Sunday 2 June 2013

अब न बदली तो नहीं बचेगी कठपुतली

लखनऊ। में चारबाग की ओर जाने वाली सड़क पर दायीं ओर मुड़कर लालकुंआ भेड़ी मंडी आती है। पास ही में एक पतली गलीनुमा सड़क के एक छोर पर है वो छोटा सा कमरा जहंा एक बड़ा सपना पल रहा है। कठपुतली कला को एक नया मुकाम देने का सपना। कमरे में बिखरे तरह तरह की शक्लों के पुतले देखकर अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इन्हें पुराने अखबारों की कतरनों से बनी लुग्दी से बनाया गया होगा। कतरनें जब मेराज आलम के हाथों से कठपुतलियों की शक्लों में ढ़लती हैं तो जैसे उनमें जान आ जाती है। 

भारतेन्दु नाट्य अकादमी से नब्बे के दशक में पढ़ाई पूरी करके मेराज आलम थियेटर से जुड़ गये। अभिनय, निर्देशन सब किया लेकिन एक कसक थी कि कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। यही कोई 10 साल पहले उन्होंने कठपुतलियों पर काम करना शुरु किया। वो बताते हैं, ''मुझे लगा कि कठपुतलियों की दुनिया में नया करने की गज़ब गुन्जाइशें हैं। तबसे खुद ही कठपुतलियां बनानी शुरु की। धीरे धीरे बच्चों और बड़ों के साथ कठपुतली बनाने की कार्यशालाएं भी लेने लगा। क्यूंकि खुद ही कुछ न कुछ नया ईज़ाद करता था इसलिये बच्चों को नये और रोचक तरीके से समझा भी पाता था। वो बहुत रुचि लेते थे।"

''बच्चों को पहले कह के दूसरी दुनिया दिखाता था। उन्हें भरोसा नहीं होता था। फिर वो थर्माकॉल पर कटिंग शुरु करते थे। चीथड़ों और पुरानी चीजों को जमा करके उन्हें प्रयोग करना शुरु करते थे। और तीसरे चौथे दिन से ही जब वो अपनी ही बनाई चीजों से दुनिया को बदलते हुए देखते थे तो उन्हें यकीन हो जाता था कि जो दूसरी दुनियां जो मैं उन्हें दिखा रहा था वो सच में वजूद रखती है।" माथे का पसीना पोंछने के बाद ये कहते हुए मेराज के ज़हन में जैसे उन बच्चों का चेहरा ताजा हो जाता है। ये ताजग़ी उनके चेहरे पे भी पढ़ी जा सकती है।
पत्नी अजऱा मेराज़ झुकी नजऱों से एक बार अपने पति को देखती हैं और फि र जैसे उन्हें अपनी आंखों में रात चार बजे तक उनके आस पास बिखरा पुतलों का वो संसार याद आ जाता है, अपने पति की कठपुतलियों को लेकर दीवानगी को वो कुछ इस तरह बयां करती हैं, ''रोज रात को 2-2 बजे तक लगे रहते हैं, कभी कभी तो रात के चार बज जाते हैं पर इनका काम पूरा नहीं होता। पहले पहले गुस्सा आता था कि ऑफि स से लौटते ही ऊपर कमरे में चले जाते हैं और अखबारों, गत्तों वगैरह से खेलने लगते हैं। खाने के लिये बुलाओ तो घंटों तक नहीं आते। पर अब तो आदत हो गई है।"

अक्सर इस तरह की दीवानगी रखने वाले लोगों के पारिवारिक रिश्ते पटरी से उतरे हुए रहते हैं, लेकिन यहां मामला कुछ और है। ''कपिल देव नाम के एक कलाकर बहुत पहले लखनऊ आये थे जिन्होंने कठपुतली कला की कार्यशाला यहां लगाई। एक महीने की कार्यशाला थी। मैं तो नौकरी कर रहा था, मेरी पत्नी ने उस कार्यशाला में हिस्सा लिया। वो रोज जाती और कार्यशाला में जो भी होता आकर मुझे बताती। ऐसे मुझे भी बहुत सी जानकारियां मिल गई।" ''ये सुबह ऑफिस जाने से पहले छोड़ आते थे, और इनका ऑफिस खत्म होता था तो मुझे लेने वर्कशॉप में आ जाते थे।" अजऱा कहती हैं। 

बात का धागा जोड़ते हुए मेराज़ आलम आगे बताते हैं ''और फिर मैं कुछ देर वहीं रुक जाता था। ऐसे कुछ आधा घंटा मैं भी वर्कशॉप में शामिल हो जाता था और बांक ी दिनभर में क्या हुआ पत्नी ये मुझे बता देती थी।"
पति-पत्नी ही नहीं बल्कि इनके बच्चे भी अपने मां-बाप की इस विरासत को अपने साथ सहेजना चाहते हैं। तनय (18) और तान्या (14) दोनों अपने माता-पिता की ही तरह इस कला से जुड़कर नाम कमाना चाहते हैं। 
हांलाकि कठपुतलियों के लिये समर्पित इस परिवार की दीवानगी के आड़े पैसे ज़रुर आते हैं। इस ओर इशारा करते हुए मेराज़ कहते हैं,  '' एक ब्रश 20 से 30 रुपये का आता है, रंग लगातार महंगे हो रहे हैं। कठपुतली बनाना कितना महंगा हो गया है। ऐसे में कलाकारों की जीविका का कोई साधन बचा नहीं है। केवल भावनाओं से काम नहीं होता पैसे भी तो चाहिये"

तरह तरह से काम आई कठपुतलियां


कठपुतलियों पर कोई  खास अकैडमिक साहित्य नहीं है, हालांकि ये एक बहुरुपिणी कला है। गुलाबो-सिताबो, जाट-जाटाईन या फिर धोबी- धोबाइन के किरदार ऐसे हैं जिनकी कोई स्क्रिप्ट नहीं है, लोगों ने इन्हें सुन-सुनकर ही आगे बढ़ाया है। पपेटरी को लेक र माना जाता है कि ये हास्य को ज्यादा हाईलाईट करती है। मैं इस बात से सहमत हूं, पर ऐसा नहीं है कि केवल हास्य ही कठपुतली का हिस्सा हो सकता है।  थियेटर में जिन गम्भीर विषयों को लिया जाता है उन विषयों को भी इस माध्यम से उठाया जा सकता है। माना ये भी जाता है कि मुगल काल में जब परदा प्रथा अपने चरम पर थी तो बादशाहों की बेगमों के लिये मनोरंजन के साधनों की दिक्कत थी ऐसे में एक ऐसी कला खोजी गई जिसमें कला का प्रदर्शन करने वाला खुद परदे के पीछे रहे ताकि बेगमों को परदे में रहने की जरुरत ना पड़े। ऐसे में कठपुतली कला का प्रचलन बढ़ा। 

ये भी माना जाता है कि अशोक के शासनकाल में जब शिलालेखों का प्रचलन आया तो जो लोग पढ़ लिख नहीं सकते उन लोगों में सरकारी फरमान और जानकारियां पहुंचाने में दिक्कत आने लगी ऐसे में राजा ने ऐसे लोगों तक कठपुतली के जरिये अपनी बात पहुंचवानी शुरु की। 

एक दौर ये भी आया कि लोग घर के झगड़े सुलझाने के लिये कठपुलियों की मदद लेने लगे। मसलन सास बहू का रिश्ता बिगड़ रहा है तो उसे सुधारने के लिये घर का कोई सदस्य कठपुतली कलाकार को बुला देता वो कठपुतलियों के जरिये परोक्ष रुप से ऐसी बातें कह जाता कि जिनका झगड़ा हुआ है उन्हें बात समझ आ जाती।

 साहित्य जब जुड़ा कठपुतली कला से 

कठपुतलियों की कला में कोई स्क्रिप्टिंग नहीं हुई। वो बाप दादाओं की सुनी कहानियों पर चला आ रहा है। जैसे आला उदल वगैरह। जो लोग इसमें काम कर रहे हैं उन्हें कला की समझ होना जरुरी है। 
मुझे अपना सबसे पसंदीदा कार्यक्रम जूता आविष्कार लगता है। ये मूलत: रविन्द्रनाथ टैगौर की लिखी कविता है जिसे श्रीलालशुक्ल ने हिन्दी में अनुवाद किया। इसी कविता को आधार बनाकर हेमेन्द्र कुमार भाटिया जी ने इस पर स्क्रिप्ट लिखी और अनुपम खेर के साथ मिलकर शो निर्देशित किया। मैने उसी का कठपुतली में रुपान्तरण करके लोगों के सामने रखा। 

इसके अलावा लखनऊ के हास्य पर आधारित आदाब अर्ज़ है, हरिशंकर परसाई की कहानियों पर आधारित इन्स्पेक्टर मातादीन, भोलाराम का जीव, मैं बिहार से चुनाव लड़ रहा हूं जैसे शो भी मैने किये हैं। बरसात के मौसम पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात करता आया सावन हो या एड्स पर जागरुकता फैलाता एस आई वी की चौपाल मैने कोशिश की कि कठपुतलियों के जरिये हर तरह की कहानियां कही जाएं।

कठपुतली के   'सूत्रधार'

माना जाता है कि 4 हजार साल पहले भारतीय नाट््यशास्त्र में जिस सूत्रधार शब्द का उल्लेख आता है उसका सबंध इसी विधा से है। नाटक का मुख्य किरदार सूत्र यानी धागे की मदद से अपने किरदारों का संचालन करता था। धागे से चलने वाली कठपुतलियों के  चलन की शुरुआत यही से मानी जाती है। वो चाहे जापान का बुनराको हो या फिर चीन की शैडो पपेटरी दुनियाभर में कठपुतली के चरित्रों ने दर्शकों का मन मोहा है। 

मौलिकता बरकरार रखते हुए कला का बदलना भी जरुरी 


कला उस बूढ़े आदमी की तरह है, जो बुरी तरह बीमार है, या तो उसका इलाज करना होगा या उसे मर जाना होगा। मैं कठपुतलियों पर पिछले 10 साल से काम कर रहा हूं और इस बीच मैने देखा है कि आज कला में मौलिकता लगभग खत्म हो गई है। आप ढोल वगैरह में ही देख लीजिये प्लास्टिक की खाल को प्रयोग करने लगे हैं। उससे गूंज बदल जाती है। इस नयेपन को या तो हम स्वीकार कर सकते हैं या नकार सकते हैं। स्वीकार कर लेंगे तो वहीं से अविष्कार शुरु होता है। हमारे बाब दादा के समय में ये था वो था कहके काम नहीं चलेगा। आर्ट फार्म  का बचना भी जरुरी है और बदलना भी।  पर ज्यादा बदलाव भी नहीं किया जा सकता। अगर हम कठपुतली में मोटर लगा देंगे तो वो एक रोबोट हो जायेगा। हम उसके मूल रुप को ही बदल देंगे तो कला जिंदा कैसे रहेगी? उसका बदलना जरुरी है पर उसका मूल रुप भी बना रहना चाहिये। 

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