Monday 14 January 2013

सड़क छाप : सपनों के मुनीम के नाम नफरत भरा ख़त


प्यारे सपनों के मुनीम,

मैं जानता हूँ तुम्हे मुनीम कहलाया जाना पसंद नहीं है लेकिन मैं अज्ञानी होने के साथ ढीठ भी हूँ इसलिए और कोई संबोधन तुम्हारे लिए सोच ही नहीं पाता हूँ। और यूँ भी है कि और कोई संबोधन हो भी क्यूँ तुम्हारे लिए? माना कि  तुम अलाना फलाना किसी विदेशी विश्वविद्यालय में किताब बाँच के आये हो लेकिन तुम सच्चाई के धरातल से उतने ही दूर हो जितना एक वज़नदार आदमी के पैरों से उसकी तोंद के पार पहुँचने की कोशिश करता उसका हाथ। क्या तुम हाथ पीछे कर एक हाथ को बिना दुसरे हाथ से सहारा दिए अपनी पीठ खुजा पाते हो? क्या तुम कच्चा पापड़ पक्का पापड़ एक सांस में पच्चीस बार कह पाते हो? नहीं ना! तो किस आधार पे तुम्हें हम मुनीम न कह के अफसर कहें? अफसर वो होता है जो बिना कहे आँखों का सपना समझ जाए। जो बिना आला निकाले ख्वाब देखते धडकनों की स्पीड नाप ले। जो तुम्हारी तरह ज़िन्दगी के पेपरवर्क पे बिना मतलब पेपर वेट की तरह नहीं लदा रहता।
डफर कहीं के।

तुम्हे जॉब मिला था कि लोगों के सपनों की गनती रखो, उनको आगे फॉरवर्ड करो, और तुम लोगों को सपने देखने से ही मना करने लगे? तुम क्या गाँव के थाने के दरोगा हो जी,  जो एफ आई आर लिखने से इंकार कर दोगे?

अरे बुड़बक, कभी सोच के देखना, सपने और ऍफ़ आई आर में ज्यादा फर्क थोड़े होता है ... दोनों को आदमी दर्ज करना चाहता है ये जानते हुए कि भगवन जाने इस पे कभी कोई एक्शन हो, न हो ... लेकिन उसे देख के तसल्ली होती है कि चाहे एक अदना सी शिकायत हो या अदना सा ख्वाब, कहीं दर्ज तो हो गया।

कभी अपनी लोहे वाली अलमारी में झाँक के देखना जब रिश्वत लेने से टाइम मिले। उस में काफी सारा सामान पड़ा है। एक पुरानी नोटबुक मिलेगी। उस में कई सारी टेढ़ी मेढ़ी हाथ की लिखाई में काफी सारे रूलदार पेज भरे पड़े हैं। वो पब्लिक के अधूरे सपने हैं।

हमें याद है एक छोटी सी बच्ची थी, बालों में दो चोटी लगाती थी, बात बात पे रो पड़ती थी। उसे स्कूल जाने का सपना था। चेहरे पे जाड़े में खुश्की रहती थी, हाथ ठिठुरते रहते थे, फ्रॉक गन्दी रहती थी, बोलती इतना कम थी कि लगता था कि शब्द भी राशन की दूकान से खरीद के लाती है ... पर उन गिने चुने शब्दों में भी अपने रिक्शा चलाने वाले बाप से कह आई थी कि इंग्लिश सीखना चाहती थी। और तुम कामचोर, तुमने उसका सपना दर्ज तक नहीं किया था!  बोले थे कि इसे तो जाके बर्तन मांजने चाहिए।

हमें याद है कि एक बुज़ुर्ग आदमी था, थोडा सा झुक के चलता था, चेहरे पे वक़्त की झुर्रियां और आँखों में छोटे छोटे ख्वाबों की चमक थी ... उसका ख्वाब था कि अपने बेटे को बड़ा आदमी बनाये ... तुमने चकबंदी अधिकारी से मिल के उसकी ज़मीन हड़प करवा दी थी ...

हमें याद है एक किसान था, हमेशा सर पे सफ़ेद साफ़ा पहनता था, जिसकी फसल की बिक्री में तुम हमेशा बिचौलिया बन के बेईमानी कर जाते थे।
हमें याद है एक बूढ़ी दादी थीं, जिस से तुमने घूस ली थी क्यूंकि उनकी विधवा पेंशन एक कागज़ न होने के कारण रुक गयी थी।
अरे ओ सपनों के मुनीम, तुम कितने भेस धर के पृथ्वी पे ऑपरेट करते हो ... कभी पेंशन ऑफिस में क्लर्क बन जाते हो, कभी चकबंदी आफिसर, कभी बेइमान वकील बन जाते हो, कभी घूसखोर अधिकारी।

अरे ओ सपनों के मुनीम, तुम भी तो कभी कोई सपना देखते होगे ना ... भगवान करे तुम्हारा कोई सपना कभी पूरा न हो, तुम्हारा सपना देखने से पहले तुम्हें वही सुविधा शुल्क देना पड़े जो तुम औरों से लेते हो, भगवान करे तुम्हे भी किसी डायरी में अपने अधूरे सपने दर्ज करने पड़ें।

और भगवान करे कोई तुमको ये समझा सके कि तुम दलाल हो, भगवान नहीं। लोगों की जिंदगियों और उनकी किस्मतों को कुछ वक़्त के लिए दूर कर सकते हो, लेकिन हमेशा के लिए जुदा नहीं। चाहे तुम सरकारी दफ्तर के घूसखोर क्लर्क बन के मिलो या कभी स्कूल न जाने वाले टीचर का भेस धर के, चाहे अपना धर्म भूल चुके डाक्टर का चेहरा ओढ़ के मिलो या चकबंदी के कागज़ इधर से उधर कर देने वाले लेखपाल की तरह, तुम्हारा भी न्याय यहीं होना है, इसी दुनिया के मोहल्ले में।

वो शर्मीली, दो छोटी बनाने वाली लड़की पुलिस की परीक्षा पास कर चुकी है। वो बुज़ुर्ग तो जीवन में अधिक कुछ न कर सका लेकिन उसका बेटा अफसर बनने की राह पे है। वो किसान अब बिचौलियों से जीतना, सीधे मंदी पे बेचना सीख गया है।

और तुम, यहीं के यहीं रह गए, अपनी फाइल लिए। तुम्हारे ताले में बंद, तुम्हारी अलमारी से सारे अधूरे सपने उड़ चले हैं ओ सपनों के मुनीम।
कौन जाने वो पूरे हुए या मेरा भ्रम था, लेकिन तुम्हारे लाख निकम्मेपन के बावजूद मैं उनके लिए सपने देखना अभी भूला नहीं हूँ।

No comments:

Post a Comment