Tuesday 15 January 2013

हाथ में बुआई का आलू, मन में ओलंपिक का सपना


अर्जुन वर्मा

सियापुर (इलाहबाद, उत्तर प्रदेश) वह मीलों दौड़ी बिना थके, बिना रुके। दौड़ते-दौड़ते वह लड़की उन तमाम मुश्किलों और बंदिशों को लांघ गई जो गाँव की किसी लड़की के पैरों की बेडिय़ां बन जाती हंै।

 इलाहाबाद में आयोजित 2010 के इंदिरा मैराथन में जब गाँव की लड़की अनीसा भारतीय ने भागना शुरू किया तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह रेस $खत्म करने वाले लाल फीते को छू पाएगी। 42 किलोमीटर की दौड़ के बाद जब अनीसा ने रेस में दूसरा स्थान प्राप्त किया तो किसी को भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ।

दूसरा स्थान तो मिला था अनीसा को पर उसके दिल में टीस थी कि पहला क्यों नहीं? अनीसा ने जमकर मेहनत की अपने इस सपने को पूरा करने के लिए। अगले ही साल इंदिरा मैराथन-2011 में उसने प्रथम स्थान प्राप्त किया। अनीसा की इन सफलताओं ने उन कहावतों को झूठा साबित कर दिया जिनमें यह कहा जाता है कि महिलाएं सिर्फ घर का ही काम अच्छा कर      सकती हैं।

आज अनीसा की शादी हो चुकी है। वह इलाहबाद शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर बसे गाँव सियापुर में अपने सास-ससुर एवं पति पिन्टू भारतीय के साथ रहती है। दौड़ और अनीसा का बड़ा गहरा रिश्ता है, उसने शादी भी पिंटू के साथ भाग कर की थी। अनीसा और पिन्टू दोनो नवीं कक्षा में मिले थे, और आज अपनी लव मैरिज से बहुत खुश हैं। पिन्टू भी अपनी पत्नी को जीतते देखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। अनीसा बताती है कि घर से भागने के बाद से आज तक वह अपने पिता के घर वापस नहीं गई। उसके पिता को शायद यह भी पता हो कि उनकी बेटी ने बचपन का अपना सपना पूरा कर लिया।

अनीसा स्कूल के समय से ही खेल-कूद में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थी। बचपन में ही वह कई बार अंतर्जनपदीय दौड़ें जीत चुकी थी। "शादी के बाद गाँव-परिवार के सामने प्रैक्टिस कैसे कर पाती हैं?" अपने खेत में आलू की बुआई करती अनीसा इस सवाल के जवाब में बताती है, "गाँव से बाहर एक बाग है जहाँ कोई आता-जाता नहीं है। शाम को पिन्टू के साथ जाकर वहीं बाग के चारों ओर दौड़ लगाने का अभ्यास करते हैं हम।"

आम सी दिखने वाली इस खास लड़की ने सियापुर की महिलाओं में एक पहचान बना ली है। साड़ी के पल्लू से मुंह तक घूंघट काढ़े अनीसा बताती है कि उसने नहीं सोचा था कि इंदिरा मैराथान को वह कभी जीत पाएगी। जीत से उसका आत्मविश्वास बढ़ा है और वह अब ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना बुन रही है और उसे सच करने के लिए कड़ी मेहनत में जुटी है।

"मेरी जितनी कमाई है उसमें अनीसा की डाईट पूरी नहीं हो पाती। मैं कोशिश करता हूं कि अच्छा खिला सकंू पर हम गरीब हैं इतना नहीं कर सकते।" पिन्टू चिंता जताते हुए कहता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्टस मेडिसिन द्वारा ग्रामीण भारत के एथलीटों पर किया गया शोध बताता है कि ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी महिला एथलीटों में बहुत सामथ्र्य होता है। लेकिन अपर्याप्त खान-पान की वजह से उनकी शारीरिक क्षमताओं का पूरा प्रयोग नहीं हो पाता। तीस ग्रामीण महिला एथलीटों पर किये गए इस शोध में यह भी सामने आया कि 57 प्रतिशत महिलाएं क्रोनिक एनर्जी डिफिशियंसी (सीईडी) से प्रभावित थीं। यह बीमारी शरीर के कम वजन और अपर्याप्त पोशक तत्वों की वजह से होती है।

लेकिन फिर भी ग्रामीण भारत की महिला एकलीटों ने समय-समय पर भारत का नाम रोशन किया है। चाहे वो मेरीकॉम हों या झारखंड के छोटे से गाँव की दीपिका कुमारी, इन्हें किसी तरह की बाधा नहीं रोक पाई देश के लिए मेडल जीतने से। अनीसा भी इन्हीं में से एक बनना चाहती है।

No comments:

Post a Comment