हैदराबाद से कम न्यूनतम मज़दूरी  है इसलिए हैदराबाद में बड़ी संख्या में उडिय़ा सिक्योरिटी गार्ड मिलेंगे। गार्ड की इस नई नौकरी में कई कि़स्से हैं। एक अख़बार में पढ़ा  कि इटावा मैनपुरी में बंदूक़ के लाइसेंस की बहुत मारामारी और सिफारिशें चलती हैं। पता किया  तो इनमें से कई दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड बनने के लिए लाइसेंस लेते हैं। बंदूक़ वाले गार्ड का वेतन और भाव थोड़ा ज़्यादा होता है।

एक अनोखा कि़स्सा है वर्दी का। जब वो पहली बार वर्दी पहनते हैं तो सेना और सिपाही के जवान वाले गर्व भाव से भर जाते हैं लेकिन जल्दी ही उनका यह भाव ख़त्म हो जाता है। लोग अक्सर गार्ड को गाली दे देते हैं। उनका सम्मान नहीं करते। जिन नियमों के पालन के लिए उनकी तैनाती होती है उसका सम्मान नहीं करते। यहां तक कि गेट में रखे रजिस्टर को भी ठीक से नहीं भरते।

मुझे नहीं मालूम कि जब सेना का जवान गाँव लौटता होगा तो उसका किस तरह से सम्मान होता होगा और जब ये नए ज़माने को सिक्योरिटी गार्ड गाँव लौटते होंगे तो क्या उनका वैसा  सम्मान होता होगा। कोई बात नहींए जब बात रोजग़ार की हो तो बात काम की होना चाहिए। उसके जात की नहीं।
;ये लेखक के अपने विचार हैंद्ध

8 comments:

  1. kahan kahan se kahaniyaan khoj laate hai aap

    ReplyDelete
  2. Such h ki aj k samay m baat kaam ki honi chahiy na ki jat ki. jub pahle koi neechi jati ka admi dikh jata tha to log kahte the ki din khrab ho gya neechi jaati k logo s baat karne m bhi sharm ati thi per aj dekho Lucknow ki CM kumari maya devi s, milne k liy ek s ek pandit or thakur lage rahte the unke age haath Jod kar khade rahte the or wahi log aj bhi agar kisi agreeb neech jaati k admi ko dekh le to aj bhi apshabd bolne se chukte nahi h to kis baat k wo pandit or thakur. HUME AGAR MOAKA DIYA JAY TO HUM TO LOGO K NAAM K AGE CAST HE HTA DE . Kahir jub hum peda hote h to kya Hume pta hota h ki hum kon h nahi na to. Kya BHGWAN n kisi m koi antar kiya nahi na to kya hum Bhagwan s bade h kya. M EK INSAAN HU LOG HUME PAHCHANE BUS ISLEY HUME EK SIMBLE KI JARURAT h TO USKE LIY MERA NAAM JYOTI H BUS or iske age kya jaroorat h btaiy

    ReplyDelete
  3. My full name is jyoti tiwari n my ID: jyoti.tiwari3333@gmail.com

    ReplyDelete
  4. ravish...aap ki lekhni ,aap ke samvado ki tarh saral , bebaak aur vishwashneeyita liye hue hai...peshe se chitshak hoon , to jab bhi kabhi tv par aap ki report dekhta hoon to patrakaarita par maan karne ka man karta hai...pata nahi tha ki aap ko , yu padha bhi ja sakta hai...

    ishwar aap par jamane ke rang na chadhne de...bas yu hi safalta ke naye mukaam deta rahe aur hum hindi premi aap ki sahityik rachnao ko yu hi aatmsaat karte chale ..aisi kamna hai...dr ghanshyam misra , pediatrician , allahabad...ghanshyam69@gmail.com

    ReplyDelete
  5. Ravish Ji..

    Aapki baaten Dil tak pahuch gayi...

    Ek Dhanywad un logo ki taraf se jinka ashaas apne ukerne ka sarthak prayas kiya!!!

    Dhanywad!!!

    ReplyDelete
  6. वाओ सैलूट हमारे गार्ड को!

    ReplyDelete
  7. भारत की आत्मा गांवों में बसती है, 'गाँव कनेक्शन' का प्रकाशन बहुत ही सराहनीय कदम है। निश्चित रूप से यह गांव की आवाज़ बनकर ग्रामीण पत्रकारिता के मिशन में कामयाब होगा।

    ReplyDelete
  8. गजब लिखा है रविश भाई ने...बाकी मानवीयता तो उनके हर शब्द से बयाँ होती है तो इस लेख में भी भरपूर है !

    ReplyDelete