Monday 14 January 2013

सड़क छाप: गाँव वालों को सिर्फ मिट्टी उठाने के लायक मत समझिये



लगभग साढ़े पांच करोड़ हिंदुस्तानी हर साल कुदाल चला के, नहर खोद के, खुरपी फावड़ा चला के साल के सौ दिन का रोज़गार पाते हैं। मनरेगा, यानि महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना, ने भारत में करोड़ों लोगों को जीविका का एक नया तरीका दिया। ये दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा की योजना है।

लेकिन दुर्भाग्यवश लगता है भारत का ये मानना है कि गाँव के लोग सिर्फ मिटटी खोदने के लायक हैं। कि वो मनरेगा जैसी रोज़गार योजना के तहत भी सिर्फ़ कच्ची मिटटी से जुड़े काम कर सकते हैं। वो नालियाँ बनाते हैं, मिटटी के रास्ते बनाते हैं, कुँए साफ़ करते हैं, तालाब गहरे करते हैं। कुछ राज्यों में मनरेगा के अंतर्गत और काम भी जोड़ दिए गए हैं। जैसे हॉर्टिकल्चर यानि बाग़ बगीचे की देख रेख। कुछ जगह सफाई के कार्यकमों में गुसलखाने भी मनरेगा के तहत बनाये जा रहे हैं। तमान खामियों के बावजूद, स्थानीय स्तर पे तमाम बेईमानी के बावजूद, मनरेगा का प्रभाव ग्रामीण भारत पर महसूस हुआ है। ग्रामीण भारत के सत्ताईस प्रतिशत परिवारों ने मनरेगा के तहत रोज़गार हासिल किया है।

लेकिन क्या गाँव में रहने  भारतीय सिर्फ मिट्टी खोद सकता है? क्या हम चाहते हैं कि वो सिर्फ मिटटी खोदता रहे?

हिन्दुस्तान में जगह जगह गाँवों में भटका हूँ मैं। झारखण्ड में नक्सलवाद से प्रभावित सुदूर इलाकों में गया हूँ। मणिपुर में बर्मा बोर्डर से लगे हुए उखरुल ज़िले तक गया हूँ। गुजरात के भुज में, कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के गाँवों में, राजस्थान के बाड़मेर में, भारत के ग्रामीण ह्रदय के अन्दर खूब झाँक के आया हूँ। भारत के ग्रामीण लोगों के लिए नीतियां बनाने वाले ज्ञानियों से निवेदन करूंगा कि कभी हमारे मोहल्ले में आयें। कभी गाँव के गलियारों में घूमें, कभी किसी ढाबे पे बैठ के युवाओं से बात करें, कभी लोगों से गपशप करें, उनके जीवन में झांकें। वो ये पायेंगे कि ग्रामीण भारत में अभूतपूर्व बदलाव आ रहे हैं।

राष्ट्रीय सर्वे संस्था एन एस एस ओ के अनुसार ग्रामीण भारत अब शहरी भारत से ज्यादा रफ़्तार से बढ़ रहा है।
रेटिंग्स संस्था क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 से 2012 के बीच में ग्रामीण भारत ने 3.75 लाख करोड़ रुपये खर्च किये जो कि इसी समयकाल में शहरों में खर्चे गए 3 लाख करोड़ रुपयों से कहीं अधिक है। भारत के गावों में 36 लाख दुकानें हैं। भारत में बनाये गए 25 फीसदी टैलकम पाउडर की खपत गावों में होती है। छियालीस प्रतिशत कोल्ड ड्रिंक गावों में बिकती हैं। और गावों में हर साल सीडी और डीवीडी प्लेयर और वाशिंग मशीन की बिक्री दो सौ प्रतिशत बढ़ रही है।

अगर हम खेती को ही ले लें, तो राष्ट्रीय सर्वे संस्था एनएसेसो के अनुसार 2004 से 2010 के बीच गावों में निर्माण से जुड़े रोज़गार में 88 प्रतिशत की बढ़त हुई, जबकि खेती से जुड़े रोज़गार में बीस करोड़ की कमी आई, और ये संख्या 249 करोड़ से घट के 229 करोड़ हो गयी।

सिर्फ जीने के लिये ज़रूरी चीज़ों के अलावा  अब ग्रामीण भारत के लोग शौक़ की चीज़ें भी खूब इस्तेमाल करने लगे हैं। ग्रामीण भारत के आधे घरों में अब मोबाइल फ़ोन हैं। गावों में कम से कम बयालीस प्रतिशत घरों में अब टीवी सेट हैं। कम से कम चौदह प्रतिशत घरों में मोटरसाइकल या स्कूटर है।
और इन बदलावों का  सरकारों को सीधा सन्देश ये है कि आप अपनी इस सोच को बदलें, कि ग्रामीण भारत का नागरिक सिर्फ मिट्टी उठाने और ढोने का काम कर सकता है।

आज भारत के गाँवों में करोड़ों की संख्या में करोड़ों की संख्या में बेरोजगार लोग रहते हैं। ये रोज़गार जगत के नो मैन्स लैंड में, हाशिये पर, रहते हैं -- न शहरों में इन्हें चपरासी तक की नौकरी मिल पाती है क्यूँकि वहां चपरासी बनने के लिए भी ग्रेजुएट डिग्री की ज़रुरत होती है -- और न ही गावों में मनरेगा के तहत काम कर पाते हैं क्यूंकि या तो उन्हें अपनी तौजीनी लगती है, या फिर वो शारीरिक रूप से इसके लिए सक्षम नहीं होते हैं। इनके लिए मनरेगा में जगह क्यूँ नहीं है? क्यूँ नहीं सहयोगी शिक्षक (शिक्षा मित्र), कम्पाउंडर, बी पी एल कार्ड का सत्यापन करने वाले, वोटर कार्ड बनाने वाले, मनरेगा का हिसाब रखने वाले, मनरेगा के अंतर्गत ही रोज़गार पा जाएँ?

ग्रामीण भारत भी वही सपने देख रहा है, वही पानी पी रहा है, वही क्रिकेट देख रहा है, वही नयी मोटरसाइकल चला रहा है, वही नूडल खा रहा है, जो शहरी भारत खाता है।

बड़ी बड़ी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियां बदलते ग्रामीण भारत के इस सत्य को देख रही हैं, पहचान रही हैं और उस बदलते ग्रामीण भारत तक पहुंचना चाह रही हैं। तो सिर्फ सरकारें ही ग्रामीण नागरिकों से सिर्फ मिट्टी खुदवाने पे तुली हैं?

1 comment:

  1. The worst thing is Hypocrisy.
    To say a thing and to do another,
    To lie and to live a lie,
    To profess and not to care,
    To say and not to bother.
    Not the death and not the life,
    Not the love but the fake smile,
    The worst thing is Hypocrisy,

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