Monday 14 January 2013

अनजान शहर में पहचान की तलाश



मुम्बई के अंधेरी स्टेशन के भीतर उस ओवरब्रिज पर भागती भीड़ का न कोई सर पैर है, न कोई ओर छोर। अजनबी अनजान चेहरों में पहचान तलाशने की तमाम कोशिशें जब हारकर लौटती हैं तो अपना पीछे छूट गया कस्बा याद आता है। स्टेशन से गुजरती कोई भी लोकल टेªन उस कस्बे की ओर नहीं लौटती।

कितनी आसानी से चिलचिलाती सर्दी की सिहरनें गंधाते पसीनों की बू में खो गई हैं। अपने घर से दूर इस शहर का तापमान कभी शून्य से नीचे नहीं जाता। काली रात को चीरकर आती सुबह की रोशनी में बर्फ की कतरनें दूर पहाड़ों पर टहलती नहीं दिखाई देती। बचपन में बर्फ से बनाई 3 फीट उंर्ची मूर्तियां दूषित हवा में घुलकर बूंद बूदं बिखर सी गई लगती हैं। और उन बूंदों के सांथ कई स्मृतियां नौस्टेजिया की शक्ल में वक्त के आईने पर भाप बनकर जम सी गई लगती हैं। उस भाप को साफ करके घर लौटने का मन होता है कभी कभी।

गांव के खेतों में बेलों से उचक उचक कर तोड़ी हुई ककडि़यों का स्वाद सब्जी मंडी के बासी खीरे से शहर आने की वजह पूछता है। छत पर बिछाई नीली बरसाती के उपर सूखती मां के हाथों की बनाई बडि़यां ग्यारहवें माले की खिड़की से झांकने पर कहीं नज़र नहीं आती। किचन में लगे एक्वागार्ड से बहकर आती पानी की पतली धार पांच पांच लीटर के उन जरकिनों की याद दिलाती है जो बचपन में घर से दूर नौले से भरकर लाये जाते थे। तब जो पानी भरने जाना तफरी सा लगता था अब वो गम्भीर समस्या सा नज़र आने लगा है।

हमारे नौस्टेजिया का हिस्सा वो छोटा सा कस्बा, वो छोटा सा गांव जो तब खूबसूरत लगता था, अब वो बस यादों की दहलीज़ से झांकता ही अच्छा लगता है। उस दहलीज को पारकर न हम उससे हाथ मिलाना चाहते हैं और न ही वो उस दहलीज को लांघकर हम तक पहंुच पाता है। शहर की अपार्टमेंट संस्कृति को आत्मसात कर लेने के बाद गांव की वो बाखलियां कुछ दिनों की छुटिटयां बिताने के दौरान खींची हुई तस्वीरों में ही अच्छी लगती हैं। चटक नीले आकाश के नीचे हरे जंगलों के पीछे से झांकते हिमालय की वो तस्वीरें फेसबुक एलबम में डालकर लाईक्स जुटाने भर तक प्रासांगिक रह गई हैं हमारे लिये।

भाई, बहन और यहां तक कि मां भी रोजगार के सिलसिले में उस घर से दूर आ गई है जिसे पापा मम्मी ने अपने संघर्ष के दिनों में तनख्वाह के पैसे बचा बचाकर बनाया था। पापा जो तब अपने पुश्तैनी घर के पास रहने के खतिर अपनी नौकरी छोड़कर चले आये थे वो अब वहां अकेले रह गये हैं। कभी कभी जब वो मिलने के लिये बम्बई चले आते हैं तो हफ्ते भर से ज्यादा उनका मन नहीं लगता। वो इतने रुखे शहर से सामन्जस्य नहीं बैठा पाते जहां सोलहवें माले पर रहने वाले किसी बुजुर्ग की मौत की खबर सातवें माले पर रहने वाले को सोसायटी के नोटिसबोर्ड पर पढ़कर पता चलती हैं। वो उस संस्कृति से आते हैं जहां बीमारियों के दिनों पड़ौसी बस हाल चाल ही नहीं पूछते बल्कि ये तक जानते हैं कि किस वक्त कौन सी दवा कितनी मात्रा में दी जानी है। दवाओं के लिफाफे में बाकायदा कुछ घरेलू नुस्खे और भर जाते हैं। उस परम्परा से आये पापा को हफते भर में ये शहर अजनबी कर देता है।

हफतेभर बाद घर लौटकर दिन में दूसरी बार फोन करते हुए वो झिझकते हुए पूछते हैं कि बेटा बिज़ी तो नहीं हो? फोन पर उनके बूढ़े होते जा रहे गले की खरांश में किसी बीमारी की आहट पाकर दिल कांप जाता है। कहीं उन्हें कुछ हो गया तो? तब तब एक अपराधबोध दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है। उन्हंे इस तरह अकेला छोड़ देने का गिल्ट सर में दर्द करने लगता है।

औफिस में छुटटी के लिये डाले गये ईमेल के जवाब जब इनबौक्स में नहीं लौटते तो नौकरियों के इस शहर को छोड़छाड़कर तसल्लियों के अपने गांव लौट जाने का मन करने लगता है। मन करने लगता है कि किस तरह उस कस्बे को लौटने लायक बनाया जाये। इस लायक बनाया जाये कि नौकरियों के पीछे भागते हुए, शहर चले आने की नौमत ही न आये।


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