Sunday 2 June 2013

जिसे कभी मरने के लिए छोड़ दिया गया वो आज राष्ट्रपति पद की है दावेदार

ऐश्वर्या तिवारी

लखनऊ। अफगानिस्तान के  बद्खशन जिले में एक परिवार में पैदा हुई एक बच्ची। उसे जलती दोपहर में खुद ही मर जाने के लिए छोड़ दिया जाता है। पर भगवान  से इस बार गलती नहीं हुई थी और वो उसे वापस बुलाने को तैयार नहीं थे। फौजिय़ा कूफी बच गईं और  उनके परिवार ने उन्हें तरस खाकर  उन्हें अपना लिया। आज वो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति पद के लिए एक प्रबल दावेदार हैं। 

 फौजिय़ा की कहानी चौकाने वाली है। भारत की एक प्रख्यात हिंदी मैगज़ीन द्वारा आयोजित 'थिंक 2012; में फौजिय़ा सर पर हरा दुपट्टा रखे हुए बताती हैं, उनके परिवार से स्कूल जाने वाली वे अकेली लड़की थीं। पिता सांसद थे और फौजिय़ा ने पकिस्तान के प्रेस्टन विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया। पिता की मुजाहिद्दीन के हाथों हत्या के बाद फौजिय़ा ने राजनीति में कदम रखा। वो यूनीसेफ के साथ भी जुडी रहीं और कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर विस्थापितों की मदद में जुटी रहीं।

तालिबान का राज खत्म होने पर फौजिय़ा ने बद्खशन से चुनाव जीता और सांसद का पद हासिल किया। फौजिय़ा की लड़ाई सिर्फ  यहीं तक सीमित नहीं रही। वे अफगानी महिलाओं और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कानून व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा लेकर आगे बढ़ रही हैं। अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रीय चुनाव में वे राष्ट्रपति के पद के लिए खड़ी हैं। 

अफगानिस्तान जैसे इस्लामी देश में, जो दशकों तक तालिबान के राज में रहा, फौजिय़ा जैसी महिलाओं के लिए जि़न्दगी आसान नहीं है। सभी सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़कर आगे बढऩे की उनकी जिद्द के कारण उन पर अभी तक कई आत्मघाती हमले हो चुके हैं। जब फौजिय़ा अपनी कहानी सुनाती हैं तो उनकी भाषा में पश्तो की मिठास झलकती है। अपने देश के लिए सजाये सपने उनकी आंखों में चमकते हैं। वे खुद को भाग्यशाली मानती हैं कि वो बच गयीं और अपने जैसी अफगानी बेटियों को बेहतर सुविधायें उपलब्ध कराना ही अब उनका उद्देश्य है।

आज जब हम अफगानिस्तान जैसे इस्लामी मुल्कों के बारे में सोचते हैं तो बरबस ही मन में एक नीले-काले बुर्खे के पीछे से झांकती दो आंखें मन में आती हैं। पर अब ज़रुरत है नज़रिया बदलने की। उन्ही आंखों में हमारे पड़ोसी देश का भविष्य भी है।

तस्वीर धीरे-धीरे ही सही, पर बदल रही है। जब पकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो की हत्या हुई तो पूरे विश्व ने उसका शोक मनाया। बेनज़ीर केवल पकिस्तान की राजनेता ही नहीं, हज़ारों लाखों महिलाओं के बदलते नज़रिए का प्रारूप थीं। यही प्रेरणा फौजिय़ा भी देती हैं।

प्रेरणा स्तम्भ हमारे देश की हर कामकाजी महिला, हर गृहणी होनी चाहिए। सूरत बदल रही है और हम इस बदलाव का हिस्सा हैं। प्रगति की गूंज हर तरफ  से उठ रही है, ज़रुरत है बस इसमें अपनी आवाज़ मिलाने की। कहानियां अलग हो सकती हैं पर अभिप्राय एक है। मकसद है हर महिला को स्वाभिमानी बनाने का। और इस मुहिम की शुरुआत संसद में नहीं, आपके घर में होगी।

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