Wednesday 6 February 2013

करोडों के बज़ट का 7 फीसदी भी नहीं हुआ 'आशाओं' पर खर्च


  • अस्पताल में ठहरने के इन्तज़ाम न होने से हुई आशा कार्यकर्त्री मौत 
  • पिछले दो साल से नहीं मिला रसूलाबाद की आशाओं को वेतन
  • 2011-2012 में आशाओं के लिये आवंटित धनराशि का केवल 6 फीसदी हुआ प्रयोग


कानपुर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर रसूलाबाद के दशहरा गांव की निर्मला भदौरिया 55, बीते 17 दिसम्बर को एक गर्भवती महिला को डिलीवरी कराने के लिये रसूलाबाद के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में लेकर गई। सर्दी के मौसम में रात भर ठिठुरते हुए निर्मला पूरी रात गर्भवती महिला के साथ अस्पताल में ही रही। गर्भवती महिला ने तो अपने बच्चे को सुरक्षित जन्म दे दिया लेकिन ठंड की वजह से सुबह तक निर्मला ने अपनी जान गंवा दी। 

"निर्मला हमारे साथ की ही आशा बहू थी। वो एक डिलीवरी का केस 17 दिसम्बर को रसूलाबाद अस्पताल में लेके गई थी। उसे 24 घंटे तक वहां रहना  पड़ा। दिसबर की ठंड थी। और रात भर वो वहां रुकी। उसने एक पतली सी साल पहनी हुई थी। उसके रुकने और ओढ़ने बिछाने का कोई इन्तजाम न होने की वजह से सुबह तक उसकी मौत हो गई " निर्मला के ही गांव दशहरा में आशा कार्यकर्त्री का काम कर रही सुनीता बताती हैं।

निर्मला की मौत एक बानगी है कि कैसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत नियुक्त की गई स्वास्थ कार्यकत्रियों आशाओं को जि़म्मेदारियां तो बहुत दे दी गई हैं लेकिन सरकार की ओर से खुद उनकी सुरक्षा लिये कोई खास इन्तजाम नहीं किये गये हैं। 

गांवों में टीकारण, नसबंदी, और डिलीवरी आदि में सहायता करने वाली इन आशाओं को सरकार वेतन के तौर पे महज़ 1200 रुपये है। इसके अलावा इन्हें ग्रामीण स्वास्थ्य से जुड़ी कई अन्य योजनाओं में भागीदारी करने पर अतिरिक्त कमीशन दिया जाता है।  

श्रमिक भारती  के कार्यालय में प्रशिक्षण लेती आशा  कार्यकर्त्रियाँ                                                                                    फोटो: उमेश पंत                                                                                                                                                                                                 
ग्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्त्रियों को प्रशिक्षण दे रहे गैर सरकारी संगठन श्रमिक भारती की सामुदायिक स्वास्थ्य प्रबंधक साधना घोष कहती हैं "आशा का काम उनके प्रदर्शन पर आधारित है। आशा के वाउचर एएनएम फौरवर्ड करती है। सीएचसी डाक्टर के पास ये वाउचर जाते हैं और वो पैसा सैंक्शन करते हैं। उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम की गड़बडियां किसी से छिपी नहीं है। ये दशभर में व्याप्त समस्या है कि आशाओं को उतनी सुविधाएं और पैसा नहीं मिल पाता जितना उन्हें मिलना चाहिये। जननी सुरक्षा योजना के तहत आने वाला पैसा ही इन्हें मिलता है लेकिन टीकाकरण, नसबंदी आदि का पैसा इन्हें कई वजहों से नहीं मिल पाता।" 

दशहरा गांव की आशा सुनीता बताती हैं कि उन्हें पिछले दो साल से आशा के लिये जो मानदेय तय है वो नहीं मिला।  अभी केवल  हर डिलीवरी पर मिलने वाला पैसा ही मिल रहा है। टीकाकरण और नसबन्दी वगैरह के लिये मिलने वाला पैसा भी हमें कभी नहीं मिला। वो बताती हैं। 

रसूलाबाद के सिथवा पुरवा की आशा राजेश्वरी कहती हैं हमें हर डिलीवरी पर 600 रुपये मिलते हैं पर अधिकारी हमसे 50 रुपये कमिशन मांगते हैं। पैसा न देने पर हमसे कहा जाता है कि तुम्हारा काम बस 200 रुपये का है अगर 50 रुपये कमीशन नहीं दिया तो तुम्हें बस 200 रुपये ही मिलेंगे।

एक ओर आशाओं को उनकी मेहनत का उचित मेहनाताना नहीं मिल रहा और दूसरी ओर आशा कार्य् के लिये आवंटित किये गये बज़ट पूरी तरह खर्च ही नहीं किया जाता। आशा कार्यकर्त्रियों की मौजूदा स्थिति पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन द्वारा जारी की गई रिपोर्ट से यह बात साफ होती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2009-2010 में उत्तर प्रदेश में आशा कार्यकर्त्रियों के लिये 135 करोड़ रुपये का फंड रिलीज़ किया गया लेकिन उसमें से 8 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं किये गये। माने ये कि आशाओं के लिये आवंटित कुल फंड का 6 फीसदी भी उनपर पर खर्च नहीं किया गया।  

साल 2010-2011 में जारी किये गये फंड का तकरीबन 62 फीसदी आशाओं पर खर्च किया गया। लेकिन 2011-2012 में हालत फिर बिगड़ी जब आशाओं के लिये जारी किये गये फंड का 7 फीसदी से भी कम खर्च किया गया।

 कुल मिलाकर साल 2005 से 2012 के बीच आशाओं के लिये जारी की गई धनराशि में से तकरीबन 37 फीसदी ही खर्च किया गया। और इन सात सालों में हर आशा के खाते में केवल 12670 रुपये आये। इस लिहाज से देखें तो एक आशा पर औसतन 115 रुपये मासिक के हिसाब से खर्च किया गया। 

आशा कर्मचारी यूनियन की महासचिव वीना गुप्ता कहती हैं मानती हैं, " राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में कुछ मूलभूत खामियां हैं। इन खामियों की वजह से आशा कार्यकर्त्रियों का बहुत पैसा मारा गया है। आशाएं अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं कर पाती और वो दबी रहती हैं इसीलिये उन्हें अन्याय सहन करना पड़ता है। मौजूदा नियमों के हिसाब से आशाओं को कमीशन के आधार पर पैसा मिलता है, मसलन अस्पताल में डिलीवरी कराने पर उन्हें कमीशन मिलता है। लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में डिलीवरी करने के लिये डाक्टर ही नहीं होगे तो डिलीवरी करेगा कौन। ऐसे में न केवल गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य का नुकसान होता है बल्कि आशाओं की आय पर भी इसका फर्क पड़ता है। कायदे से आशाओं को वेतन दिया जाना चाहिये ताकि वो कमीशन पर निर्भर न रहें और अपना काम चिन्ता मुक्त होकर कर सके। इससे भ्रष्टाचार में भी कमी होगी। "

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