Monday 27 May 2013

देश में ग्रामीण आबादी हो रही कम

पंकज कुमार

लखनऊ। गाँवों से शहरों की ओर हो रहा पलायन हो या गाँवों का शहरीकरण, देश में ग्रामीण  आबादी लगातार कम हो रही है। जबकि इसके उलट शहरी आबादी बढ़ रही है। 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार पिछले एक दशक में ग्रामीण आबादी 72.19 फीसदी से घटकर 68.84 फीसदी हो गई है, यानि कि 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण आबादी में 3.5 फीसदी की कमी दर्ज की गई। जबकि इसी बीच शहरी आबादी 27.81 प्रतिशत जो साल 2001 में थी, बढ़कर साल 2011 में  31.16 प्रतिशत हो गयी।


करीब 20 साल पहले गाजीपुर जिले के गाँव उसियां से जमील खान (34) पढ़ाई करने के लिए कानपुर शहर आए थे। जमील ने यहीं व्यापार शुरू किया और वो आज यहीं के निवासी हो गए हैं  समय के साथ-साथ उसकी जरूरतें बढ़ीं और उन्हें लगता है कि उन जरूरतों को ये शहर ही पूरा कर सकता है। आज जमील बड़े आत्मविश्वास के साथ कहते हैं, ''मैं जिन जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने गाँव से शहर आया था वे जरूरतें इस शहर ने पूरी की है।" हालांकि गाँव छोडऩे का मलाल  उन्हें अब भी है। वो कहते हैं,  ''शहरों में मिलने वाली सुविधाएं यदि गाँवों में दी जाएं तो मेरे जैसे लोगों को अपना गाँव छोड़कर शहर ना भागना पड़े।"



साल 2011 की जनगणना के अनुसार पिछले एक दशक में  लगभग 1 करोड़ 44 लाख लोगों ने रोजगार के लिए गाँवों से शहरों की तरफ रुख किया, जिसमें 1 करोड़ 24 लाख पुरुष और 20 लाख महिलाएं थीं। वहीं, दूसरी ओर करीब 62 लाख लोगों ने शहरों से गाँवों की ओर रुख किया।

दूसरी ओर, डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री डॉ. संजय सिंह, शहरी आबादी के बढऩे और ग्रामीण आबादी के लगातार कम होने की प्रमुख वजह गाँवों से शहरों की तरफ  पलायन नहीं बल्कि गाँवों का शहरीकरण मानते हैं। वह कहते हैं, ''शहरों के आसपास के क्षेत्र जो पहले गाँव थे वो अब शहर में आ गए हैं। शहर धीरे-धीरे फैल रहे हैं जिससे शहरों के आसपास के गाँव के लोग भी शहरी आबादी में शामिल हो गए है।"

2011 की जनगणना के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि किस तरह से ग्रामीण आबादी के एक बड़े हिस्से ने गाँवों से शहरों की तरफ  रुख किया है। हालांकि पिछले एक दशक में गाँवों की संख्या में करीब 2200 की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2001 में भारत में कुल गाँवों की संख्या 6,38,596 थी, जो बढ़कर साल 2011 में 6,40,875 हो गयी है। इसके बावजूद पहली बार शहरी आबादी की तुलना में ग्रामीण आबादी कम हुई है। शहरों में जहां नौ करोड़ दस लाख तो वहीं ग्रामीण आबादी में नौ करोड़ चार लाख की वृद्धि दर्ज की गई।

 गाँवों के शहरीकरण और गाँवों से शहरों की तरफ हो रहे पलायन से खेती को भी काफी नुकसान हुआ है। लोगों ने खेती-किसानी से दूरी बनानी शुरू कर दी है। साल 1993 में देश कीकुल जीडीपी में कृषि का योगदान करीब 23 फीसदी था, जो साल 2012 में घटकर करीब 14 फीसदी रह गया। डॉ संजय सिंह कहते हैं, ''आजादी के बाद भारत की करीब 80 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर थी और जिससे 80 फीसदी आबादी का पेट भरता था। आज करीब 70 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है और यह बेमुश्किल 20 फीसदी आबादी का ही पेट भर पा रही है।"


पलायन रोकने को गाँवों में जरूरी सुविधाएं देनी होंगी


प्रश्न: घटती ग्रामीण आबादी को आप कैसे देखते हैं? 
उत्तर: यह चिंताजनक है। यह संकेत है कि गाँवों में लोगों की समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं और उससे निजात पाने के लिए शहरों की ओर पलायन हो रहा है।  

प्रश्न: क्या भारत अब शहरों का देश बनने की तरफ          अग्रसर है?
उत्तर : यह कहना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन हमे अपने गाँवों को भी शहरी सुविधाओं से लैस करना होगा।  

प्रश्न : कृषि के बजाय उद्योगों पर बढ़ती निर्भरता को क्या सकारात्मक दृष्टिï से देखा जा सकता है?
उत्तर : इक्कीसवीं शताब्दी में भारत को एक सशक्त औद्योगिक  राष्ट्रीय बनाना है और उस दृष्टिकोण से हमे गाँवों की पूँजी और श्रम चाहिए। लेकिन यह प्रवृत्ति उलट भी  होनी चाहिए अर्थात शहरों से भी लोगों की रुचि गाँवों  की तरफ करनी होगी। गाँव और शहर भारतीय अर्थव्यवस्था के परस्पर अनुपूरक केंद्र के रूप में विकसित करने की ज़रूरत है। 

प्रश्न : अगर पलायन ऐसे ही रहा तो आप कृषि के भविष्य को कैसे देखते हैं?
उत्तर :शहरी पलायन से कृषि को कम खतरा है, इससे ज्यादा खतरा है कि देश में कृषि को दोयम दर्जे के व्यवसाय के रूप में देखा जाना और युवा वर्ग कृषि-उद्यमिता को अपने एजेंडे पर न रखे।

प्रश्न : गाँवों से शहरों की तरफ हो रहे पलायन को रोकने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए? 
उत्तर : पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम की प्रोवाइडिंग अर्बन फेसिलिटी इन रूरल एरियाज (पुरा) की अवधारणा को लागू करें, कृषि-उद्यमिता को शिक्षा के अनिवार्य विषय के रूप में हाईस्कूल/इंटरमिडिएट तक लागू करना चाहिए, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोडऩे का भी प्रयास हो।  

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