Wednesday 24 April 2013

कलाकार की अंतिम ख्वाहिश,दादा साहब फाल्के पुरस्कार


नेहा घई पंडित

1970 में पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार देविका रानी को दिया गया

गाजियाबाद। हाल ही में प्रसिद्ध फि ल्म अभिनेता श्री प्राण साहब को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े अलंकरण 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से नवाज़ा गया है। इससे हिन्दी सिनेमा जगत में एक खुशी की लहर है। ये खुशी की लहर और उत्साह हो भी क्यों न। आखिर जो सम्मान दिया गया है, वह सम्मान अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। पूरा सप्ताह टेलीविजन और प्रिंट मीडिया प्राण साहब और उनकी अदाकारियों के लेकर वाह-वाही करता रहा। आखिर क्या वजह है जो आम अवाड्र्स की तुलना में इस अवार्ड को लेकर सारे मीडिया जगत में ज्यादा चर्चा है? आखिर क्यों इतना खास है 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार', और क्यों इस अवार्ड को पाना हर एक कलाकार की अंतिम ख्वाहिश होती है?

दादा साहब फ ाल्के का वास्तविक नाम 'धुन्दीराज गोविंद फाल्के'  था। वे सारे हिंदुस्तान में दादा साहब फाल्के के नाम से प्रसिद्ध थे। दादा साहब एक प्रसिद्ध फि़ ल्म निर्माता, निर्देशक एवं पटकथा लेखक थे, जो भारतीय सिनेमा के पितामह माने जाते हैं। दादा साहब ने ही सन 1913 में हिन्दुस्तान की पहली मूक फि ल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई और फि र फि़ ल्मों को बनाने का जो दौर शुरू हुआ तो वह कभी खत्म नहीं हुआ। अपने फि ल्मी करियर में दादा साहब ने 95 फि़ ल्मों का निर्माण किया और अनेक छोटी फि ल्में भी बनाईं। 1913 में ही 'भस्मासुर मोहिनी' फि ल्म इन्होंने महिला किरदारों को लेकर बनाई। इससे पहले बनी फि ल्मों में सिर्फ पुरुष ही तमाम किरदारों का रोल अदा करते थे। अगले 4 सालों में दादा साहब ने लगभग 17 फि ल्में और बना दीं, सारी दुनिया को बता दिया कि चलचित्रों की दुनिया में हिन्दुस्तान ने भी ताल ठोक दी है। फि ल्मों से व्यवसाय की संभावना देखते हुए दादा साहब और अन्य साथियों ने मिलकर 'हिंदुस्तान सिनेमा कंपनी' की स्थापना कर दी। माना जाए तो फि ल्मों के व्यवसायीकरण के दौर की शुरुआत इसी समय से शुरू हो चुकी थी। इतनी सारी फि ल्मों के निर्देशन, लेखन के दौरान 1932 में आई इनकी फि ल्म 'सेतुबंधन' आखिरी मूक फि ल्म रही और फि र इन्होनें इकलौती ऐसी फि ल्म का निर्माण किया जिसमें संवाद रखे गए थे, फि ल्म का नाम था 'गंगावतरण'। सन 1944 में दादा साहब    फ ाल्के का देहांत हुआ और मानों हिन्दी सिनेमा के पहले सबसे बड़े दौर का अंत भी। दादा साहब फाल्के की 100वीं जयंती के अवसर पर भारतीय केंद्र सरकार द्वारा 'दादा साहब फ ाल्के पुरस्कार' की स्थापना वर्ष 1969 में की गई। इस पुरस्कार के लिए फि़ ल्मी दुनिया में अपने आजीवन और अनमोल योगदान के लिए एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया जाता है, जो अपने सिने कार्यक्षेत्र में एक मिसाल कायम कर चुके हों। इस अवार्ड से प्रतिवर्ष फि ल्म जगत के एक व्यक्ति को नवाज़ा जाता है। अब तक हिन्दुस्तानी फि ल्म जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों को इस अवार्ड से अलंकृत किया जा चुका है।


एक संयोग ऐसा भी

फि ल्म निर्देशक के. आसिफ  की फि ल्म 'मुगल-ए-आज़म के हिट गाने' जब प्यार किया तो डरना क्या...' को कभी देखिए और सुनिए भी। हां इस गाने में पृथ्वीराज कपूर साहब, दिलीप कुमार जी और दुर्गा खोटे जी दिखाई देते हैं, वहीं, इस गाने को स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी ने गाया है और गीतकार नौशाद साहब थे। इस गाने में एक साथ पांच धुरंधर जिन्होंने 'दादा साहब पुरस्कार' प्राप्त किया। किसी गाने या दृश्य में ऐसा संयोग बनना भी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं।  

इन फिल्मी हस्तियों को मिल चुका है पुरस्कार

सन 1970 में पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार देविका रानी को उनके अभूतपूर्व फिल्मी योगदान के लिए दिया गया। इनके अलावा एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर पृथ्वीराज कपूर, धीरेन गांगुली, नितिन बोस, सोहराब मोदी, एल.वी. प्रसाद, जयराज, वी शांताराम, सत्यजीत रे, राज कपूर, बालजी पेंढारकर, भूपेन हजारिका, डॉक्टर राजकुमार, बी.आर.चोपड़ा, शिवाजी गणेशन जैसे नामचीन फि ल्मी हस्तियों को इस सम्मान से नवाज़ा गया है। इनके अलावा दुर्गा खोटे, नौशाद, अशोक कुमार, लता मंगेशकर, कवि प्रदीप, देव आनंद, मन्ना डे, मजरूह सुल्तानपुरी, दिलीप कुमार, ऋ षिकेश मुखर्जी, आशा भोंसले, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल जैसे 41 धुरंधर फि ल्मी जगत हस्तियों को भी अब तक इस सम्मान से नवाजा जा चुका है। 

विवादों में भी रहे हैं दादा साहब फाल्के पुरस्कार 

अवाड्र्स और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है और दादा साहब फाल्के अवाड्र्स भी इससे अछूते नहीं रहे। अपने पहले ही पायदान पर इस अवार्ड ने विवाद को जन्म दिया था जब यह पुरस्कार देविका रानी को दिया गया, अनेक सिने हस्तियों की मांग के अनुसार यह पुरस्कार वी शांताराम को दिया जाना चाहिए था। अक्सर अवाड्र्स और मान सम्मान के नाम पर ऐसा होता है, लेकिन हमेशा 'दादा साहब फ ाल्के अवाड्र्स' पर विवादों की मार ज्यादा जोर वाली नहीं रही। मजरूह सुल्तानपुरी साहब को पुरस्कार मिलने के वक्त भी दबी जुबां में लोग अन्य गीतकारों के नाम की चर्चा करते रहे। देव आनंद साहब हों या प्राण साहब, इन्हें मिले इस सम्मान की देरी के लिए भी जूरी को आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा। सबसे बेहद सुखद पहलू इन सभी विवादों का अतिशीघ्र नगण्य हो जाना रहा है। आम फि ल्मी अवार्डस की तुलना में इसका कोई मेल नहीं और इस सम्मान पर किसी भी व्यक्ति का कोई सवालिया निशान नहीं होता है, आखिर सम्मान ही कुछ ऐसा है। आज हम सभी सिने प्रेमी प्राण साहब को मिले इस सम्मान को लेकर जितने खुश हैं, इसकी मुख्य वजह सिफऱ्  यही है कि आज भी इस पितृ पुरुष सम्मान को हम आदर की नजरों से देखते हैं।

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