Monday 13 May 2013

बदलते समाज में मोबाइल का बदलता चेहरा



भारत में जब मोबाइल नया-नया आया था, तब हर मोबाइल रखने वाला इंसान किसी महामानव से कम नहीं समझा जाता था। वह भी एक अलग ही जमाना था जब लोग रोमिंग में जाते ही अपना मोबाइल स्विच ऑफ  कर देते थे, क्योंकि बिल बहुत ज्यादा आता था। लेकिन, पिछले दस-पंद्रह सालों में बैंकों में काम-काज से लेकर बच्चों के स्कूल कॉलेज में एडमिशन फॉर्म तकए रेलवे रिजर्वेशन हो या ऑफिस में कामकाज का तरीका, आज के संदर्भ में सब कुछ बदल गया है। क्योंकि, सामाजिक बदलाव एक स्वभाविक प्रक्रिया है। अगर हम समाज में सामंजस्य और निरंतरता को बनाए रखना चाहते हैं तो हमें उसी अंदाज में अपने व्यवहार को परिवर्तनशील बनाना ही होगा। अगर ऐसा न होता तो मानव समाज की इतनी प्रगति संभव नहीं होती।


अगर हम थोड़ा और अतीत, यानी महज सौ-सवा सौ साल पहले की बात करें, जब सूचना पहुंचाने के लिए इंसानों को एक जगह से दूसरी जगह चलकर जाना होता था। इस तरह संदेश या सूचना को किसी जगह पहुंचाने में महीने लग जाया करते थे। फिर माध्यम के तौर पर जगह ली अख़बार ने। आजादी की लड़ाई में अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं ने अहम भूमिका निभाई। वहीं आज पलक झपकते ही सूचना पहुंचाने के कई-कई तरीके हमारे पास हैं, जिन्हें हम मीडिया के नाम से भी जानते हैं।

आमतौर पर मीडिया कहते ही सबसे पहले जेहन में अख़बार-मैगज़ीन या टेलीविजन-रेडियो का ख्याल आता है। लेकिन, मीडिया का दायरा कहीं ज़्यादा बड़ा है।  मीडिया में सबसे पहले प्रिंट मीडिया यानी अख़बार, मैगज़ीन और सरकारी दफ्तरों से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं का आते हैं। लेकिन, इनके बाद मीडिया जैसे माध्यम का नंबर आता है, जिसमें  रेडियो, टीवी, मोबाइल या न्यू मीडिया शामिल हैं।  न्यू मीडिया, मीडिया का वो हिस्सा है जिसने पूरी दुनिया को गाँव में तब्दील कर दिया है। जिसने न सिर्फ  तमाम देशों के बीच की दूरी कम कर दी है बल्कि भौगोलिक सरहदों के मायने भी ख़त्म कर दिए हैं। सूचना क्रांति के अग्रदूत बन चुके न्यू मीडिया ने मोबाइल के जरिए अपना ठौर-ठिकाना लोगों की जेब तक बना लिया है।

जी हां, सूचना क्रान्ति के इस युग में मोबाइल के रुप में इंटरनेट ने लोगों की जेबों में अपनी पैठ बना ली है।
हालांकि, एक रिसर्च के मुताबिक सोशल मीडिया में रेडियो, टीवी, इंटरनेट और मोबाइल आता है। रेडियो को  करीब 74 साल हुए हैं, टीवी को 14 साल और आईपॉड (मोबाइल) को 4 साल । लेकिन, इन सब मीडिया को पीछे छोड़ते हुए सोशल मीडिया ने अपने पांच साल में हीं 60 गुना अधिक रास्ता तय कर लिया है, जितना अभी तक किसी मीडिया ने तय नहीं किया। और ये सब मुमकिन हुआ है मोबाइल के जरिए।

इसी मोबाइल को लेकर हमलोगों ने व्यंग के रूप में कभी सुना या पढ़ा भी होगा कि हमारे देश में आज संडास से ज्यादा मोबाइल फोन हैं। ये बात किसी हद तक सही भी है। हमारे देश में मोबाइल फोन को आए करीब 18 साल हो गए हैं।  लेकिन  10 साल पहले से ही भारत में आम घरों में मोबाइल फोन आने का सिलसिला तेज हुआ। फिलहाल, देश के 63 प्रतिशत घरों में फोन की सुविधा उपलब्ध है जिनमें 53 प्रतिशत घरों में केवल मोबाइल फोन है और 6 प्रतिशत के पास टेलीफोन और मोबाइल दोनों हैं। ग्रामीण इलाकों के आधे से ज्यादा घरों में मोबाइल फोन पहुंच चुका है। और गाँवों तक आसानी से मोबाइल पहुंचाने में कई निजी मोबाइल कंपनियों की बहुत बड़ी भूमिका है।

भारत में सूचना क्रांति लाने वाली इस इलेक्ट्रॉनिक मशीन के डेढ़ दशकों के इस सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज देश में मोबाइल फोन कनेक्शनों की संख्या करीब 86 करोड़ तक पहुंच चुकी है।

ट्राई के आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ताओं के मामले में विश्व के दूसरे सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजार भारत में फरवरी 2013 तक कुल 86.16 करोड़ मोबाइल कनेक्शन हैं। आंकड़ों के मुताबिक उत्तरप्रदेश में कुल 12.16 करोड़ मोबाइल फोन कनेक्शन हैं, जबकि तमिलनाडु में 7.18 करोड़ मोबाइल फोन कनेक्शन हैं, वहीं महाराष्ट्र में 6.77 करोड़, आंध्रप्रदेश में 6.41 करोड़ और बिहार में 6.07 करोड़ मोबाइल फोन कनेक्शन हैं। वहीं, कर्नाटक 5.24 करोड़ मोबाइल कनेक्शनों के साथ छठे और मध्यप्रदेश 5.14 करोड़ कनेक्शनों के साथ सातवें स्थान पर है, जबकि 5.12 करोड़ मोबाइल कनेक्शनों के साथ गुजरात आठवें स्थान पर है। क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़े राज्य राजस्थान में मोबाइल कनेक्शनों की संख्या 4.78 करोड़ है।

पिछले कुछ सालों में जिस रफ्तार से नया मोबाइल कनेक्शन लेने वालों की संख्या बढ़ रही है, शायद आनेवाले कुछ सालों में ही यह दावा किया जा सकेगा कि सवा अरब की आबादी वाले इस मुल्क में इतने ही मोबाइल कनेक्शन हैं। सूचना क्रंान्ति के इस युग में जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके इस मोबाइल फोन के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल सा लगने लगा है। मोबाइल पर हम बातें करते हैं, संदेश भेजते हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और तो और अब तो पैसे भी ट्रांसफर करते हैं। लेकिन, इन सबके अलावा मोबाइल अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है जहां इसका इस्तेमाल समाज के सशक्तिकरण के लिए भी किया जा रहा है। 

शहर और गाँवों में मोबाइल ने एक तरफ समाज में कनेक्टिविटी बढ़ाई है तो दूसरी तरफ आत्मविश्वास भी पैदा किया है। शहरों में जहां महिलाओं की पहुंच में मोबाइल आने से उनके सशक्तिकरण को एक नई दिशा मिली हैए वहीं मोबाइल घरेलू हिंसा से लडऩे में भी मददगार साबित हुआ है।  गाँवों के किसान  जहां मोबाइल का इस्तेमाल खेती बाड़ी की जानकारी के लिए करते हैं, तो वहीं दूसरे ग्रामीण मोबाइल से टैक्स्ट मैसेज के जरिये एक दूसरे को पैसा भी भेजते हैं। यानि कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मोबाइल अब सिर्फ एक संचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि ये एक ऐसा यंत्र बन चुका है जिसके जरिए समाज का हर शख्स किसी न किसी रूप से जुड़ चुका है। लेकिन,  इसके डगर में भी पग-पग पर कई चुनौतियां हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश जहां आज भी दूर-दराज गाँवों में लोगों को भरपेट खाना नसीब नहीं है, कैसे ये मोबाइल उनका सशक्तिकरण कर सकता है जिस देश में खेती और रोजमर्रा की अहम जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली कम पड़ती हो, वहां कैसे बिजली पर आधारित तकनीक का विस्तार संभव है। जहां सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर पर इंटरनेट की पूरी शिक्षा तक नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में क्या मोबाइल इसका विकल्प हो सकता है। ऐसे ही कई और सवाल हैं, जिनका जवाब हमें ढूंढऩा होगा, तभी सही मायने में मोबाइल या कोई भी तकनीक समाज के सशक्तिकरण में सहायक हो सकेगा।

(लेखक डिजिटल एंपावरमेंट फ उंडेशन के संस्थापक निदेशक और मंथन अवार्ड के चेयरमैन हैं। वह इंटरनेट प्रसारण एवं संचालन के लिए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कार्य समूह के सदस्य हैं और कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए बनी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी  के सदस्य हैं।)

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