Wednesday 30 January 2013

सरकारी स्कूलों से हो रहा मोहभंग



  • 15 से 14 आयुवर्ग में लगभग एक  चौथाई बच्चे नहीं जाते स्कूल
  • 3 साल की उम्र के 77 फीसदी बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा कभी नहीं मिलती 
  • कक्षा 5 में पढ़ने वाले 10 फीसदी बच्चे नहीं पढ़ पाते एक भी अक्षर
  •  13 फीसदी बच्चों को नहीं आता पढ़ना एक भी शब्द


फैजाबाद के पूर्वा में रहने वाले सुरेन्द्र कुमार नौकरी करने के लिये अपने गांव से रोज 16 किलोमीटर दूर फैजाबाद आते हैं। तनख्वाह में उन्हें केवल 2500 रुपये मिलते हैं। पर वो सरकारी स्कूलों के बनिस्पत अपने बच्चों को ज्यादा पैसे देकर निजी स्कूल में पढ़ाने को तरजीह देते हैं। "मेरे दोनों बच्चे प्राईवेट स्कूल में पढ़ते हैं। उनकी महीने की फीस 70 रुपया है लेकिन महींने में दोनों को पढ़ाना मुश्किल पड़ जाता है। क्योंकि किताबें तो बाज़ार से ही खरीदनी पड़ती हैं और वो बहुत महंगी पड़ती हैं" वो कहते हैं।  

सुरेन्द्र आगे बताते हैं , "पहले बच्चे सरकारी स्कूल में पड़ते थे लेकिन प्राईवेट में पढ़ने के बाद दोनों बच्चे पढ़ने में तेज़ हो गये। चाहे मुझे कितनी ही मेहनत करनी पड़े मैं अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूल में ही पढ़ाउंगा।"

सरकारी स्कूलों के प्रति इस तरह का रवैयया केवल सुरेन्द्र कुमार का ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की कमोवेश आधी से ज्यादा जनसंख्या कुछ ऐसा ही सोचती है। सामजिक संस्था प्रथम द्वारा 2012 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कराये गये विस्तृत सर्वे के नतीजों से ये बात सामने आई है ।

सर्वे में बताया गया है कि 6 से 14 आयुवर्ग के तकरीबन 43 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं जबकि 49 फीसदी बच्चे निज़ी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। 15 से 16 आयु वर्ग तक आते आते सरकारी स्कूलों में महज़ 30 फीसदी बच्चे रह जाते हैं और निज़ी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 46 फीसदी हो जाती है। 

14  से 15 आयुवर्ग में लगभग एक चैथाई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते इनमें से कई ऐसे हैं जिनका नाम तक स्कूलों के रजिस्टर में कभी नहीं लिखाया गया। स्कूल न जाने वाले इन बच्चों में 22 फीसदी लड़के हैं और 16 फीसदी लड़कियां। वहीं 7 से 10 आयु वर्ग में 53 फीसदी लड़के  पढ़ने के लिए निजी स्कूलों में जाते हैं। वहीं 43 फीसदी लड़कियां निजी स्कूलों में पढ़ती हैं। 

फैजाबाद के पूरा बाज़ार ब्लाक के लाल दास का पुर्वा गांव के रामजीत यादव फैजाबाद के एक कालेज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। उनके तीन बच्चे उनके गांव से 3 किलोमीटर दूर दर्शन नगर के यश विद्या मंदिर से पढ़े हैं। वो कहते हैं "मेरी तनख्वाह 3000 रुपये है। तीनों बच्चों की महीने की फीस 300 रुपये है। महीने के 1000 रुपये केवल बच्चों की फीस में ही चले जाते हैं। मैने सोचा था कि बच्चे को और अच्छे स्कूल में पढ़ाउंगा लेकिन कहीं भी 6-7 सौ रुपये से कम फीस नहीं थी। बेटी के दसवीं में 88 प्रतिशत नम्बर आये। लेकिन उसे आगे पढ़ाने के पैसे मेरे पास नहीं हैं। आठवीं तक मैने अपने तीनों बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में पढ़ाया लेकिन उसके बाद उन्हें सरकारी स्कूलों में ही डालना पड़ा।" 

सर्वे के आंकणे भी यहीं बात कहते नज़र आते हैं। साल 2008 से 2012 के बीच सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के प्रति लोगों के रुझान में भारी कमी आई है। और निजी स्कूलों पर ग्रामीण जनता का भरोसा बढ़ा है। 2008 में 38 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते थे पर अब से संख्या 52 फीसदी तक पहुंच गई है। 

लड़कियों का बीच ही में स्कूल छोड़ देना शिक्षा के प्रति हमारे रवैय्ये में तमाम बदलावों के बावजूद अब भी कम नहीं हुआ है। 2006 में 11 प्रतिशत लड़कियों को अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देनी पड़ती थी। और 6 सालों बाद 2012 में भी हालात कमोवेश वही हैं। इस बीच में लड़कों के स्कूल छोड़ देने की घटनाओं में भी दो फीसदी का इजाफा हुआ है। 

पूर्व प्राथमिक शिक्षा के प्रति उदासीनता का आलम ये है कि 3 साल की उम्र के 77 फीसदी बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा कभी मिलती ही नहीं। चैंकाने वाली बात ये है कि 2006 में ऐसे बच्चों की तादात 60 फीसदी के आसपास थी। 

सोल मीडिया की मीनाक्षी सचदेवा वर्मा इस बाबत कहती हैं, "सरकार ने देशभर के गांमीण इलाकों में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के स्कूल तो खोल दिये हैं लेकिन पूर्वप्राथमिक शिक्षा की ओर सरकार का कोई ध्यान नही नहीं है। अब बच्चे ज्यादा संख्या में स्कूल जा ज़रुर रहे हैं पर वो ज्यादा कुछ सीख नही रहे। शिक्षा के अधिकार कानून का ध्यान 6 साल से कम उम्र के बच्चों की शुरुआती शिक्षा की ओर नहीं है। जबकि बच्चे का 90 फीसदी से ज्यादा दिमागी विकास 6 साल से कम उम्र में ही हो जाता है। शिक्षा के अधिकार में 6 साल से कम उम्र के बच्चों पर ध्यान देकर बच्चों के स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को कम किया जा सकता है। बिना मनोरंजन के आप बच्चों को सिखा नहीं सकते ।"

सेसमे वर्कशौप इन्डिया की प्रबन्ध निदेशक सास्वती बैनर्जी मानती हैं कि छोटी कक्षाओं में बच्चों को जो पढ़ाया जाता है वो उनकी पसंद का बिल्कुल नहीं होता। "हमने ग्रामीण इलाकों में गली गली सिम सिम नाम के कार्यक्रम के तहत बच्चों को मनोरंजक तरीके से पढ़ाने की कोशिश की। कठपुतलियों और कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने के नतीजे ये आये कि पढ़ने वाले बच्चों के परिणाम दोगुने बेहतर हो गये। मेवात, बुन्देलखंड, चम्बा, के साथ साथ गुजरात और झारखंड के कई गांवों में हम नुक्कड़ नाटकों, कठपुतलियों और कम्यूनिटी रेडियो के ज़रिये छोटे बच्चों की पढ़ाई को और मनोरंजक बनाने की कोशिश कर रहे हैं।" वो कहती हैं। 

ग्रामीण क्षेत्र में चलने वाले वाले प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को इस बात से समझा जा सकता है कि कक्षा 5 में पढ़ने वाले 10 फीसदी बच्चे एक अक्षर तक नहीं पढ़ पाते वहीं 13 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिन्हें एक शब्द पढ़ना नहीं आता। यहां तक कि 8 वीं में पढ़ने वाले 8 फीसदी बच्चे एक अक्षर भी नहीं पढ़ पाते। 

बचपन बचाओ आन्दोलन से जुड़े संजीव रे कहते हैं "शिक्षा के अधिकार के रुप में 35 साल पहले बनाये गये नियम अब कितने प्रासांगिक रह गये हैं ये गौर करने वाली बात है। शिक्षा के अधिकार की बड़ी खामी ये है कि इसमें ग्रामीण इलाकों की ऐतिहासिक डिसएडवांटेज को ध्यान में नहीं रखा गया है। हमने आईआईटी और आईआईएम जैसे अच्छी गुणवत्ता के उच्च शिक्षा संस्थान तो बना दिये हैं, जो अच्छा काम भी कर रहे हैं पर हमारी सरकार इन संस्थानों तक पहुचने के योग्य बनाने वाली प्राथमिक शिक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रही। खासकर अध्यापकों के प्रशिक्षण के बने लिये प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार की भारी ज़रुरत है।" 

अंग्रेजी की पढ़ाई को लेकर भी ग्रामीण विद्यालयों का हाल काफी बुरा है। कक्षा 7 में पढ़ने वाले एक चैथाई बच्चे अंग्रेजी का एक सरल शब्द पढ़ पाते हैं और इनमें से 62 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो इन शब्दों का अर्थ भी जानते हैं। 

मसूरी में कैंटोनबोर्ड की  कांउसलर और पूर्व प्रधान्याध्यापिका कमल शर्मा बताती हैं " पिछले दस सालों में अकेले मसूरी में सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की तरफ भारी पलायन हुआ है। उसमें भी हिन्दी स्कूलों में पढ़ने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई है। यहां इस बीच अंग्रेजी मीडियम के कई स्कूल खुले हैं। दूसरी बात ये कि सरकारी स्कूलों की खराब हालत के कारण यहां से 10-12 किलोमीटर दूर गांवों में रहने वाले बच्चों को पढ़ने के लिये चलकर मसूरी आना पड़ता है। ज्यादातर लोग इन गांवों से शहरों की तरफ पलायन केवल इस वजह से कर रहे हैं कि उनके गांवों में पढ़ने के लिये अच्छे सरकारी स्कूल नहीं हैं। उत्तर भारत का पहला पावर ग्रिड मसूरी में ही खुला था बावजूद इसके यहां के आसपास के गांवों में बिजली नहीं है इससे भी बच्चों की पढ़ाई बहुत प्रभावित हुई है।" 

No comments:

Post a Comment