Monday 27 May 2013

कैंसर से मरने वालों में ग्रामीण ज्यादा

राजीव कुमार झा 

पटना (बिहार)। चंपारण, बिहार के अमर छतौनी गाँव में साहिदा (28) कैंसर से जि़न्दगी की जंग हार गईं। वह हार इसलिए गईं क्योंकि वह कोई सिने तारिका या क्रिकेट स्टार नहीं थी। वह हाशिए पर खड़ी अभावग्रस्त एक आम महिला थीं। मोतिहारी के वार्ड नंबर 35 के निवासी शंकर भी कैंसर की चपेट में हैं। बिजली मिस्त्री का काम कर अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले शंकर की हालत बिगड़ती जा रही है, लेकिन उनकी मदद के लिए कौन आयेगा?

यह कहानी किसी एक साहिदा या शंकर की नहीं है, गाँवों में अगर किसी को कैंसर हुआ तो लोग उसका इलाज नहीं उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने में जुट जाते हैं। यह विडंबना ही है कि जहां एक ओर सरकार ने देश में 15 क्षेत्रीय कैंसर संस्थान स्थापित किए हैं और कैंसर की दवाओं पर 75 फीसदी सब्सिडी देने की घोषणा की है, वहीं दूसरी ओर कैंसर से लगातार मौतें हो  रही हैं। मरने वालों में 70 फीसदी  लोग गाँवों के हैं। 

मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल के कैंसर विशेषज्ञ डॉ पंकज चतुर्वेदी कहते हैं, ''गाँव में अगर एक गरीब किसान को कैंसर होता है तो रातोंरात उसका पूरा परिवार गरीब हो जाता है, क्योंकि परिवार में              कमाने वाला सिर्फ वही होता है। बीपीएल परिवार के कैंसर मरीज को सरकार से एक से डेढ़ लाख की मदद मिलती है। जबकि कैंसर के पूरे इलाज पर करीब 4 से 5  लाख का खर्च आता है।" वह आगे बताते हैं, ''देश में कैंसर की बीमारी बढ़ती जा रही है। इसके एडवांस स्टेज पर पता चलने पर 4 से 5 महीने में करीब 50 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है।" 

भारत में बढ़ रही कैंसर की बीमारी का मुख्य कारण जागरुकता का अभाव मान रहे डॉ चतुर्वेदी कहते हैं, ''लोगों में इससे बचने के लिए जागरुकता पैदा करना सरकार का काम है। लेकिन टीवी पर धड़ल्ले से तम्बाकू का या उसके उत्पादों का विज्ञापन दिखाया जा रहा है। इसी के साथ गाँवों में लोग नियमित जांच, दांतों की सफाई और अच्छे खान-पान पर ध्यान नहीं देते। तंबाकू और बीड़ी की लत भी उन्हें ज्यादा जकड़े रहती है। जिस वजह से वह ज्यादा चपेट में आते हैं।"

पूरे विश्व में कुल मौतों की 13 फीसदी मौतें कैंसर से होती हैं। अमेरिकन रिसर्च सोसाइटी की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में कुल मौतों के लगभग 25 फ ीसदी लोग कैंसर से मरते हैं। जिसमें 30 फ ीसदी फेफ ड़े के कैंसर से मरते हैं।   

   भारत में लगभग दस लाख लोग प्रतिवर्ष कैंसर से मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2005-2015 तक विश्व में लगभग 8 करोड़ 40 लाख लोगों की कैंसर की चपेट में आने से मौत होगी। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अंतर्गत चल रहे राष्टरीय कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम से पता चलता है कि साल 2011 में करीब 10.55 लाख कैंसर के मामले सामने आए। जिनमें से 16 फीसदी केवल यूपी में हैं। 

कैंसर के इलाज के लिए विभिन्न विधियों जैसे-शल्य चिकित्सा, विकिरण चिकित्सा, कीमो थेरेपी, प्रतिरक्षा थेरेपी, हारमोन थेरेपी आदि में से किसी के लिए पैसे जुटा पाना सबसे मुश्किल होता है। गऱीबी, बेरोजग़ारी से लेकर महाजनों, सूदखोरों के चंगुल में पिसते पिसते रोगी अंत में अपनी जि़न्दगी गवां बैठता है। कैंसर के आगे आम आदमी की हार में सबसे बड़ा हाथ गैर जिम्मेदा स्थानीय चिकित्सकों का नजर आता है, ये डॉक्टर शुरुआत में या तो इस बीमारी को पहचान नहीं पाते या पहचान कर भी पैसा उगाहने के चक्कर में मरीज को कहीं अच्छी जगह रेफ र नहीं करते। अगर हालत काफी  गंभीर हो जाती है, तो हांथ खड़े कर देते हैं। 
मोतिहारी के दंत रोग विशेषज्ञ अमित कुमार पांडेय कहते हैं, ''कैंसर का सबसे बड़ा कारण आदमी  की लापरवाही और उसकी बदलती हुई दिनचर्या है, ख़ास कर युवाओं में मुंह का कैंसर, फेफ ड़े का कैंसर  उनकी अपनी ही देन है। तम्बाकू, गुटखा, शराब, सिगरेट तथा अन्य नशीले ड्रग्स आदि कैंसर के सबसे बड़े             कारक हैं।"

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