Monday 21 January 2013

सरहद के गावों में जंग का डर



अमन चाहते हैं सरहद पर रहने वाले विभाजित परिवारों के लोग

आशुतोष शर्मा

 पुंछ (जम्मू-कश्मीर) भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर ठीक जिस जगह कुछ दिन पहले 2 भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्याएं हुईं, वहां से थोड़ी दूरी पर, मेंढर के नक्का मन्जरी गाँव में रहने वाली बेगम जान आजकल परेशान रहने लगी हैं और हर समय उनका ध्यान सीमा पर हो रही हलचल पर ही लगा रहता हैक्योंकि उनकी इकलौती बेटी सरहद पार से घर आने वाली है। 

बीती आठ जनवरी को पाकिस्तानी जवानों ने बॉर्डर पर बसे पुंछ जिले के सोना गली इलाके में घुसकर भारतीय सेना के दो सैनिकों की गर्दन काट कर हत्या कर दी। घटना के बाद से ही नियंत्रण रेखा पर तनाव बढऩे के बाद दोनों देशों के बीच एलओसी व्यापार के साथ-साथ हर सोमवार को जम्मू संभाग में आने-जाने वाली राह--मिलन बस सेवा को भी रोक दिया गया। जिसकी वजह से बेगम जान की तरह हज़ारों विभाजित परिवारों के सदस्य अब एक दूसरे से मिल नहीं सकते। सरहद पर बसने वाले गाँवों के लोग यही दुआ कर रहे हैं कि जंग टलती रहे तो बेहतर है। 

 85 साल की बेगम जान 1965 की जंग में अपनी बेटी   फातिमा से अलग हो गई थीं। ठीक 47 सालों के बाद जून 2012 में जब उनकी बेटी उनसे वापस मिल पाई तब तक बेगमजान के      आंखों की रोशनी जा चुकी थी। फातिमा पूरा महीना मां के साथ रही मगर कुछ अधूरा रह गया था जिसका दुख बेगम जान को आज तक है। "1965 की जंग के दौरान मेरी बेटी 16 साल की थी। जंग शुरू होने के कुछ दिन पहले ही उसका  निकाह हुआ था। जब हालात खराब हुए तो उसे अपने ससुराल वालों के साथ सरहद के उस पार जाना पड़ा। कई साल तो हमें पता भी नहीं था कि वो जिंदा भी है कि नहीं।" बेगम कहती हैं। अपनी बात जारी रखते हुए सालों बाद अपने बेटी से मिलने के बारे में बेगम बताती हैं, "पुंछ-रावलकोट बस शुरू होने के बाद उसने (फातिमा ने) इधर आने की अर्जी दी और फि कई सालों के बाद उसे मंंजूरी मिली।"

"जब वो आई तो आंखों में रोशनी ही बाकी नहीं थी। किस काम का मिलना? मेरा घरवाला (पति) बेटी की सूरत देखने की आस लेकर मर गया ये दोनों दु: कब्र में भी मेरे साथ जाएंगे।" एक शून्य में देखते हुए बेगम जान कहती हैं। अगले ही पल वो अपनी ख्वाहिश जताती हैं, "मेरी बेटी ने कहा था वो जल्दी वापस आकर मेरी       आंखों का इलाज करवाएगी। लेकिन हालात पता नहीं कब ठीक होंगे। मैं चाहती हूं, वो मेरे पास ही              जाए अपना परिवार लेकर हमेशा के    लिए।" जऱा रुक कर, बड़ी मासूमियत से बेगम रिपोर्टर से पूछती हैं, "क्या ये मुमकिन है?" बेगम जान अपनों से बिछड़ गईं पर इस गाँव में रहने वाली वह अकेली नहीं हैं। कुछ ऐसी ही दास्तान गाँव में रहने वाली 94 वर्षीय अनारा बेगम की भी है।
परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि 1965 में उन्हें अपने दस साल के इकलौते बीमार बेटे को भारत में छोड़कर पति और तीन बेटियों के साथ पाक अधिकृत कश्मीर के बाग जिला पलायन करना पड़ा। उस पार जाने के 44 वर्ष बाद 2009 में इन्हें पहली बार भारत आने का मौका नसीब हुआ। अनारा  एलओसी के करीब स्थित झुलास गाँव में रह रहे अपने बेटे राशिद से मिलने पहुंचीं। जो तीन बच्चों का दादा बन चुका था। अनारा को केवल एक माह के लिए ही भारत में ठहरने की इजाज़त मिली थी लेकिन अनारा बेगम ने भारतीय कोर्ट में एक अपील दायर कर आखिरी सांस तक यहीं रूकने की आज्ञा मांगी है। पिछले तीन वर्षों से वह कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं और उन्हें  उम्मीद है कि उनकी आखिरी इच्छा का सम्मान किया जाएगा। अनारा की उम्र के इस आखिरी पड़ाव में अंतिम इच्छा बस दो गज ज़मीन की है, उस जगह की जहां उनका जन्म हुआ था।

बाग़ हुसैन (80) भी यह ग़म सीने से लगाए बैठे हैं के वो सरहद पार अपनी बीवी की मय्यत में शरीक़ नहीं हो पाए। उनका भी परिवार यानि उनके बीवी और बच्चे 1965 की जंग में उनसे अलग हो गए थे। "मैं सरहद पार एक बार उनसे मिलने चला गया, चोरी से कंटीले तार पार करके। अपने परिवार से मिलकर ही रहा था कि कुछ पाकिस्तानी फौजियों ने मुझे पकड़ लिया और फिर जेल में डाल दिया। 1988 में मुझे वापस हिंदुस्तान में भेजा गया।" बाग़ हुसैन बताते हैं। अपना दर्द बताते हुए वह आगे कहते हैं, "साढ़े चार साल पहले मेरी बीवी की मौत हो गई थी लेकिन मैं आज तक उसकी कब्र में मिट्टी भी नहीं डाल सका।"

 बाग हुसैन के बेटे अभी भी सीमा पार रहते हैं और इस पार अपने पिता से मिलने आने की कोशिश कर रहे हैं। "मेरे बेटे मुझसे मिलना चाहते हैं। उनके कागजों की तफ़्तीश भी हो चुकी है।" बा$ बताते हैं फिर निराशा भरे शब्दों में कहते हैं, "लेकिन ये बस अब पता नहीं कब फिर से शुरू होगी? कब फिर से सुलह होगी?"  

"बंटवारे से और बॉर्डर पर होने वाली गोला-बारी से हम लोगों ने हर तरह का नुकसान उठाया है। बड़े शहरों में बैठकर जंग पर मश्वरे देना बहुत आसान होता है। जंग की हकीक़त सिर्फ  सरहद पर बसने वाले गाँव वाले ही जानते हैं।," यह कहना है मेंढर के शाहबाज़ चौधरी का जो कि राजनीति शास्त्र के रिसर्चर हैं। वह आगे कहते हैं, "हम गाँव वाले अमन चाहते हैं हम खुशहाली और डेवलपमेंट चाहते हैं। अपने बच्चों के लिए सुनहरा मुस्तक़बिल (भविष्य) चाहते हैं।"

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