Monday 13 May 2013

ब्राम्हणों के वोट को लेकर प्रतियोगिता


मंगल पांडे ब्राह्मण थे। मुलायम सिंह यादव का बयान है। दि हिन्दू अखबार की एक खबर पढ़ रहा था। 1857 की क्रांति के अन्य नायकों की पहले भी जाति खोजी जा चुकी है। गुर्जर और दलित शहीद की प्रतिमाएं गढ़ीं जा चुकी हैं। लखनऊ में जब मुलायम सिंह यादव ये बात कह रहे थे तो नई बात नहीं थी। समाजवाद तो मंगल पांडे से ही आगे बढ़ा है। ब्राह्मण समाज ने देश और समाज की प्रगति के लिए काफ ी कुछ किया है। अखबार बताता है कि समाजवादी पार्टी के भीतर ब्राह्मण सभा भी है जिसके अध्यक्ष कोई मंत्री हैं जिनका नाम है मनोज पांडे। मुलायम सिंह बता रहे हैं कि उनकी सरकार बनी थी तभी परशुराम जयंती पर छुट्टी का फैसला हुआ था। अब समाजवादी पार्टी के दिवंगत नेता जनेश्वर मिश्र को भी ब्राह्मण के रूप में खोजते हुए मुलायम बताते हैं कि लखनऊ में लोहिया पार्क से भी बड़ा छोटे लोहिया के नाम से जाने गए जनेश्वर मिश्र पार्क बन रहा है। जनश्वेर मिश्र की जात ही काम आई आखिर। बेकार में ये विचार और वो विचार में जीवन खपाये रहे छोटे लोहिया साहब। जात का इतना बड़ा टिकट पास में था और विचारधारा के भ्रम में बेटिकट घूमते रह गए। इसीलिए     छोटे लोहिया शानदार भाषण देकर  भी संसद में भाषण बाज़ से आगे नहीं जा सके।

यही नहीं आचार्य महावीर दिवेदी जिनका लिखा हुआ कई कोर्स में है मगर अब उनकी जीवनी इसलिए कोर्स में ठेली जाएगी क्योंकि आचार्य जी ब्राह्मण थे। हिन्दी साहित्य के सेमिनारी साहित्यक जमात इसका देखते हैं कैसे विरोध करती हैं लेकिन ब्राह्मणों के वोट को लेकर प्रतियोगिता मुलायम ने तो शुरू नहीं की। मायावती ने 2007 के चुनावों में राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चुके ब्राह्मण नेताओं और मतदाताओं की पुनर्खोज की थी। भाईचारा कमेटी बनाकर उन्हें बीएसपी के पाले में ले आईं। सतीश मिश्रा इसी कोटे से महत्वपूर्ण बन गए। अब मुलायम सिंह यादव भी वही कर रहे हैं, चूंकि ब्राह्मणों तक पहुंचना था इसलिए कार्यक्रम का नाम प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन रखा गया। इस नाम के सम्मेलन तो दलितों और पिछड़ों ने कभी अपने लिए तो नहीं कराये। कराये भी होंगे तो मुझे मालूम नहीं है।

राजनीति का अपना एक चक्र होता है। हमारी राजनीति में अब वैचारिक धार रही नहीं। इतना श्रम कौन करे। जल्दी जात को पहचानों और उसकी तारीफ  करो। अतीत की तस्वीरों को अपने हिसाब से गढ़ों और ध्वस्त करो। राजनीति किसी दूसरी जाति की पहचान से लड़ नहीं सकती। समझौता करती है। कोई नाम दे देती है कि अब ब्राह्मण भी बदल रहे हैं। यह नहीं कहती कि हम बदल रहे हैं। हमें सिर्फ वोट की ज़रूरत है। विचारधारा पार्टी के नाम पर जुगाड़ पाने की उम्मीद में बैठे कुछ खाली लोग  लघु पत्रिका चलाने का फं ड   खोजते रहते हैं। राजनीतिक दलों में ब्राह्मण वोट प्रतियोगिता चल रही है। इसलिए पहला रास्ते की नारेबाज़ी का ज़माना चला गया। जो भी जात जहां है और जैसा है के आधार  अपनी संख्या क्षमता के कारण वोट है इसे जोड़ो। इसलिए कांग्रेस और बीजेपी अपने चरित्र में घोर ब्राह्मणवादी होते हुए भी ब्राह्मण मतदाताओं से ऐसी बातें               खुलकर करने से बचती हैं क्योंकि जैसे ही वे यह बात करेंगी उनका दूसरे समाज का वोट घट जाता है लेकिन मुलायम और मायावती के कहने से उनके वोट बैंक में कुछ    जुड़ जाता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि फि र से अपनी जातिगत पहचानों को लेकर सर उठाने का टाइम लौट रहा है। मालूम नहीं, यह भी तो हो सकता है कि जातिवाद का स्वरुप काफ ी टूट गया हो। दलितों और पिछड़ों ने एक किस्म की राजनीतिक बराबरी हासिल कर ली हो और अब वे अपनी तरफ  से हाथ बढ़ा रहे हों पर इस प्रक्रिया को उनके अवसरवाद से कैसे अलग करके देखें। बात ब्राह्मण की नहीं है। बात जातियों के गठबंधन की है जो इस सघन प्रतियोगिता के वक्त सभी राजनीतिक दल बनाते हैं। कहने का मतलब ये है कि उनका गठन भले ही ऐसी बातों की पृष्ठभूमि में हुआ होता होगा कि जाति का ढांचा तोडऩा है लेकिन वे भी अंत में इसी ढांचे का हिस्सा बन जाते हैं या वैसे ही हो जाते हैं जिसके खिलाफ  होने निकले थे। जब समाजवाद समाजवाद नहीं रहा तो ब्राह्मणों को लेकर समाज के पिछड़े तबकों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की प्रतियोगिता सकारात्मक तरीके से भी तो देखी जा सकती है। जातिवाद टूट रहा है ये नहीं मालूम पर इसी ढांचे के भीतर सब बराबर हो रहे हैं। ऐसा है मैं दावा नहीं कर सकता, क्या पता ऐसा ही हो।

लेकिन जब आज भी दलितों को हरियाणा या कहीं और के गाँवों से मारकर भगा दिया जाता है तो बाकी दल चुप क्यों रहते हैं। उन पर ज़ुल्म करने वालों का जातियों के हिसाब से प्रोफ ाइल बनाना चाहिए। हर जात के ज़ुल्मी हैं लेकिन हर दल को हर जात चाहिए। इसलिए जाट जब दलितों को भगा देते हैं तो सरकार पर हमला होता है। एक जाति की ताकत या उसकी मानसिकता से लडऩे का प्रयास इतना ही है कि सताए हुए लोग मीडिया में रिपोर्टर ढूंढते रहते हैं कि कवर कर दीजिए। खबर कवर भी होती है और शून्य के सन्नाटे में खो जाती है। इन सताये हुए लोगों को अब नेता नहीं मिलता। न बहन जी मिलती हैं न भाई साहब। बाकी इनके छोड़े हुए विचारक हैं जो थोड़ी बहुत ईमानदारी से लड़ते रहते हैं। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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