Tuesday 29 January 2013

ज़िन्दगी रिचार्ज: जब उसने तोड़ दिया शादी का कांट्रेक्ट


"मम्मी अब पापा फिर तुम्हें आज मारेंगे" अपनी 7 साल की बेटी के मुंह  से ये बात सुन कर जस सिहर उठी और घर आए मेहमानों को तो जैसे सांप सूंघ गया.

उस रात जस सो नहीं सकी, आंखों से आंसू तैरते रहे और उनके साथ वो तमाम यादें बह बह कर निकलती रहीं जिन्हें जस ने न जाने कहां दबा दिया था.. 10 साल की शादी शादी नहीं एक कॉन्ट्रैक्ट गुलामी का, गाली गलौज सुनने का, पिटने का और हर बात चुपचाप सहने का पढ़ी लिखी थी जस. एक अच्छे परिवार से थी लेकिन शादी होते ही पति ने कह दिया कि उसको जस का घर से बाहर जानाएदूसरे आदमियों से मिलना जुलना पसंद नहीं इसलिए जस नौकरी के बारे में सोचे भी ना..

यहां तक कि बैंक अकाउंट भी नहीं था उसका खुद काण्ण्ण्पति ने कहाए तुम्हें बैंक अकाउंट की क्या ज़रूरत सब कुछ तो मिल रहा है तुम्हें हां सब कुछ तो मिल रहा था जस को सिवाय आज़ादी के..

आज अपनी बेटी की बात सुन कर शायद जस के अंदर की औरत कांप गईण्ण्इतने साल उसने हर थप्पड़ हर अपमान चुपचाप सहा पहले इस उम्मीद में कि बच्चे होंगे तो शायद पति का बर्ताव ठीक हो जाएगा और दो बेटियों के जन्म के बादए इस अहसास से कि बेटियों की परवरिश के लिए पति के साथ रहना एक मजबूरी है.

ऐसा नहीं था कि 10 साल में पति से अलग होने का ख्याल उसके मन में नहीं आया कई बार आया.. लेकिन इतने लंबे वक्त तक घर की चारदीवारी में कैद होने के बाद, अपने सब पुराने दोस्तों से दूर कर दिए जाने के बाद, नए दोस्त नए रिश्ते न बनाने की हिदायत के बाद, जब चाहे पिटने के बादए जस के आत्म विश्वास ने उसका साथ छोड़ दिया था अलग होती भी तो कैसे न पैसे थे उसके पास न नौकरी करती भी तो क्या .

आज जस के आंसुओं के साथ उसका बरसों से दबा गु्स्सा और लाचारगी बाहर निकल रही थी... और रह रह कर ये सवाल उसको परेशान कर रहा था कि क्या पति के हाथों उसका पिटना उसकी बेटियों के लिए इतनी सामान्य बात हो गई है घ्क्या वो भी अपने पति से इस तरह से हिंसा को चुपचाप बर्दाश्त कर लेंगी क्योंकि उन्होंने अपनी मां को सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करते देखा था .  इन सवालों से जूझती रात कुछ ज़्यादा ही लंबी थी.

जस 2007 में जिंदगी लाइव पर आईं लेकिन ये वो जस नहीं थीं, ये वाली जस तो एक बड़ी जानी मानी कंपनी में ट्रेनर थी अच्छा ओहदा, अच्छी तनख्वाह और सबसे बड़ी बात आत्मविश्वास से भरपूर ज़िंदगी

कैसे हुआ ये बदलाव

इस बदलाव का श्रेय उस रात बेटी की कही बात को ही जाता है उस एक बात ने जस के अंदर की मां को जगा दिया जो ज़िंदगी वो खुद घुट घुट कर बर्बाद कर रही थी, वैसी ज़िंदगी वो किसी कीमत पर अपनी बेटियों को नहीं दे सकती थी अपनी बेटियों के स्वाभिमान को वो मरने नहीं दे सकती थी अपनी बेटियों को भी घरेलू हिंसा का शिकार बनते नहीं देख सकती थी.

जस के सामने एक बात साफ थी अगर उसको अपनी बेटियों को एक दिन स्वाभिमानी महिलाओं के रूप में देखना है तो उसे खुद अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल फैसला लेना ही पड़ेगा.

जस बिना पैसों, बिना किसी सहारे या सुविधा, अपनी बेटियों को लेकर निकल पड़ी उसके पास कुछ था तो बस एक बेहतर ज़िंदगी का ख्वाब और अपनी शिक्षा और यही दोनों चीज़े जस की ज़िंदगी को हमेशा हमेशा के लिए बदलने वाली थीं.

किसी भी औऱत के लिए अपनी बसी बसाई ज़िंदगी से बाहर निकलने का फैसला आसान नहीं होता जस के लिए भी नहीं था नौकरी, रोज़मर्रा की ज़रूरतें बच्चों की अकेले देखभाल, समाज की सोच से जूझना हर कदम पर जस और उन जैसी हर महिला लड़ती हैएगिरती है, फिर संभलती है.

जस के लिए इन सारी मुश्किलों के बीच सबसे बड़ी मुश्किल थी अपनी बेटियों की कस्टड़ी के लिए कानूनी लड़ाई.

एक मौका तो ऐसा आया कि जस के पति ने बेटियों को उससे अलग कर दिया बेटियों से मिलने के लिए जस को कोर्ट का सहारा लेना पड़ा नन्हीं जानें, डरी सहमी जब अदालत में लाई गईं तो जस की रूह कांप गई अपनी ही बेटियों के इतना खौफज़दा देख कर खुशकिस्मती से वकील के रूप मे एक दोस्त मिला जिसने हर कदम पर साथ दिया और जस को उसकी बेटियां वापस मिलीं.

पति को छोड़ने के बाद के पहले 3 साल जस के लिए किसी डरावने सपने की तरह थे लेकिन उसकी मां, बहन और बुआ उसके साथ चट्टान की तरह खड़ी रहीं उसको संभालने के लिए.

मैं पिछले 6 साल में जस से दोबारा कभी नहीं मिली, लेकिन वो जहां कहीं भी होंगी, मुझे यकीन है कि वो खुश होंगी, उनकी नन्हीं बच्चियां अब खूबसूरत लड़कियां हो गई होंगी, 10 साल की शादी के ज़ख्म अब भर चुके होंगे और जस बहुत सारी ऐसी महिलाओं के लिए मिसाल बन रही होंगी जो आत्मसम्मान भूल कर ज़िल्लत की ज़िंदगी सिर्फ इसलिए जीती रहती हैं कि समाज क्या कहेगा.

याद रखिये. शादी एक बेहद खूबसूरत रिश्ता है लेकिन उसकी खूबसूरती तभी तक है जब तक पति पत्नी दोनों एक दूसरे की इज़्ज़त करते हों.. कोई भी रिश्ता आपके अपने सम्मान से ऊंचा नहीं होता कभी नहीं.

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